नई दिल्ली. कॉकरोच जनता पार्टी यानी CJP के सह संयोजक सौरव दास और आशुतोष रांका ने अपनी न्यायिक हिरासत को चुनौती देने वाली याचिका दिल्ली हाईकोर्ट से वापस ले ली है। अदालत ने उन्हें पहले स्पेशल एग्जीक्युटिव मजिस्ट्रेट यानी SEM की सुनवाई का इंतजार करने को कहा जहां बुधवार को ही उनकी पेशी निर्धारित है। दोनों नेताओं ने मंगलवार को याचिका दायर कर रात में ही सुनवाई की मांग की थी लेकिन छुट्टी की वजह से यह संभव नहीं हो सका। बुधवार सुबह इसे जस्टिस सुब्रमण्यम प्रसाद की बेंच के सामने सूचीबद्ध किया गया। अदालत ने याचिका वापस लेने की अनुमति देते हुए स्पष्ट किया कि केस के मेरिट पर कोई टिप्पणी नहीं की गई है। यह विकास दोनों नेताओं की हिरासत संबंधी कानूनी प्रक्रिया को आगे बढ़ाता है।
अदालत ने समझाया तब और अब का अंतर
सुनवाई के दौरान जस्टिस सुब्रमण्यम प्रसाद ने CJP को नीट पेपर लीक के खिलाफ जुलाई में जंतर-मंतर पर हुए आंदोलन और मौजूदा मुद्दे के बीच फर्क स्पष्ट रूप से समझाया। अदालत ने कहा कि तब यह एक छात्र आंदोलन था जिसमें बच्चे शामिल थे जबकि अब मुद्दा पूरी तरह अलग है। लोग तो वही हैं लेकिन मुद्दा बदल रहा है। अदालत ने आगे कहा कि अब सवाल उठेंगे कि आप कौन हैं, आप क्या हैं, आपका क्या संबंध है और आपकी संस्था का उद्देश्य क्या है। जब शांति और व्यवस्था को लेकर आशंका होगी तो इन सभी सवालों का महत्व बढ़ जाएगा। अदालत का यह स्पष्टीकरण दोनों स्थितियों के बीच कानूनी और सामाजिक अंतर को रेखांकित करता है।
रेजीम चेंज को लेकर अदालत की महत्वपूर्ण टिप्पणी
जस्टिस प्रसाद ने रेजीम चेंज यानी शासन परिवर्तन को लेकर हुई बातों का भी जिक्र किया। अदालत ने साफ कहा कि जब शासन परिवर्तन होता है तो वह बैलट यानी चुनाव के जरिए होता है। इस टिप्पणी के माध्यम से अदालत ने लोकतांत्रिक प्रक्रिया के महत्व को रेखांकित किया। प्रदर्शन और विरोध के अधिकार को स्वीकार करते हुए भी अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी भी गतिविधि को शांति और व्यवस्था के दायरे में रहना चाहिए। रेजीम चेंज जैसे मुद्दों पर अदालत का रुख लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा करने वाला रहा। इस तरह की टिप्पणियों से अदालत ने संवैधानिक सीमाओं को दोहराया। दोनों पक्षों के लिए यह मार्गदर्शन महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।
हिरासत और गिरफ्तारी की पृष्ठभूमि
सौरव दास और आशुतोष रांका को 13 अक्टूबर को हिरासत में लिया गया था। वे प्रदर्शन के लिए प्रतिबंधित किए जा चुके जंतर-मंतर पर गैर-कानूनी तरीके से प्रवेश कर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ नारेबाजी करने लगे थे। इसके बाद उनके खिलाफ दो एफआईआर दर्ज की गईं और उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। एसईएम कोर्ट ने उन्हें पहले पांच दिन और फिर दो दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया था। प्रतिबंधित क्षेत्र में प्रवेश और नारेबाजी को लेकर कानूनी कार्रवाई की गई। दोनों नेताओं की हिरासत को चुनौती देने वाली याचिका इसी पृष्ठभूमि में दायर की गई थी। अदालत ने प्रक्रिया का पालन करते हुए आगे की सुनवाई का रास्ता खुला रखा।
एसईएम कोर्ट में पेशी का इंतजार
अदालत ने CJP नेताओं को निर्देश दिया कि वे पहले एसईएम की सुनवाई का इंतजार करें। बुधवार को ही उनकी पेशी एसईएम कोर्ट में निर्धारित है। हाईकोर्ट ने याचिका वापस लेने की अनुमति देकर इस प्रक्रिया को प्राथमिकता दी। दोनों नेताओं को न्यायिक हिरासत में रखने संबंधी आदेश के खिलाफ आगे की कानूनी कार्रवाई एसईएम स्तर पर ही आगे बढ़ेगी। अदालत का यह रुख सामान्य प्रक्रिया का सम्मान करने वाला है। हिरासत की अवधि और आगे की सुनवाई को लेकर स्पष्टता बनी हुई है। कानूनी प्रक्रिया का पालन करते हुए दोनों पक्ष अपनी बात रख सकेंगे।
अदालत ने मेरिट पर कोई टिप्पणी नहीं की
जस्टिस सुब्रमण्यम प्रसाद ने स्पष्ट किया कि अदालत ने केस के मेरिट पर कोई टिप्पणी नहीं की है। याचिका वापस लेने की अनुमति देते समय केवल प्रक्रिया संबंधी निर्देश दिए गए। अदालत ने दोनों स्थितियों के अंतर को समझाते हुए भविष्य में उठने वाले संभावित सवालों का जिक्र किया। शांति और व्यवस्था बनाए रखने की आवश्यकता को रेखांकित किया गया। CJP नेताओं के लिए यह सुनवाई कानूनी मार्गदर्शन देने वाली रही। अदालत का संतुलित रुख लोकतांत्रिक अधिकारों और कानून व्यवस्था दोनों का सम्मान करने वाला दिखाई दिया। आगे की कार्यवाही एसईएम कोर्ट में होगी जहां दोनों पक्ष अपनी दलीलें रख सकेंगे।