इस वर्ष मानसून की शुरुआत ने देशभर में चिंता का वातावरण पैदा कर दिया है। जून माह में सामान्य से लगभग 40 प्रतिशत कम वर्षा दर्ज होने के कारण यह बीते 122 वर्षों का पाँचवाँ सबसे शुष्क जून माना जा रहा है। मध्य भारत के बड़े भूभाग में सूखे जैसी स्थिति बनने लगी है, जिसका सीधा प्रभाव कृषि, जल संसाधनों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर दिखाई दे रहा है। मौसम वैज्ञानिकों का मानना है कि प्रशांत महासागर में विकसित हो रही अल नीनो की परिस्थितियों ने मानसूनी प्रणाली को प्रभावित किया है। हालांकि जुलाई के शुरुआती दिनों में वर्षा में कुछ सुधार दर्ज हुआ है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि पूरे मौसम का आकलन अभी शेष है और मानसून की आगे की प्रगति पर लगातार निगरानी आवश्यक होगी।
समुद्री बादलों को अधिक चमकदार बनाने की नई वैज्ञानिक अवधारणा
अमेरिका के कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय तथा स्क्रिप्स समुद्र विज्ञान संस्थान से जुड़े वैज्ञानिकों ने एक ऐसी तकनीक का अध्ययन प्रस्तुत किया है, जिसे 'मरीन क्लाउड ब्राइटनिंग' कहा जाता है। इस अवधारणा के अनुसार समुद्र के ऊपर बनने वाले बादलों में अत्यंत सूक्ष्म खारे पानी के कणों का छिड़काव किया जाए, जिससे बादल अधिक सूर्य प्रकाश परावर्तित कर सकें। यदि अधिक मात्रा में सौर ऊर्जा वापस अंतरिक्ष की ओर लौटती है तो समुद्र की सतह का तापमान अपेक्षाकृत कम रखा जा सकता है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि इससे अल नीनो की तीव्रता सीमित करने में सहायता मिल सकती है। यह अध्ययन अभी अनुसंधान के चरण में है और इसे जलवायु अभियांत्रिकी के संभावित विकल्पों में गिना जा रहा है।
ऑस्ट्रेलिया की भीषण जंगल की आग से मिली नई सोच
इस वैज्ञानिक विचार की प्रेरणा वर्ष 2019-20 में ऑस्ट्रेलिया में लगी विनाशकारी जंगल की आग से प्राप्त अवलोकनों से जुड़ी है। उस दौरान वातावरण में पहुँचे धुएँ के सूक्ष्म कणों ने सूर्य के प्रकाश को प्रभावित किया और वैश्विक मौसम प्रणाली पर अप्रत्याशित प्रभाव देखने को मिले। वैज्ञानिकों ने कंप्यूटर मॉडल के माध्यम से यह विश्लेषण किया कि यदि नियंत्रित ढंग से बादलों की परावर्तन क्षमता बढ़ाई जाए तो प्रशांत महासागर का तापमान कुछ सीमा तक नियंत्रित किया जा सकता है। शोधकर्ताओं का मानना है कि यह केवल एक सैद्धांतिक संभावना है, जिसे व्यवहार में लागू करने से पहले व्यापक वैज्ञानिक परीक्षण, पर्यावरणीय मूल्यांकन और अंतरराष्ट्रीय सहमति आवश्यक होगी।
जलवायु के साथ हस्तक्षेप पर वैज्ञानिक समुदाय में मतभेद
