श्रीलंका के प्राचीन नगर अनुराधापुरा में हुई पुरातात्त्विक खुदाई ने बौद्ध इतिहास और कला जगत को नई चर्चा का विषय दे दिया है। यहां अभयगिरि मंदिर एवं मठ परिसर की एक पुरानी सुरक्षा दीवार के आसपास की खुदाई के दौरान महात्मा बुद्ध की 17 दुर्लभ प्रतिमाएं बरामद की गईं। ये प्रतिमाएं कांस्य से निर्मित हैं और इनके ऊपर सोने की परत चढ़ाई गई है। पुरातत्वविदों के अनुसार यह खोज न केवल मूर्तियों की संख्या के कारण विशेष है, बल्कि उस ऐतिहासिक स्थल के कारण भी अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जा रही है, जहां कभी प्राचीन एशिया के प्रभावशाली बौद्ध केंद्रों में से एक विकसित हुआ था।
30 वर्षों में सबसे महत्वपूर्ण खोजों में एक
श्रीलंका सरकार के केंद्रीय सांस्कृतिक कोष से जुड़े परियोजना प्रबंधक तुसिता हेराथ के अनुसार, संरक्षित पुरातात्त्विक क्षेत्र में पिछले 30 वर्षों के दौरान हुई खोजों में इसे सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियों में गिना जा रहा है। इस क्षेत्र से पहले भी अनेक पुरावशेष प्राप्त हुए हैं, लेकिन एक ही स्थान से इतनी बड़ी संख्या में बुद्ध प्रतिमाओं का मिलना असाधारण माना जा रहा है। पुरातत्व विशेषज्ञ अब यह समझने का प्रयास कर रहे हैं कि इन प्रतिमाओं को किस उद्देश्य से वहां रखा गया था और वे सदियों तक जमीन के भीतर किस प्रकार सुरक्षित रहीं। इस खोज से उस काल के धार्मिक जीवन, कलात्मक परंपराओं और बौद्ध संस्थानों की आर्थिक-सांस्कृतिक समृद्धि के बारे में नए संकेत मिल सकते हैं।
कांस्य की प्रतिमाओं पर चमकती सोने की परत
बरामद की गई 17 प्रतिमाएं ठोस सोने की नहीं, बल्कि कांस्य से बनी हुई बताई गई हैं, जिन पर सोने की परत चढ़ाई गई है। यह तथ्य अपने आप में उस दौर की धातु कला और शिल्प तकनीक के उच्च स्तर की ओर संकेत करता है। पुरातत्वविदों ने प्रतिमाओं की बनावट और शैली की तुलना सातवीं तथा आठवीं शताब्दी से संबंधित अन्य पुरावशेषों से की है। प्रारंभिक आकलन के अनुसार इनकी आयु लगभग 1,200 से 1,300 वर्ष हो सकती है। हालांकि अंतिम निष्कर्ष वैज्ञानिक और पुरातात्त्विक परीक्षणों के बाद ही अधिक स्पष्ट होगा। प्रत्येक प्रतिमा की धातु संरचना, निर्माण तकनीक और कलात्मक विशेषताओं का अध्ययन उस काल के सांस्कृतिक संपर्कों की जानकारी भी दे सकता है।
अभयगिरि मठ था प्राचीन बौद्ध दुनिया का विशाल केंद्र
जिस अभयगिरि परिसर से यह खोज हुई है, उसका बौद्ध इतिहास में विशेष महत्व रहा है। माना जाता है कि प्राचीन काल में यहां एक विशाल बौद्ध मठ विकसित हुआ था, जो शिक्षा, धार्मिक गतिविधियों और बौद्ध दर्शन के अध्ययन का प्रमुख केंद्र बना। ऐतिहासिक मान्यताओं के अनुसार इसकी स्थापना पहली शताब्दी में राजा वट्टगामनी अभय, जिन्हें वलागाम्बा के नाम से भी जाना जाता है, के शासनकाल में हुई थी। समय के साथ यह परिसर श्रीलंका की सीमाओं से आगे निकलकर एशिया के विभिन्न हिस्सों से जुड़े बौद्ध जगत में प्रभावशाली केंद्र के रूप में उभरा।
500 एकड़ से अधिक क्षेत्र में फैली थी भव्य विरासत
अनुराधापुरा के उत्तरी क्षेत्र में स्थित अभयगिरि परिसर का विस्तार कभी 500 एकड़ से अधिक क्षेत्र में माना जाता था। अपने उत्कर्ष के दौर में यहां हजारों बौद्ध भिक्षुओं के निवास और अध्ययन की व्यवस्था होने की बात कही जाती है। कुछ ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार यहां 5,000 से अधिक भिक्षु निवास करते थे। इतना विशाल धार्मिक और शैक्षणिक केंद्र केवल स्थानीय आस्था का स्थल नहीं था, बल्कि यह प्राचीन एशिया में विचारों, दर्शन और सांस्कृतिक आदान-प्रदान का भी महत्वपूर्ण केंद्र रहा होगा। इसलिए यहां मिलने वाला प्रत्येक पुरावशेष उस समय के समाज और बौद्ध संस्कृति को समझने में नई जानकारी दे सकता है।
पुरानी सुरक्षा दीवार की खुदाई में कैसे मिला खजाना
