सामान्य परिस्थितियों में पसीना आना शरीर का तापमान नियंत्रित रखने का प्राकृतिक तरीका है, लेकिन जब बिना कारण अत्यधिक पसीना आने लगे तो इसे हाइपरहाइड्रोसिस माना जाता है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य संस्थान के अनुसार यह समस्या एक्राइन ग्रंथियों पर मौजूद कोलिनर्जिक रिसेप्टर्स की अतिउत्तेजना से उत्पन्न होती है। इससे शरीर सामान्य ताप नियंत्रण के लिए आवश्यक मात्रा से कहीं अधिक पसीना निकालता है। यह स्थिति शारीरिक परेशानी के साथ–साथ मानसिक असहजता भी उत्पन्न करती है।
फोकल या प्राइमरी हाइपरहाइड्रोसिस किसे कहते हैं
कुछ लोगों में अत्यधिक पसीना शरीर के किसी एक हिस्से में केंद्रित रहता है। इसे फोकल या प्राइमरी हाइपरहाइड्रोसिस कहते हैं। इसमें व्यक्ति की बगल, हथेलियां, तलवे या सिर जैसे क्षेत्र अत्यधिक पसीने से भीगते रहते हैं। अगर यह समस्या लंबे समय तक जारी रहे तो चिकित्सकीय जांच आवश्यक हो जाती है ताकि कारणों का पता लगाकर सही उपचार किया जा सके।
बहुत अधिक पसीना आने से शरीर पर क्या असर पड़ता है
अत्यधिक पसीना त्वचा पर कई तरह की समस्याएं उत्पन्न कर सकता है। जिस स्थान पर लगातार पसीना आता है, वहां की त्वचा गुलाबी या सफेद दिखाई देने लगती है। कई बार त्वचा सूज जाती है, जलन होती है या दर्द महसूस होता है। लंबे समय तक गीलापन रहने से त्वचा फटने लगती है और पपड़ी बनने लगती है। इस नमी के कारण स्किन इन्फेक्शन और दुर्गंध की समस्या भी बढ़ सकती है, जो व्यक्ति को मानसिक रूप से और अधिक परेशान कर सकती है।
अत्यधिक पसीने के प्रमुख शारीरिक कारण
बहुत अधिक पसीना आने के कई चिकित्सकीय और शारीरिक कारण हो सकते हैं। थायरॉयड की अतिसक्रियता यानी हाइपरथाइरॉयडिज्म में थायरोक्सिन हार्मोन बढ़ जाने से शरीर का मेटाबॉलिज्म तेज होता है और पसीना अधिक आता है। मधुमेह के मरीजों में ब्लड शुगर कम होने पर अचानक पसीना आने लगता है। दिल से संबंधित समस्या या दिल का दौरा पड़ने की स्थिति में भी पसीना आना एक प्रमुख लक्षण हो सकता है। टीबी और एचआईवी जैसे संक्रमणों में भी अधिक पसीना आता है। महिलाओं में मेनोपॉज के दौरान आने वाले हॉट फ्लैशेस पसीने को बढ़ाते हैं। मानसिक तनाव और घबराहट भी पसीने की ग्रंथियों को सक्रिय कर देती है। कुछ दवाओं के दुष्प्रभाव भी अत्यधिक पसीना आने का कारण बन सकते हैं, विशेषकर एंटीडिप्रेसेन्ट दवाएं।
हाइपरहाइड्रोसिस को कैसे किया जा सकता है नियंत्रित
जीवनशैली में सुधार और चिकित्सकीय सलाह मिलकर इस समस्या को काफी हद तक नियंत्रित कर सकते हैं। सही निदान के बाद डॉक्टर दवाओं, बोटॉक्स इंजेक्शन, आयनटोफोरेसिस थेरेपी या अत्यधिक गंभीर स्थिति में सर्जरी तक की सलाह दे सकते हैं। रोजमर्रा की आदतों में बदलाव जैसे त्वचा को सूखा रखने की कोशिश, सांस लेने योग्य कपड़े पहनना, तनाव कम करने की तकनीक अपनाना भी प्रभावी हो सकता है।
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