नई दिल्ली - नेपाल के रसुवा जिले में भोटेकोशी नदी में आई विनाशकारी बाढ़ को लेकर अब सैटेलाइट तस्वीरों से अहम जानकारी सामने आई है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) के नेशनल रिमोट सेंसिंग सेंटर (NRSC) के शुरुआती विश्लेषण के मुताबिक, करीब 5,200 मीटर की ऊंचाई पर स्थित लांगतांग लिरुंग ग्लेशियर के बड़े हिस्से के टूटने और ढलान पर गिरने के बाद भारी मात्रा में बर्फ, चट्टान और मलबा नीचे की ओर आया। इसी घटनाक्रम ने भोटेकोशी नदी में अचानक बाढ़ जैसी स्थिति पैदा करने में अहम भूमिका निभाई हो सकती है।

सैटेलाइट तस्वीरों ने खोला तबाही का राज
NRSC के निदेशक प्रकाश चौहान के अनुसार, 26 अगस्त को भारतीय समयानुसार करीब सुबह 10:30 बजे प्राप्त सैटेलाइट तस्वीरों की तुलना घटना से पहले की तस्वीरों से की गई। इस तुलना में ग्लेशियर के एक बड़े हिस्से के टूटने और उसके बाद वहां बर्फ, चट्टान तथा मलबे के फैलने के संकेत दिखाई दिए। 24 अगस्त की Sentinel-2 तस्वीरों में संबंधित क्षेत्र सामान्य ग्लेशियर के रूप में नजर आता है। वहीं 26 अगस्त की Landsat-9 तस्वीर में उसी स्थान पर बदला स्पष्ट दिखाई देता है और वहां बर्फ-चट्टान के बड़े पैमाने पर नीचे खिसकने के निशान नजर आते हैं।
5,200 मीटर से 1,200 मीटर नीचे तक आया मलबा
प्रारंभिक विश्लेषण के मुताबिक, ग्लेशियर से अलग हुआ भारी हिस्सा करीब 5,200 मीटर की ऊंचाई से ढलान पर लगभग 1,200 मीटर तक नीचे आया। तेज ढलान और गुरुत्वाकर्षण के कारण बर्फ तथा चट्टानों की गति बढ़ती गई। नीचे पहुंचते-पहुंचते यह सामग्री पानी और मलबे के साथ मिल गई। इसके कारण केवल पानी का प्रवाह नहीं बढ़ा, बल्कि भारी बोल्डर, चट्टानें और भूस्खलन का मलबा भी नदी की दिशा में तेजी से बहने लगा। यही वजह है कि बाढ़ ने सामान्य फ्लैश फ्लड की तुलना में कहीं अधिक विनाशकारी रूप ले लिया।
सामान्य चैनल से कई गुना चौड़ी दिखी नदी
सैटेलाइट तस्वीरों में भोटेकोशी नदी का बाढ़ वाला हिस्सा अपने सामान्य नदी चैनल की तुलना में काफी अधिक चौड़ा दिखाई देता है। बाढ़ का पानी आसपास की घाटी तक फैल गया था। इससे संकेत मिलता है कि नदी में अचानक बड़ी मात्रा में पानी और मलबा पहुंचा, जिससे उसका प्रवाह नियंत्रित क्षेत्र से बाहर निकल गया और आसपास के इलाकों में तबाही फैल गई।
अस्थायी मलबे का बांध बनने की भी आशंका
NRSC के प्रारंभिक आकलन में एक और महत्वपूर्ण संभावना सामने आई है। वैज्ञानिकों के मुताबिक, भारी मलबा नदी के किसी संकरे हिस्से में जमा होकर अस्थायी अवरोध बना सकता है। ऐसी स्थिति में अवरोध के पीछे पानी और मलबा जमा होता जाता है। यदि यह प्राकृतिक बाधा अचानक टूट जाए तो जमा हुआ पानी और मलबा एक साथ तेज गति से आगे बढ़ सकता है। इससे फ्लैश फ्लड की तीव्रता अचानक बढ़ सकती है। हालांकि, NRSC ने इसे अभी प्रारंभिक आकलन बताया है। इस पूरी प्रक्रिया की पुष्टि के लिए विस्तृत वैज्ञानिक अध्ययन जारी है।
