मध्य प्रदेश के धार से प्राप्त इस ऐतिहासिक प्रतिमा को लंबे समय तक पुरातत्वविद और आमजन ज्ञान की देवी मां सरस्वती की प्रतिमा मानते रहे। हालांकि हाल ही में भोपाल स्थित राज्य संग्रहालय में संरक्षित इस दुर्लभ मूर्ति का अत्याधुनिक 3डी डिजिटल मैपिंग और वैज्ञानिक विश्लेषण किया गया, जिसमें कई ऐसे सूक्ष्म तथ्य सामने आए जिन्होंने इसकी पहचान पूरी तरह बदल दी। शोधकर्ताओं का निष्कर्ष है कि प्रतिमा की संरचना, हाथों में धारण किए गए प्रतीक और शास्त्रीय विवरण इसे देवी गायत्री के स्वरूप से जोड़ते हैं। इस खोज ने भारतीय पुरातत्व और धार्मिक इतिहास से जुड़े एक महत्वपूर्ण अध्याय को नया आयाम प्रदान किया है।
3डी डिजिटल मैपिंग से सामने आए अहम साक्ष्य
इस ऐतिहासिक निष्कर्ष के पीछे आधुनिक 3डी डिजिटल मैपिंग तकनीक की महत्वपूर्ण भूमिका रही। हाई-रिजॉल्यूशन स्कैनिंग के माध्यम से प्रतिमा के प्रत्येक सूक्ष्म हिस्से का डिजिटल दस्तावेजीकरण किया गया। गहन विश्लेषण में प्रतिमा के हाथों की मुद्रा, अलंकरण और आयुधों के ऐसे बारीक विवरण सामने आए, जिन्हें सामान्य दृष्टि से स्पष्ट रूप से पहचानना संभव नहीं था। वैज्ञानिक जांच ने यह साबित किया कि प्रतिमा में मौजूद प्रतीक पारंपरिक सरस्वती प्रतिमाओं से अलग हैं और देवी गायत्री के शास्त्रीय स्वरूप से अधिक मेल खाते हैं।
वीणा नहीं, वेद और कमल बने पहचान का आधार
शोध का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष प्रतिमा के हाथों में धारण किए गए आयुधों से जुड़ा रहा। मां सरस्वती की प्रतिमाओं में सामान्यतः वीणा प्रमुख पहचान मानी जाती है, लेकिन विस्तृत 3डी विश्लेषण में इस प्रतिमा में वीणा का कोई प्रमाण नहीं मिला। इसके स्थान पर प्रतिमा में वेद, कमल का पुष्प और अन्य धार्मिक प्रतीक स्पष्ट रूप से दिखाई दिए। सनातन धर्मग्रंथों में वेद और कमल देवी गायत्री के प्रमुख प्रतीकों के रूप में वर्णित हैं। यही तथ्य इस प्रतिमा की वास्तविक पहचान स्थापित करने का सबसे मजबूत आधार बना।
चालुक्य कला शैली और शास्त्रीय प्रमाणों का मिला समर्थन
नवीन अध्ययन में यह भी सामने आया कि प्रतिमा पर धार के परमार शासकों की कला शैली की अपेक्षा पश्चिमी चालुक्य मूर्तिकला शैली का अधिक प्रभाव दिखाई देता है। प्रतिमा की शारीरिक भंगिमा, अलंकरण, मुकुट और शिल्प शैली चालुक्य परंपरा से मेल खाते हैं। इसके अतिरिक्त दाहिने पैर के समीप उकेरा गया हंस, हाथों में अक्षमाला, कमल और वेद जैसे प्रतीक भी देवी गायत्री के स्वरूप की पुष्टि करते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इन विशेषताओं ने इस प्रतिमा की पहचान को लेकर लंबे समय से चली आ रही भ्रांति को समाप्त कर दिया है।
वेदों और पुराणों के वर्णन से मिली अंतिम पुष्टि
शोधकर्ताओं ने प्रतिमा की तुलना ऋग्वेद, शतपथ ब्राह्मण, पद्म पुराण सहित अनेक प्राचीन ग्रंथों में वर्णित देवी गायत्री के स्वरूप से की। अध्ययन में पाया गया कि प्रतिमा के आयुध, मुद्रा, वाहन और शिल्पगत विशेषताएं शास्त्रीय वर्णनों से लगभग पूरी तरह मेल खाती हैं। यही कारण है कि अब विशेषज्ञ इसे मां सरस्वती नहीं बल्कि वेदमाता देवी गायत्री की दुर्लभ और ऐतिहासिक प्रतिमा मान रहे हैं। यह खोज न केवल भारतीय पुरातत्व के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि है, बल्कि धार के सांस्कृतिक और ऐतिहासिक महत्व को भी नई पहचान देने वाली मानी जा रही है।