हाल के वर्षों में जेनरेशन-ज़ी को सबसे आधुनिक विचारों वाली पीढ़ी माना जाता रहा है, लेकिन अब यही पीढ़ी बुद्धिमत्ता के मानकों पर पिछड़ती दिख रही है। सोशल मीडिया पर उनके ट्रेंड, रील-कल्चर और डिजिटल दुनिया की समझ भले ही तेज हो, किन्तु कई शोध यह संकेत देते हैं कि संज्ञानात्मक क्षमताओं में यह पीढ़ी अपेक्षाकृत कमजोर है। विशेषज्ञों के अनुसार पहली बार ऐसा हुआ है जब नई पीढ़ी की औसत बौद्धिक क्षमता पिछली पीढ़ियों से कम दर्ज की गई है, जिसने समाज और शिक्षा जगत में नई बहस खड़ी कर दी है।
कौन हैं मिलेनियल्स, जेन-ज़ी और जेन-अल्फा
पीढ़ियों की परिभाषा समझने से इस बहस की गंभीरता स्पष्ट होती है। 1981 से 1996 के बीच जन्मे लोग मिलेनियल्स कहलाते हैं, जो डिजिटल विकास के साक्षी बने। इसके बाद 1997 से 2010 के बीच जन्मे बच्चे जेन-ज़ी हैं जिन्होंने तकनीक को जीवन के केंद्र में पाया। 2010 से आगे पैदा होने वाली पीढ़ी जेन-अल्फा है, जो पूरी तरह डिजिटल स्क्रीन के बीच पनप रही है। माना जा रहा है कि जेन-ज़ी वह पहला समूह है जिसमें अपने पूर्ववर्तियों की तुलना में आईक्यू स्तर में गिरावट दर्ज हुई है।
पहली बार दर्ज हुआ इंटर-जनरेशनल आईक्यू ड्रॉप
न्यूरोसाइंटिस्ट डॉ. जेरेड कूनी होर्वाथ द्वारा अमेरिकी सीनेट में प्रस्तुत आंकड़ों ने वैश्विक शिक्षा जगत को चौंका दिया है। उनके अनुसार, जेन-ज़ी के औसत आईक्यू स्कोर अपने माता-पिता और मिलेनियल्स की तुलना में कम पाए गए हैं। ध्यान, स्मरण शक्ति, पढ़ने की क्षमता, विश्लेषण और समस्या-समाधान जैसी कॉग्निटिव क्षमताओं में भी गिरावट देखी गई है। यह रुझान लगभग 2010 के बाद शुरू हुआ और आज 80 से अधिक देशों में पाया जा रहा है, विशेष रूप से उन स्थानों पर जहां कक्षा में तकनीक का अधिक उपयोग होता है।
क्या स्क्रीन टाइम है सबसे बड़ी वजह
डिजिटल क्रांति के केंद्र में जीने वाली जेन-ज़ी पर स्क्रीन टाइम का गहरा प्रभाव पड़ा है। मोबाइल, टैबलेट और सोशल मीडिया के निरंतर उपयोग ने पढ़ने की आदतों को बदल दिया है। छोटे वीडियो और रील्स से मिलने वाली तेज लेकिन सतही जानकारी गहरे चिंतन की क्षमता को कमजोर करती है। क्लासरूम में डिजिटल डिवाइस का बढ़ता प्रयोग, आमने-सामने संवाद में कमी और त्वरित मनोरंजन की आदतें गहन सोच और विश्लेषण क्षमता पर असर डालती दिख रही हैं, जो आईक्यू स्तर को प्रभावित करने वाले मूल कारक माने जा रहे हैं।
क्या सचमुच कम बुद्धिमान है यह पीढ़ी
यह निष्कर्ष अभी अंतिम नहीं है, लेकिन वैश्विक शोधों का यह पैटर्न गंभीर संकेत देता है। समस्या केवल आईक्यू स्कोर की नहीं, बल्कि उस संज्ञानात्मक क्षमता की है जो मनुष्य को गहरे विचार, रचनात्मकता और व्यवहारिक समझ की ओर ले जाती है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि डिजिटल निर्भरता इसी गति से बढ़ती रही और पुस्तकीय अध्ययन व व्यक्तिगत संवाद कम होता रहा, तो आने वाली पीढ़ियों में बौद्धिक क्षमताओं का लगातार गिरना एक वास्तविकता बन सकता है।
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