नई दिल्ली। ब्रिक्स समिट के दौरान अमेरिकी डॉलर के वर्चस्व को कम करने के लिए BRICS करेंसी की चर्चा लगातार बढ़ती जा रही है। हालांकि, यह समझना जरूरी है कि फिलहाल BRICS देशों की ओर से यूरो जैसी कोई एक साझा मुद्रा लागू नहीं की गई है। इसके बजाय सदस्य देश स्थानीय मुद्राओं में व्यापार, सीमा-पार भुगतान व्यवस्था और वैकल्पिक वित्तीय तंत्र विकसित करने पर जोर दे रहे हैं। इसी व्यापक प्रक्रिया को अक्सर डी-डॉलराइजेशन कहा जाता है।
क्या है BRICS करेंसी?
BRICS करेंसी की अवधारणा का मतलब ऐसी वैकल्पिक मौद्रिक या भुगतान व्यवस्था से है, जिससे सदस्य देशों के बीच व्यापार में अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता कम की जा सके। इसे यूरो जैसी साझा मुद्रा के रूप में भी चर्चा में लाया गया है, लेकिन फिलहाल ऐसा कोई साझा BRICS नोट या आधिकारिक एकल मुद्रा अस्तित्व में नहीं है। व्यावहारिक तौर पर BRICS के भीतर स्थानीय मुद्राओं में सीधे व्यापार और सीमा-पार भुगतान के लिए वैकल्पिक प्रणालियों को बढ़ावा देने की दिशा में प्रयास अधिक महत्वपूर्ण हैं।
BRICS में दो तरह के मॉडल की चर्चा
BRICS की वैकल्पिक भुगतान व्यवस्था को लेकर मुख्य रूप से दो विचार सामने आते रहे हैं। पहला मॉडल एक साझा मुद्रा बनाने का है, जो यूरो की तरह सदस्य देशों के बीच व्यापार में इस्तेमाल हो सके। दूसरा और अपेक्षाकृत व्यावहारिक मॉडल यह है कि भारत, चीन, रूस और अन्य सदस्य देश अपनी-अपनी राष्ट्रीय मुद्राओं में आपसी व्यापार बढ़ाएं। इसके लिए बैंकिंग और डिजिटल भुगतान प्रणालियों के बीच बेहतर कनेक्टिविटी विकसित करने पर जोर दिया जा सकता है।
भारत का क्या है रुख?
भारत ने साझा BRICS मुद्रा को लेकर अपेक्षाकृत सतर्क और व्यावहारिक रुख अपनाया है। भारत का जोर डॉलर को तुरंत हटाने के बजाय राष्ट्रीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाने पर रहा है। भारत के लिए रुपये में अंतरराष्ट्रीय व्यापार को बढ़ावा देना महत्वपूर्ण है। साथ ही डिजिटल भुगतान के क्षेत्र में भारत का UPI और अन्य तकनीकी ढांचा सीमा-पार भुगतान को आसान बनाने की क्षमता रखता है। ऐसे में भारत की प्राथमिकता किसी एक नई साझा मुद्रा से ज्यादा स्थानीय मुद्राओं और बेहतर भुगतान प्रणालियों को बढ़ावा देना मानी जाती है।
डी-डॉलराइजेशन क्या है?
अंतरराष्ट्रीय व्यापार और वित्तीय लेनदेन में अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता कम करने की प्रक्रिया को डी-डॉलराइजेशन कहा जाता है। BRICS देशों में इस दिशा में बढ़ती चर्चा इसी व्यापक बदलाव का हिस्सा है। यदि सदस्य देश आपसी व्यापार में राष्ट्रीय मुद्राओं का इस्तेमाल बढ़ाते हैं, तो उन्हें हर लेनदेन में डॉलर में भुगतान करने की जरूरत कम हो सकती है। इससे डॉलर की मांग और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय व्यवस्था पर उसके प्रभाव में धीरे-धीरे बदलाव संभव है।
ग्लोबल साउथ पर क्या होगा असर?
BRICS देशों की वैकल्पिक भुगतान व्यवस्था सफल होती है तो इसका प्रभाव केवल सदस्य देशों तक सीमित नहीं रहेगा। विकासशील देशों के लिए डॉलर पर निर्भरता कम करने के नए विकल्प खुल सकते हैं। स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ने से विनिमय दर के जोखिम को कुछ हद तक कम करने और वित्तीय स्वायत्तता बढ़ाने में मदद मिल सकती है। इसके अलावा, अलग-अलग भुगतान नेटवर्क विकसित होने से वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में विकल्पों की संख्या भी बढ़ सकती है।
BRICS करेंसी की राह में सबसे बड़ी चुनौतियां
साझा मुद्रा या पूरी तरह एकीकृत वित्तीय व्यवस्था तैयार करना आसान नहीं है। BRICS देशों की अर्थव्यवस्थाओं, महंगाई दरों, ब्याज दरों, राजकोषीय नीतियों और राजनीतिक प्राथमिकताओं में काफी अंतर है। एक साझा मुद्रा के लिए मजबूत संस्थागत ढांचे और किसी केंद्रीय मौद्रिक प्राधिकरण जैसी व्यवस्था की जरूरत होगी। इसके लिए सदस्य देशों को अपनी मौद्रिक नीतियों से जुड़े कुछ अधिकार साझा करने पड़ सकते हैं। इसके अलावा, सदस्य देशों के बीच भू-राजनीतिक मतभेद और आर्थिक हितों का अंतर भी बड़ी चुनौती है। खासकर भारत और चीन जैसे बड़े देशों के बीच रणनीतिक प्रतिस्पर्धा को देखते हुए किसी साझा मौद्रिक ढांचे पर व्यापक सहमति बनाना जटिल हो सकता है।
क्या BRICS डॉलर को खत्म कर देगा?
फिलहाल ऐसा कहना जल्दबाजी होगी। BRICS की दिशा को डॉलर को तुरंत खत्म करने की बजाय डॉलर पर निर्भरता कम करने और वैकल्पिक भुगतान विकल्प विकसित करने के प्रयास के तौर पर देखना ज्यादा सही है। अमेरिकी डॉलर अभी भी वैश्विक व्यापार, वित्तीय बाजारों और विदेशी मुद्रा भंडार में बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसलिए BRICS की वैकल्पिक व्यवस्था का असर धीरे-धीरे सामने आने की संभावना है, न कि किसी एक फैसले से पूरी वैश्विक वित्तीय व्यवस्था बदल जाएगी।