Planet Labs की तस्वीरों में भी दिखे तबाही के निशान
अंतरराष्ट्रीय सैटेलाइट कंपनी Planet Labs की घटना से पहले और बाद की तस्वीरों की विशेषज्ञ समीक्षा में भी इलाके में बड़े बदलाव दिखाई दिए हैं। तस्वीरों में पहले हरे नजर आने वाले पहाड़ी ढलानों के बड़े हिस्से पर बाद में भूरे रंग का मलबा और तलछट फैला दिखाई देता है। यह बदलाव इस बात का संकेत देता है कि घटना के दौरान बड़ी मात्रा में मिट्टी, चट्टान और अन्य सामग्री ढलान से नीचे आई और बाढ़ के प्रवाह के साथ आगे बढ़ी।
क्या भूकंप से अस्थिर हुआ ग्लेशियर?
इस घटना के समय एक और प्राकृतिक घटना भी सामने आई थी। वैज्ञानिकों के मुताबिक, बुधवार सुबह नेपाल के रसुवा जिले में भारतीय समयानुसार करीब 8:22 बजे 4.9 तीव्रता का भूकंप दर्ज किया गया। भूकंप की गहराई लगभग 10 किलोमीटर बताई गई है। ऐसी आशंका जताई जा रही है कि भूकंप के झटकों ने पहले से अस्थिर ग्लेशियर के किसी हिस्से को प्रभावित किया हो सकता है। हालांकि, अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि ग्लेशियर के टूटने की सीधी वजह भूकंप ही था। इसके लिए भूकंपीय गतिविधि, ग्लेशियर की स्थिति, ढलान और मौसम समेत कई वैज्ञानिक पहलुओं का अध्ययन किया जा रहा है।
ग्लेशियर टूटना, मलबा और बाढ़—कैसे बढ़ी तबाही?
पूरे घटनाक्रम को आसान भाषा में समझें तो संभावित रूप से प्रक्रिया कुछ इस तरह रही—ऊंचाई पर ग्लेशियर का हिस्सा अस्थिर हुआ, फिर बर्फ और चट्टानों का बड़ा द्रव्यमान ढलान से नीचे आया। रास्ते में यह सामग्री पानी और दूसरे मलबे के साथ मिलती गई। इसके बाद नदी में अचानक पानी और मलबे की मात्रा बढ़ी। अगर नदी के किसी संकरे हिस्से में मलबे का अस्थायी अवरोध बना और फिर वह टूट गया, तो अचानक छोड़े गए पानी और मलबे ने बाढ़ की रफ्तार तथा विनाशकारी क्षमता को और बढ़ा दिया होगा।
वैज्ञानिक जांच से तस्वीर होगी और साफ
फिलहाल सैटेलाइट तस्वीरों ने इस आपदा के पीछे ग्लेशियर टूटने, भूस्खलन और मलबे के नदी में पहुंचने की अहम कड़ी जरूर सामने रखी है। लेकिन घटना की पूरी वैज्ञानिक वजह और फ्लैश फ्लड के सटीक क्रम की पुष्टि विस्तृत अध्ययन के बाद ही होगी। NRSC और अन्य विशेषज्ञ संस्थाओं की जांच से आने वाले समय में यह स्पष्ट होने की उम्मीद है कि लांगतांग लिरुंग ग्लेशियर में कितना हिस्सा टूटा, नदी में कितना मलबा पहुंचा और भोटेकोशी में अचानक आई बाढ़ को किस प्रक्रिया ने इतना विनाशकारी बनाया।