जलवायु अभियांत्रिकी से जुड़े ऐसे प्रयोगों को लेकर वैज्ञानिक समुदाय पूरी तरह एकमत नहीं है। अनेक विशेषज्ञों का मानना है कि पृथ्वी की जटिल जलवायु प्रणाली में कृत्रिम हस्तक्षेप अप्रत्याशित परिणाम उत्पन्न कर सकता है। यदि किसी क्षेत्र में तापमान या वर्षा के पैटर्न में अनचाहा परिवर्तन होता है तो उसका प्रभाव दूसरे देशों तक पहुँच सकता है। यही कारण है कि कई वैज्ञानिक ऐसे प्रयोगों के पर्यावरणीय, सामाजिक और भू-राजनीतिक जोखिमों पर भी गंभीर चर्चा की आवश्यकता बता रहे हैं। शोधकर्ताओं का स्पष्ट मत है कि यह तकनीक फिलहाल प्रयोगशाला और कंप्यूटर मॉडल तक सीमित है तथा इसे वास्तविक दुनिया में अपनाने से पहले वर्षों तक परीक्षण और अंतरराष्ट्रीय नियामक ढाँचे की आवश्यकता होगी।
भारत में अल नीनो का असर, खेती और जल सुरक्षा पर बढ़ता दबाव
अंतरराष्ट्रीय मौसम विशेषज्ञों की चेतावनियों के बीच भारत में वर्षा की कमी का प्रभाव कृषि क्षेत्र में स्पष्ट दिखाई देने लगा है। खरीफ फसलों की बुवाई में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई है, जिससे धान, दलहन, तिलहन, मोटे अनाज और कपास जैसी प्रमुख फसलों के उत्पादन को लेकर आशंकाएँ बढ़ी हैं। कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि यदि आगामी सप्ताहों में पर्याप्त वर्षा नहीं होती है तो खाद्य उत्पादन, ग्रामीण आय और कृषि आधारित उद्योगों पर भी इसका प्रभाव पड़ सकता है। वर्षा की अनिश्चितता जलाशयों के स्तर, भूजल पुनर्भरण और पेयजल उपलब्धता पर भी दबाव बढ़ा सकती है, जिससे आने वाले महीनों में कई राज्यों के सामने अतिरिक्त चुनौतियाँ खड़ी हो सकती हैं।
सरकार सतर्क, संवेदनशील जिलों के लिए तैयार की जा रही रणनीति
देश में संभावित सूखे और कृषि संकट की आशंका को देखते हुए केंद्र सरकार ने उच्च स्तर पर स्थिति की समीक्षा शुरू कर दी है। प्रधानमंत्री कार्यालय में हुई बैठक के बाद संवेदनशील जिलों के लिए आकस्मिक कृषि योजना तैयार की गई है, ताकि वर्षा की कमी की स्थिति में किसानों को वैकल्पिक फसल, बीज, सिंचाई और कृषि प्रबंधन संबंधी सहायता उपलब्ध कराई जा सके। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद ने भी कृषि विज्ञान केंद्रों के लिए विस्तृत मानक कार्यप्रणाली जारी की है। विशेषज्ञों का मानना है कि जल संरक्षण, सूखा-रोधी कृषि तकनीकों, फसल विविधीकरण और मौसम आधारित कृषि सलाह को प्राथमिकता देकर अल नीनो के प्रभाव को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
जलवायु परिवर्तन के दौर में दीर्घकालिक समाधान की आवश्यकता
अल नीनो जैसी घटनाएँ यह संकेत देती हैं कि जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभावों के बीच केवल आपातकालीन उपाय पर्याप्त नहीं होंगे। वैज्ञानिक समुदाय का मानना है कि ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी, स्वच्छ ऊर्जा का विस्तार, जल संरक्षण, टिकाऊ कृषि और वैश्विक स्तर पर समन्वित जलवायु नीतियाँ ही भविष्य के लिए स्थायी समाधान प्रस्तुत कर सकती हैं। समुद्री बादलों को अधिक परावर्तक बनाने जैसी नई तकनीकें शोध के क्षेत्र में संभावनाएँ अवश्य खोलती हैं, लेकिन विशेषज्ञ इस बात पर भी बल देते हैं कि प्रकृति के साथ संतुलन बनाए रखना और जलवायु परिवर्तन के मूल कारणों पर प्रभावी कार्रवाई करना ही मानवता के लिए सबसे सुरक्षित और दीर्घकालिक मार्ग होगा।