रूस और अमेरिका के बीच वर्ष 2011 से प्रभावी न्यू स्टार्ट संधि वैश्विक परमाणु शस्त्र नियंत्रण की अंतिम दीवार मानी जाती थी। इस संधि ने दोनों महाशक्तियों को अपने तैनात सामरिक परमाणु हथियारों की संख्या सीमित रखने के लिए बाध्य किया था। किंतु रूस द्वारा अब इन सीमाओं को मानने से साफ इनकार किए जाने से अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा व्यवस्था एक नए मोड़ पर आ खड़ी हुई है। यह निर्णय उस समूची व्यवस्था को चुनौती देता है जिसने शीत युद्ध के बाद वैश्विक स्थिरता और विश्वास बहाली में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
रूस की आपत्तियाँ और बदलती रणनीतिक सोच
रूस ने यह तर्क दिया है कि मौजूदा भू-राजनीतिक हालात में अमेरिका और НАТО की नीतियाँ उसके सुरक्षा हितों के विरुद्ध जाती हैं, इसलिए वह इन सीमाओं को मानने को बाध्य नहीं है। मास्को का दावा है कि पश्चिमी देशों द्वारा यूक्रेन को दिए जा रहे सैन्य समर्थन और मिसाइल रक्षा प्रणालियाँ उसके सामरिक संतुलन को कमजोर करती हैं। यही कारण है कि रूस ने अपने परमाणु ढांचे को ‘अप्रतिबंधित रूप से’ आगे बढ़ाने की स्वतंत्रता लेनी शुरू कर दी है।
अमेरिका और पश्चिम की चिंताएँ
न्यू स्टार्ट संधि के समाप्त होते ही अमेरिका ने स्पष्ट किया है कि यह कदम वैश्विक परमाणु स्थिरता को गंभीर रूप से प्रभावित करेगा। अमेरिकी रणनीतिक समुदाय का मानना है कि रूस की इस नीति से न केवल पारदर्शिता समाप्त होगी बल्कि आकस्मिक गलतफहमियों की संभावना भी बढ़ जाएगी। पश्चिमी देशों का मानना है कि परमाणु हथियारों के निरीक्षण और सत्यापन का ढांचा टूटने से दोनों देशों के बीच अविश्वास और भी गहरा सकता है, जो किसी भी आकस्मिक संकट को खतरनाक दिशा में धकेल सकता है।
वैश्विक परमाणु दौड़ की नई आशंकाएँ
इस संधि के अंत ने जिस सबसे बड़े खतरे का संकेत दिया है, वह है वैश्विक परमाणु हथियारों की पुनः तीव्र दौड़। चीन पहले ही अपने परमाणु शस्त्रागार को तेज़ी से विस्तार दे रहा है, जबकि उत्तर कोरिया और ईरान जैसे देश भी आक्रामक परमाणु महत्वाकांक्षाओं के लिए जाने जाते हैं। ऐसे में रूस और अमेरिका का नियंत्रण तंत्र से दूर जाना वैश्विक सुरक्षा को बहुध्रुवीय अस्थिरता की ओर धकेल सकता है, जहाँ कई देश अपने परमाणु भंडार को बढ़ाने की दौड़ में शामिल हो सकते हैं।
शांतिपूर्ण विश्व व्यवस्था पर प्रभाव और आगे की राह
संधि का टूटना दुनिया के लिए इस दृष्टि से भी चिंताजनक है कि यह हथियार नियंत्रण की उस परंपरा को कमजोर करता है जिसने दशकों तक युद्ध की आशंकाओं को सीमित रखा। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि रूस और अमेरिका नए संवाद की शुरुआत नहीं करते, तो आने वाले वर्षों में नए हथियार, नई तकनीकें और नए सामरिक समीकरण वैश्विक अस्थिरता को और गहरा कर देंगे। अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए यह आवश्यक हो गया है कि वह दोनों महाशक्तियों को वार्ता की मेज़ पर लाने के प्रयासों को तेज करे, ताकि अनियंत्रित परमाणु विस्तार को रोका जा सके।
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