भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) यानी CPI(M) का गठन साल 1964 में हुआ था। यह उस समय बनी जब भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के भीतर विचारों को लेकर मतभेद बढ़ गए थे। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सोवियत संघ और चीन के बीच चल रहे वैचारिक टकराव का असर भारत की वाम राजनीति पर भी पड़ा। इसी वजह से पार्टी दो हिस्सों में बंट गई और CPI(M) ने एक अलग पहचान बनाई। शुरू से ही इस पार्टी ने मजदूरों, किसानों और आम लोगों के मुद्दों को अपनी राजनीति का केंद्र बनाया और जल्दी ही कई राज्यों में अपनी पकड़ मजबूत कर ली।
पश्चिम बंगाल: 34 साल का लंबा शासन और कई बड़े फैसले
पश्चिम बंगाल में CPI(M) का दौर काफी मजबूत रहा। 1977 में वाम मोर्चा सत्ता में आया और करीब 34 साल तक सरकार चलाता रहा। इस दौरान ज्योति बसु और बुद्धदेव भट्टाचार्य जैसे नेताओं ने राज्य का नेतृत्व किया। भूमि सुधार, पंचायत व्यवस्था को मजबूत करना और गांवों में राजनीतिक भागीदारी बढ़ाना इस सरकार की बड़ी उपलब्धियां मानी जाती हैं। हालांकि, समय के साथ उद्योग, रोजगार और जमीन अधिग्रहण जैसे मुद्दों पर विरोध भी बढ़ा। 1967 का नक्सलबाड़ी आंदोलन और 2007 का नंदीग्राम विवाद ऐसे घटनाक्रम रहे, जिन्होंने पार्टी की दिशा और छवि दोनों को प्रभावित किया। वहीं 1996 में ज्योति बसु को प्रधानमंत्री बनाने का मौका भी आया, लेकिन पार्टी ने इसे स्वीकार नहीं किया।
2026 की रणनीति: खोए वोटरों को वापस लाने की कोशिश
अब 2026 में CPI(M) अपने कमजोर होते जनाधार को फिर से मजबूत करने की कोशिश में जुटी है। पार्टी ने यह समझने के लिए आंतरिक स्तर पर गणना शुरू की है कि उससे दूर हुए वोटरों में से कितना हिस्सा वापस लाया जा सकता है। इसी रणनीति के तहत मतदान के दिन सुबह से ही कार्यकर्ताओं को सक्रिय किया गया, ताकि समर्थकों को मतदान केंद्रों तक पहुंचाया जा सके और वोट प्रतिशत बढ़ाया जा सके।
क्या बदलेगी तस्वीर?
CPI(M) की यह पहल सिर्फ चुनाव जीतने की कोशिश नहीं, बल्कि अपनी राजनीतिक जमीन को फिर से मजबूत करने की कोशिश है। लगातार घटते समर्थन के बीच पार्टी के लिए यह एक अहम मोड़ माना जा रहा है। अब नजर इस बात पर है कि क्या यह रणनीति काम करेगी और पार्टी एक बार फिर अपने पुराने वोट बैंक को वापस ला पाएगी या नहीं।