मुंबई - बॉलीवुड अभिनेत्री और भाजपा सांसद कंगना रनौत अक्सर अपने बेबाक बयानों को लेकर चर्चा में रहती हैं। फिल्मों के अलावा सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर उनकी खुलकर राय कई बार विवाद का कारण बनी है। उनके कई बयानों पर राजनीतिक दलों, फिल्म जगत और सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं। आइए जानते हैं कंगना रनौत के पांच सबसे चर्चित विवाद।
1. '1947 में मिली आजादी भीख थी' वाला बयान
साल 2021 में एक कार्यक्रम के दौरान कंगना रनौत ने कहा था कि भारत को 1947 में मिली आजादी "भीख" थी और "असली आजादी" 2014 में मिली। उनके इस बयान पर विभिन्न राजनीतिक दलों, इतिहासकारों और कई सामाजिक संगठनों ने कड़ी आपत्ति जताई। आलोचकों ने इसे स्वतंत्रता सेनानियों के योगदान का अपमान बताया।
2. मुंबई की तुलना PoK से करना
2020 में अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की मौत के बाद मुंबई पुलिस की जांच पर सवाल उठाते हुए कंगना ने कहा था कि उन्हें मुंबई में असुरक्षित महसूस हो रहा है और शहर की तुलना पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) से कर दी थी। इस टिप्पणी के बाद महाराष्ट्र की राजनीति में बड़ा विवाद खड़ा हो गया और कई नेताओं ने उनके बयान की आलोचना की।
3. नेपोटिज्म पर करण जौहर को घेरा
2017 में टीवी शो 'कॉफी विद करण' में कंगना ने फिल्म निर्माता-निर्देशक करण जौहर पर बॉलीवुड में भाई-भतीजावाद (नेपोटिज्म) को बढ़ावा देने का आरोप लगाया था। उन्होंने करण को "नेपोटिज्म का फ्लैगबेयरर" कहा। इस बयान के बाद बॉलीवुड में नेपोटिज्म पर लंबी बहस शुरू हुई, जो आज भी समय-समय पर चर्चा में रहती है।
4. किसान आंदोलन पर टिप्पणियां
2020-21 के किसान आंदोलन के दौरान कंगना ने सोशल मीडिया पर कई पोस्ट किए, जिनमें उन्होंने आंदोलन को लेकर विवादित टिप्पणियां कीं। उनके बयानों पर किसान संगठनों और कई राजनीतिक दलों ने विरोध जताया। इस दौरान उन्हें कानूनी नोटिसों और विरोध प्रदर्शनों का भी सामना करना पड़ा।
5. 'Gen Z' पर हालिया टिप्पणी
हाल के दिनों में कंगना रनौत एक बार फिर चर्चा में आईं, जब उन्होंने कुछ युवा प्रदर्शनकारियों और Gen Z को लेकर विवादित टिप्पणी की। उनके इस बयान के बाद सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं। समर्थकों ने इसे उनकी बेबाक राय बताया, जबकि आलोचकों ने इसे युवाओं के प्रति अनुचित और आपत्तिजनक करार दिया।
बयानों को लेकर हमेशा रहती हैं चर्चा में
कंगना रनौत अपने स्पष्ट और बेबाक अंदाज के लिए जानी जाती हैं। उनके समर्थक इसे उनकी स्पष्टवादिता मानते हैं, जबकि आलोचक कई बयानों को अनावश्यक रूप से विवादित बताते हैं। यही वजह है कि वह अक्सर राजनीतिक और सामाजिक बहस के केंद्र में बनी रहती हैं।
