डिब्रूगढ़. असम ने अंतरराष्ट्रीय जलमार्ग व्यापार के क्षेत्र में एक नया इतिहास रच दिया है। डिब्रूगढ़ के बोगीबील टर्मिनल से 540 मीट्रिक टन मेथनॉल लेकर पहला अंतरराष्ट्रीय कार्गो बांग्लादेश के लिए रवाना किया गया। आजादी के बाद यह पहला अवसर है जब अपर असम से किसी विदेशी बंदरगाह के लिए माल भेजा गया है। केंद्र सरकार और राज्य सरकार ने इसे पूर्वोत्तर भारत की आर्थिक प्रगति जलमार्ग आधारित परिवहन और क्षेत्रीय व्यापार को नई गति देने वाला महत्वपूर्ण कदम बताया है। इस उपलब्धि से ब्रह्मपुत्र नदी की कारोबारी क्षमता को भी नई पहचान मिली है। सोमवार को यह कार्गो रवाना हुआ।
बोगीबील से ढाका तक का सफर
असम के डिब्रूगढ़ स्थित बोगीबील टर्मिनल से 540 मीट्रिक टन मेथनॉल लेकर एक बार्ज बांग्लादेश के ढाका के लिए रवाना हुआ। केंद्रीय बंदरगाह पोत परिवहन और जलमार्ग मंत्री सर्बानंद सोनोवाल ने बोगीबील से डीएलबी पतकाई नामक पोत को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया। इस अवसर पर असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा वर्चुअली कार्यक्रम से जुड़े। यह मेथनॉल राज्य की सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी असम पेट्रो-केमिकल्स लिमिटेड यानी एपीसीएल के नामरूप संयंत्र में तैयार किया गया है। कार्गो को बांग्लादेश के पांगांव पोर्ट भेजा जा रहा है। यह पोत ब्रह्मपुत्र नदी के राष्ट्रीय जलमार्ग-2 के जरिए भारत-बांग्लादेश सीमा तक पहुंचेगा और फिर भारत-बांग्लादेश प्रोटोकॉल रूट के माध्यम से ढाका के नारायणगंज तक जाएगा।
1300 किलोमीटर की यात्रा
बोगीबील से नारायणगंज तक इस कार्गो की कुल यात्रा लगभग 1300 किलोमीटर की होगी। भारत के भीतर ब्रह्मपुत्र नदी पर राष्ट्रीय जलमार्ग-2 के जरिए लगभग 768 किलोमीटर की दूरी तय करने के बाद जहाज बांग्लादेशी जलक्षेत्र में प्रवेश करेगा। इस यात्रा को ब्रह्मपुत्र नदी की व्यावसायिक क्षमता की परीक्षा के रूप में देखा जा रहा है। यदि यह मॉडल सफल रहता है तो भविष्य में बांग्लादेश के लिए नियमित मेथनॉल निर्यात शुरू किया जा सकता है। जलमार्ग आधारित यह कॉरिडोर पूर्वोत्तर के व्यापार को नई दिशा देगा। नदी मार्ग से परिवहन सस्ता और पर्यावरण अनुकूल विकल्प साबित हो सकता है।
डिब्रूगढ़ बंदरगाह की ऐतिहासिक पहचान
केंद्रीय मंत्री सर्बानंद सोनोवाल ने इस अवसर को ऐतिहासिक बताते हुए कहा कि डिब्रूगढ़ कभी पूर्वी भारत के सबसे व्यस्त नदी बंदरगाहों में शामिल था। उन्होंने कहा कि एक समय यहां से स्टीमर सेवाएं नियमित रूप से संचालित होती थीं लेकिन दशकों तक यह गतिविधि ठप रही। वर्ष 1856 से कोलकाता तक स्टीमर सेवाएं संचालित होती थीं। 1882 में डिब्रू-सादिया रेलवे सेवा भी डिब्रूगढ़ स्टीमर घाट से शुरू हुई थी। 1913 तक यहां प्रतिदिन स्टीमर पहुंचते थे और चाय लकड़ी तथा अन्य सामान का परिवहन किया जाता था। 70 साल बाद फिर से अंतरराष्ट्रीय कार्गो रवाना होने से पुरानी पहचान लौटने लगी है।
किसानों और उद्योगों को फायदा
सर्बानंद सोनोवाल ने कहा कि जलमार्ग आधारित परिवहन से लॉजिस्टिक्स लागत में कमी आएगी। इसका सीधा लाभ किसानों सूक्ष्म लघु एवं मध्यम उद्यमों यानी एमएसएमई पेट्रोकेमिकल उद्योग रिफाइनरी सेक्टर और अन्य औद्योगिक इकाइयों को मिलेगा। उन्होंने कहा कि सड़क और रेल परिवहन के मुकाबले जलमार्ग कम खर्चीला और पर्यावरण के अनुकूल विकल्प है। नदी मार्ग से कार्गो परिवहन बढ़ने पर ईंधन की खपत कम होगी और सड़कों पर ट्रकों का दबाव भी घटेगा। पूर्वोत्तर भारत की अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने वाला यह कदम क्षेत्रीय व्यापार को नई गति देगा।