यह दुर्लभ खोज अभयगिरि परिसर की एक पुरानी सुरक्षा दीवार से जुड़े क्षेत्र की पुरातात्त्विक खुदाई के दौरान सामने आई। विशेषज्ञों के लिए अब सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि इतनी बड़ी संख्या में प्रतिमाएं एक ही स्थान पर क्यों और कैसे पहुंचीं। संभव है कि किसी विशेष धार्मिक परंपरा के तहत इन्हें सुरक्षित रखा गया हो, अथवा किसी ऐतिहासिक संकट, आक्रमण या अन्य परिस्थिति में इन्हें जमीन के भीतर छिपाया गया हो। फिलहाल इन संभावनाओं पर अंतिम निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी। विस्तृत वैज्ञानिक जांच से प्रतिमाओं के साथ मिली मिट्टी, अन्य अवशेषों और उनके पुरातात्त्विक संदर्भ का अध्ययन किया जाएगा।
वैज्ञानिक जांच से खुलेगा प्रतिमाओं का असली इतिहास
पुरातत्व विभाग ने बरामद प्रतिमाओं को आगे की जांच के लिए भेज दिया है। वैज्ञानिक परीक्षणों से इनके निर्माण काल, धातु संरचना, सोने की परत चढ़ाने की तकनीक और संरक्षण की स्थिति का अधिक सटीक आकलन किया जा सकेगा। प्रारंभिक शैलीगत अध्ययन इन्हें लगभग 1,200 से 1,300 वर्ष पुराना मान रहा है, लेकिन वैज्ञानिक परीक्षण इस अनुमान को और मजबूत या संशोधित कर सकते हैं। पुरातत्व के क्षेत्र में किसी वस्तु का महत्व केवल उसकी आयु से तय नहीं होता, बल्कि उसके मिलने के स्थान और आसपास के संदर्भ से भी उसका इतिहास समझा जाता है। यही कारण है कि खुदाई स्थल का विस्तृत अध्ययन इन 17 प्रतिमाओं जितना ही महत्वपूर्ण होगा।
अभयगिरि संग्रहालय में प्रदर्शित किए जाने की तैयारी
प्रारंभिक जांच और संरक्षण प्रक्रिया पूरी होने के बाद इन दुर्लभ प्रतिमाओं को आम लोगों के दर्शन के लिए अभयगिरि संग्रहालय में प्रदर्शित किए जाने की संभावना जताई गई है। यदि ऐसा होता है तो यह खोज श्रीलंका की सांस्कृतिक विरासत और पर्यटन के लिए भी महत्वपूर्ण आकर्षण बन सकती है। संग्रहालय में प्रदर्शित किए जाने से पहले प्रतिमाओं को आवश्यक संरक्षण प्रक्रिया से गुजारा जाएगा, ताकि उनकी धातु संरचना और स्वर्ण परत को सुरक्षित रखा जा सके। सदियों तक मिट्टी के भीतर रहने के बाद किसी पुरावशेष को खुले वातावरण में लाना भी विशेषज्ञों के लिए सावधानी और वैज्ञानिक संरक्षण की मांग करता है।
भारत और श्रीलंका की साझा बौद्ध विरासत से भी जुड़ी खोज
महात्मा बुद्ध के जीवन और बौद्ध धर्म का उद्भव भारतीय उपमहाद्वीप से जुड़ा रहा है, जबकि श्रीलंका बौद्ध परंपरा के संरक्षण और विस्तार का एक प्रमुख ऐतिहासिक केंद्र रहा है। दोनों देशों के बीच बौद्ध विरासत सांस्कृतिक संबंधों की एक महत्वपूर्ण कड़ी है। अनुराधापुरा जैसी खोजें इस साझा ऐतिहासिक धरोहर को समझने के लिए भी विशेष महत्व रखती हैं। प्राचीन काल में भारत और श्रीलंका के बीच समुद्री संपर्क, धार्मिक यात्राओं और विद्वानों के आवागमन ने बौद्ध विचारों के प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। ऐसे में अभयगिरि परिसर से मिलने वाले नए पुरावशेष भविष्य में उस व्यापक सांस्कृतिक संवाद के और प्रमाण सामने ला सकते हैं।
17 प्रतिमाओं ने जगाई इतिहास के नए अध्याय की उम्मीद
एक ही पुरातात्त्विक स्थल से 17 स्वर्णमंडित बुद्ध प्रतिमाओं का मिलना इतिहासकारों और पुरातत्वविदों के सामने कई नए प्रश्न लेकर आया है। इन प्रतिमाओं का निर्माण किस काल में हुआ, इन्हें एक साथ क्यों रखा गया और उस समय अभयगिरि मठ की धार्मिक तथा आर्थिक स्थिति क्या थी, इन सभी प्रश्नों के उत्तर आने वाले शोध से सामने आ सकते हैं। यह खोज केवल जमीन के भीतर से निकली प्राचीन मूर्तियों का मामला नहीं है, बल्कि सदियों पुराने उस समाज की झलक पाने का अवसर है, जिसने कला, आस्था और ज्ञान की अपनी विशिष्ट परंपरा विकसित की थी।
श्रीलंका की यह दुर्लभ खोज एक बार फिर यह याद दिलाती है कि धरती की परतों के नीचे इतिहास के अनेक अध्याय अब भी छिपे हो सकते हैं। आधुनिक वैज्ञानिक तकनीक और व्यवस्थित पुरातात्त्विक शोध के माध्यम से जब ऐसे अवशेष सामने आते हैं, तो वे केवल अतीत की वस्तुएं नहीं रहते, बल्कि मानव सभ्यता की सांस्कृतिक यात्रा को समझने का नया माध्यम बन जाते हैं। अनुराधापुरा के अभयगिरि परिसर से मिलीं ये 17 प्रतिमाएं आने वाले समय में प्राचीन बौद्ध कला और श्रीलंका के इतिहास पर महत्वपूर्ण शोध का आधार बन सकती हैं।