नई दिल्ली/कोलकाता: तृणमूल कांग्रेस (TMC) के राष्ट्रीय महासचिव और सांसद अभिषेक बनर्जी ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला की भूमिका पर सवाल उठाते हुए उनके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है। इस याचिका में पार्टी से बगावत कर नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) में शामिल होने का दावा करने वाले 20 तृणमूल सांसदों को संविधान की 10वीं अनुसूची (दलबदल विरोधी कानून) के तहत अयोग्य घोषित करने की मांग की गई है। मामले में सुदीप बंद्योपाध्याय, काकोली घोष दस्तीदार, शताब्दी रॉय और सायनी घोष समेत सभी 20 बागी सांसदों को पक्षकार बनाया गया है। शीर्ष अदालत में इस याचिका पर इसी सप्ताह सुनवाई होने की संभावना है।
19 जून को सौंपी गई थी अयोग्यता याचिका, 5 हफ्ते से नहीं हुई सुनवाई
मामले की शुरुआत उस वक्त हुई जब तृणमूल कांग्रेस के टिकट पर चुनाव जीतने वाले 20 सांसदों ने खुले तौर पर 'NCPI' नामक दल में विलय का ऐलान कर दिया। इसके बाद अभिषेक बनर्जी ने 1985 के लोकसभा सदस्य नियम 6 के तहत 19 जून को स्पीकर के समक्ष इन सांसदों की सदस्यता रद्द करने की याचिका सौंपी थी। अभिषेक बनर्जी का आरोप है कि 5 हफ्ते से अधिक का समय बीत जाने के बावजूद न तो कोई नोटिस जारी किया गया और न ही सुनवाई शुरू की गई।
दलबदल विरोधी कानून (10वीं अनुसूची) और 2/3 सदस्यों का गणित
1985 में 52वें संविधान संशोधन द्वारा बनाए गए दलबदल विरोधी कानून के अनुसार, कोई भी सांसद अपनी मूल पार्टी की सदस्यता छोड़ने पर अयोग्य घोषित हो सकता है। हालांकि, यदि किसी पार्टी के कम से कम दो-तिहाई (2/3) सांसद एक साथ दूसरी पार्टी में विलय करते हैं, तो उन पर यह कानून लागू नहीं होता।
- 2024 के लोकसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस के कुल 29 सांसद जीतकर आए थे, जिनका दो-तिहाई हिस्सा 20 होता है।
- बागी सांसदों का दावा है कि वे 20 की संख्या में हैं, इसलिए वे कानून के दायरे से बाहर हैं।
- वहीं टीएमसी का तर्क है कि जिस 'NCPI' में विलय का दावा किया जा रहा है, वह एक अनाम पार्टी है और यह प्रक्रिया कानूनी रूप से अवैध है।
आसन व्यवस्था में बदलाव और कानूनी अनिश्चितता पर सवाल
अभिषेक बनर्जी ने स्पीकर से मुलाकात कर इस बात पर कड़ा एतराज जताया कि जब दलबदल या विलय को आधिकारिक तौर पर मंजूरी नहीं दी गई है, तो संसद में इन 20 सांसदों के बैठने की जगह किस आधार पर बदली गई? उन्होंने कहा कि सदन के रिकॉर्ड में ये सांसद अब भी एआईटीसी (AITC) के रूप में दर्ज हैं, जबकि बाहर खुद को एनसीपीआई का बता रहे हैं।
न्यायपालिका के हस्तक्षेप पर टिकी निगाहें
'किहोतो होलोहन बनाम ज़चिल्हू' (1992) मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि जब तक स्पीकर अयोग्यता पर अंतिम निर्णय नहीं ले लेते, तब तक अदालतें आमतौर पर प्रक्रिया में हस्तक्षेप नहीं करतीं। हालांकि, यदि निर्णय लेने में अकारण या अत्यधिक देरी हो रही हो, तो शीर्ष अदालत समय-सीमा तय करने का निर्देश दे सकती है। हाल ही में इन बागी सांसदों की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ प्रातराश (ब्रेकफास्ट) बैठक के बाद यह मामला राजनीतिक और कानूनी दोनों स्तरों पर काफी गरमा गया है।