मध्यप्रदेश के सरकारी शिक्षकों के लिए 100 प्रतिशत वेतन से जुड़ा मामला अब अहम मोड़ पर पहुंच गया है। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने परिवीक्षा अवधि में 70%, 80% और 90% वेतन दिए जाने के खिलाफ दायर याचिका पर फैसला सुरक्षित रख लिया है।मामला स्कूल शिक्षा विभाग और ट्राइबल शिक्षा विभाग के उच्च माध्यमिक, माध्यमिक और प्राथमिक शिक्षकों से जुड़ा है। याचिकाकर्ताओं ने परिवीक्षा अवधि के दौरान कम वेतन दिए जाने को चुनौती देते हुए नियुक्ति की तारीख से 100 प्रतिशत वेतन और बकाया राशि देने की मांग की है।अगर फैसला शिक्षकों के पक्ष में आता है, तो प्रभावित शिक्षकों को बकाया अंतर राशि के साथ 7 प्रतिशत वार्षिक ब्याज मिलने का रास्ता भी खुल सकता है।
सोमवार को मध्यप्रदेश हाईकोर्ट में कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश एवं न्यायमूर्ति प्रदीप मित्तल की खंडपीठ के समक्ष मामले की सुनवाई हुई।याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता धीरज तिवारी ने पक्ष रखा। सुनवाई के दौरान 70-80-90 प्रतिशत वेतन व्यवस्था को कानूनी और संवैधानिक आधारों पर चुनौती देते हुए विस्तृत दलीलें पेश की गईं।दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने मामले में अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। अब शिक्षकों को कोर्ट के अंतिम निर्णय का इंतजार है।
नियमित नियुक्ति के बाद कम वेतन क्यों?
याचिकाकर्ताओं की ओर से कोर्ट में मुख्य तर्क यह रखा गया कि संबंधित शिक्षक किसी अस्थायी या मानदेय व्यवस्था के तहत नियुक्त नहीं हुए हैं। उन्होंने निर्धारित पात्रता परीक्षा और नियमित चयन प्रक्रिया पूरी करने के बाद स्वीकृत नियमित पदों पर नियुक्ति प्राप्त की है।इसके बावजूद परिवीक्षा अवधि के दौरान उन्हें पहले वर्ष में 70%, दूसरे वर्ष में 80% और तीसरे वर्ष में 90% वेतन दिया गया।याचिकाकर्ताओं का कहना है कि उनसे नियमित शिक्षकों की तरह ही पूरा काम और जिम्मेदारियां ली गईं, तो फिर उन्हें पूर्ण वेतन से वंचित रखने का आधार क्या है।
समान काम तो वेतन में अंतर क्यों?
शिक्षकों की ओर से अदालत में यह भी तर्क दिया गया कि जब कार्य, दायित्व और जिम्मेदारियां समान हैं, तो केवल परिवीक्षा अवधि के आधार पर वेतन का एक हिस्सा रोकना समानता के संवैधानिक सिद्धांत और समान कार्य के लिए समान वेतन की अवधारणा के विपरीत है।याचिकाकर्ताओं ने यह भी कहा कि विधिवत चयनित होकर नियमित स्वीकृत पद पर नियुक्त कर्मचारी को स्टाइपेंड या कम वेतन की व्यवस्था में रखना उचित नहीं माना जाना चाहिए।
पुराने न्यायिक फैसलों का भी दिया गया हवाला
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से समान प्रकृति के पहले के न्यायिक फैसलों का हवाला दिया गया। इसके अलावा 12 दिसंबर 2019 के सामान्य प्रशासन विभाग के परिपत्र से संबंधित न्यायिक निर्णयों को भी कोर्ट के सामने रखा गया।याचिका में यह आधार लिया गया है कि परिवीक्षा अवधि के दौरान कम वेतन दिए जाने की व्यवस्था से संबंधित मुद्दा पहले भी न्यायिक परीक्षण से गुजर चुका है।याचिकाकर्ताओं ने हाईकोर्ट से वर्तमान मामले में भी समान न्यायिक संरक्षण देने की मांग की है।
100% वेतन के साथ एरियर और 7% ब्याज की मांग
शिक्षकों की ओर से हाईकोर्ट में केवल भविष्य में पूरा वेतन देने की मांग नहीं की गई है, बल्कि परिवीक्षा अवधि के दौरान रोकी गई पूरी अंतर राशि का भुगतान करने की भी मांग की गई है।याचिकाकर्ताओं ने मांग की है कि नियुक्ति की तारीख से 100 प्रतिशत वेतन का लाभ दिया जाए और पहले, दूसरे तथा तीसरे वर्ष में रोकी गई बकाया वेतन राशि का भुगतान किया जाए।इसके साथ ही बकाया राशि पर उसके देय होने की तारीख से वास्तविक भुगतान तक 7 प्रतिशत वार्षिक ब्याज देने की मांग भी की गई है।
2019 और 2020 की अधिसूचनाओं को दी चुनौती
याचिका में 24 दिसंबर 2019 और 24 फरवरी 2020 की अधिसूचनाओं के तहत लागू स्टाइपेंड आधारित परिवीक्षा व्यवस्था और 12 दिसंबर 2019 के संबंधित परिपत्र के आधार पर वेतन में की गई कटौती को चुनौती दी गई है।याचिकाकर्ताओं ने पूरा वेतन देने के साथ इससे जुड़े सभी परिणामी आर्थिक लाभ प्रदान करने की मांग की है।
फैसला शिक्षकों के लिए क्यों अहम?
यह मामला प्रदेश के स्कूल शिक्षा विभाग और ट्राइबल शिक्षा विभाग में 70-80-90 प्रतिशत वेतन व्यवस्था से प्रभावित उच्च माध्यमिक, माध्यमिक और प्राथमिक शिक्षकों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।फिलहाल हाईकोर्ट ने फैसला सुरक्षित रखा है, इसलिए अभी यह तय नहीं हुआ है कि शिक्षकों को 100 प्रतिशत वेतन या 7 प्रतिशत ब्याज के साथ एरियर मिलेगा या नहीं।अगर कोर्ट याचिकाकर्ताओं के पक्ष में फैसला सुनाता है, तो प्रभावित शिक्षकों के लिए 100 प्रतिशत वेतन, बकाया अंतर राशि और उस पर 7 प्रतिशत वार्षिक ब्याज का रास्ता खुल सकता है।