रतलाम। आमतौर पर परिवार के किसी सदस्य के निधन के बाद श्रद्धांजलि और तेरहवीं का आयोजन किया जाता है, लेकिन रतलाम जिले के ग्राम कमेड़ में एक किसान ने अपने दो बैलों को भी परिवार का सदस्य मानकर उनकी मृत्यु के बाद तेरहवीं की रस्म निभाई। करीब दो दशक तक खेती में परिवार का साथ देने वाले ‘मामा-भांजा’नाम के दोनों बैलों की संयुक्त तेरहवीं पर पूरे गांव के लिए भोज रखा गया। किसान के इस भाव से ग्रामीण भी भावुक हो गए।
पिता 20 साल पहले लेकर आए थे ‘मामा-भांजा’
ग्राम कमेड़ निवासी दिनेश पुत्र शंभूलाल पाटीदार ने बताया कि उनके पिता करीब 20 साल पहले दो बैल लेकर आए थे। दोनों का नाम मामा और भांजा रखा गया था। पिता का कहना था कि ये सिर्फ पशु नहीं, बल्कि परिवार के सदस्य हैं। इसी भावना के साथ दोनों बैलों का वर्षों तक परिवार के सदस्यों की तरह पालन-पोषण किया गया।
खेत से घर तक निभाया साथ
दोनों बैल करीब दो दशक तक परिवार के साथ खेती के काम में जुटे रहे। दिनेश के मुताबिक, दोनों का परिवार से इतना लगाव था कि वे कई बार खेत से घर और घर से खेत तक बिना किसी के साथ खुद ही आ-जा जाते थे। वर्षों तक खेती में साथ देने के कारण परिवार के लोगों का उनसे गहरा भावनात्मक जुड़ाव हो गया था।
एक की 2024 में, दूसरे की 13 दिन पहले मौत
‘मामा’ नाम के बैल की मौत वर्ष 2024 में हो गई थी। वहीं ‘भांजा’ नाम के बैल ने करीब 13 दिन पहले दम तोड़ दिया। इसके बाद परिवार ने दोनों की संयुक्त तेरहवीं करने का फैसला लिया। शनिवार को विधि-विधान से क्रियाकर्म के बाद पूरे गांव के लोगों के लिए भोज का आयोजन किया गया।
तेरहवीं में शामिल हुआ पूरा गांव
किसान के परिवार ने दोनों बैलों को श्रद्धांजलि देने के लिए ग्रामीणों को भोज कराया। इस मौके पर ग्रामीण भी भावुक नजर आए। परिवार का कहना है कि दोनों बैलों ने करीब 20 साल तक खेत और परिवार का साथ निभाया, इसलिए उनके लिए उनका जाना किसी परिवार के सदस्य को खोने जैसा है।
उज्जैन में किया अस्थियों का विसर्जन
दिनेश पाटीदार के पास करीब 24 बीघा जमीन है और वे खेती करते हैं। परिवार ने दोनों बैलों के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करते हुए उनकी अस्थियों का विसर्जन उज्जैन में भी किया। दोनों बैल अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन करीब दो दशक तक परिवार के साथ बिताए उनके समय और उनकी यादें आज भी परिवार के लिए खास हैं।