ओंकारेश्वर (मध्य प्रदेश)। सावन का महीना भगवान शिव की आराधना का सबसे पवित्र समय माना जाता है। इस विशेष श्रृंखला में हम आपको भारत के 12 ज्योतिर्लिंगों से परिचित करा रहे हैं। सोमनाथ, मल्लिकार्जुन और महाकालेश्वर के बाद आज बात करते हैं चौथे ज्योतिर्लिंग श्री ओंकारेश्वर की, जो मध्य प्रदेश के खंडवा जिले में पवित्र नर्मदा नदी के बीच स्थित है। यह ऐसा तीर्थ है, जहां आस्था, इतिहास, आध्यात्म और प्रकृति का अद्भुत संगम देखने को मिलता है।
'ॐ' आकार के द्वीप पर विराजमान हैं भगवान ओंकारेश्वर
ओंकारेश्वर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह मंदिर नर्मदा नदी के बीच बने एक ऐसे द्वीप पर स्थित है, जिसका स्वरूप ऊपर से देखने पर 'ॐ' (ओम्) जैसा दिखाई देता है। इसी कारण इस स्थान का नाम ओंकारेश्वर पड़ा। यह भारत के उन चुनिंदा तीर्थों में शामिल है, जहां प्रकृति और आध्यात्म एक साथ अनुभव किए जा सकते हैं। धार्मिक मान्यता है कि तीनों लोकों का भ्रमण करने के बाद भगवान शिव यहां विश्राम करते हैं। इसी परंपरा के कारण मंदिर में आज भी विशेष शयन पूजा और रात्रि अनुष्ठानों का आयोजन होता है।
पुराणों में वर्णित है ओंकारेश्वर का महत्व
स्कंद पुराण, शिव पुराण और वायु पुराण सहित अनेक प्राचीन ग्रंथों में ओंकारेश्वर की महिमा का उल्लेख मिलता है। मान्यता है कि यहां दर्शन और जलाभिषेक करने से भगवान शिव की विशेष कृपा प्राप्त होती है तथा जीवन के संकट दूर होते हैं।
विंध्य पर्वत की तपस्या से जुड़ी है पहली कथा
पौराणिक मान्यता के अनुसार विंध्य पर्वत ने अपने अपराधों के प्रायश्चित के लिए भगवान शिव की कठोर तपस्या की। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने यहां दिव्य स्वरूप में प्रकट होकर भक्त को दर्शन दिए। इसी घटना को ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग की स्थापना का आधार माना जाता है।
राजा मंधाता की तपस्या से जुड़ा दूसरा प्रसंग
एक अन्य प्रसिद्ध कथा के अनुसार सूर्यवंश के महान राजा मंधाता ने इसी स्थान पर वर्षों तक भगवान शिव की आराधना की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रकट हुए। आज जिस द्वीप पर मंदिर स्थित है, उसे मंधाता द्वीप के नाम से भी जाना जाता है।
आदि शंकराचार्य से भी जुड़ा है यह तीर्थ
ओंकारेश्वर केवल ज्योतिर्लिंग ही नहीं, बल्कि अद्वैत वेदांत की परंपरा का भी महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता है। परंपरा के अनुसार यहीं भगवान शिव की नगरी में आदि शंकराचार्य की भेंट उनके गुरु गोविन्द भगवत्पाद से हुई थी। मंदिर के समीप स्थित गुफा आज भी श्रद्धालुओं और आध्यात्मिक साधकों के लिए आकर्षण का प्रमुख केंद्र है।
दो मंदिर, समान आस्था
ओंकारेश्वर धाम की एक विशेषता यह भी है कि यहां दो प्राचीन शिव मंदिर हैं—
- श्री ओंकारेश्वर मंदिर (नर्मदा के मध्य द्वीप पर)
- श्री ममलेश्वर मंदिर (नर्मदा के दक्षिणी तट पर)
- श्रद्धालु दोनों मंदिरों के दर्शन को यात्रा का अभिन्न हिस्सा मानते हैं। धार्मिक परंपराओं में दोनों का समान महत्व बताया गया है।
इतिहास के कई दौर का साक्षी है मंदिर
इतिहासकारों के अनुसार मंदिर का मूल निर्माण मध्यकाल में परमार शासकों के समय हुआ था। समय-समय पर इस पवित्र धाम ने अनेक उतार-चढ़ाव देखे। बाद में मराठा शासनकाल में होल्कर राजवंश, विशेष रूप से अहिल्याबाई होल्कर, ने इसके संरक्षण और पुनरुद्धार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। आज यह मंदिर देश के प्रमुख धार्मिक और सांस्कृतिक धरोहर स्थलों में गिना जाता है।
परिक्रमा का विशेष महत्व
ओंकारेश्वर आने वाले श्रद्धालु केवल दर्शन ही नहीं करते, बल्कि यहां की प्रसिद्ध परिक्रमा भी करते हैं। छोटी और बड़ी—दोनों प्रकार की परिक्रमा धार्मिक दृष्टि से अत्यंत फलदायी मानी जाती हैं। नर्मदा तट, प्राचीन घाट, आश्रम और मंदिर इस यात्रा को आध्यात्मिक अनुभव बना देते हैं।
सावन में बढ़ जाता है भक्तों का सैलाब
सावन माह, महाशिवरात्रि और प्रत्येक सोमवार को यहां लाखों श्रद्धालु पहुंचते हैं। भगवान शिव का जलाभिषेक, रुद्राभिषेक, पंचामृत पूजन, नर्मदा आरती और विशेष शोभायात्राएं इस धाम की प्रमुख धार्मिक परंपराएं हैं। शाम के समय कोटितीर्थ घाट पर होने वाली नर्मदा आरती श्रद्धालुओं के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र होती है।
Key Highlights
- ओंकारेश्वर भगवान शिव का चौथा ज्योतिर्लिंग माना जाता है।
- मंदिर नर्मदा नदी के बीच 'ॐ' आकार के द्वीप पर स्थित है।
- विंध्य पर्वत, राजा मंधाता और आदि शंकराचार्य से जुड़ी हैं प्रमुख मान्यताएं।
- ओंकारेश्वर और ममलेश्वर दोनों मंदिरों का समान धार्मिक महत्व।
- सावन और महाशिवरात्रि पर लाखों श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं।
FAQ
Q. ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग कहाँ स्थित है?
मध्य प्रदेश के खंडवा जिले में नर्मदा नदी के मध्य स्थित मंधाता द्वीप पर।
Q. ओंकारेश्वर कौन-सा ज्योतिर्लिंग है?
यह भगवान शिव का चौथा ज्योतिर्लिंग माना जाता है।
Q. ओंकारेश्वर की सबसे बड़ी विशेषता क्या है?
यह मंदिर 'ॐ' आकार के प्राकृतिक द्वीप पर स्थित है और इसके सामने ममलेश्वर मंदिर भी विशेष महत्व रखता है।
Q. सावन में यहां कौन-कौन से आयोजन होते हैं?
जलाभिषेक, रुद्राभिषेक, नर्मदा आरती, शोभायात्रा और विशेष पूजा-अर्चना का आयोजन होता है।