नई दिल्ली. देश में विमान यात्रा को बड़े शहरों तक सीमित रखने के बजाय सरकार छोटे शहरों और दूरदराज के क्षेत्रों तक हवाई संपर्क बढ़ाने की योजना पर काम कर रही है। नागरिक उड्डयन मंत्री किंजरापु राम मोहन नायडू के अनुसार, करीब 150 किलोमीटर या 2 घंटे की यात्रा के दायरे में हवाई अड्डे की सुविधा उपलब्ध कराने की दिशा में विचार किया जा रहा है। इसका उद्देश्य उन लोगों की परेशानी कम करना है, जिन्हें विमान पकड़ने के लिए अभी लंबी सड़क या रेल यात्रा करनी पड़ती है। बेहतर हवाई संपर्क से यात्रा समय घटने के साथ क्षेत्रीय आर्थिक गतिविधियों को भी गति मिल सकती है।
हालांकि 150 किलोमीटर का दायरा कोई कठोर नियम नहीं होगा। भारत की भौगोलिक विविधता को देखते हुए हवाई अड्डे की जगह तय करते समय स्थानीय परिस्थितियों को प्राथमिकता दी जाएगी। मैदानी क्षेत्रों, पहाड़ी इलाकों, तटीय क्षेत्रों और घनी आबादी वाले स्थानों की जरूरतें अलग-अलग हैं। जमीन की उपलब्धता, सुरक्षा, पर्यावरण, मौसम और संभावित यात्री संख्या जैसे पहलुओं का भी आकलन किया जाएगा। यानी सरकार का जोर केवल दूरी तय करने पर नहीं, बल्कि व्यावहारिक और टिकाऊ हवाई संपर्क विकसित करने पर होगा।
छोटे शहरों को विमान सेवा से जोड़ने पर जोर
सरकार की योजना का उद्देश्य केवल बड़े शहरों के बीच उड़ानों की संख्या बढ़ाना नहीं है। छोटे शहरों और उन क्षेत्रों को भी हवाई नेटवर्क से जोड़ने की कोशिश है, जहां निकटतम हवाई अड्डा अभी काफी दूर है। बेहतर हवाई संपर्क से कारोबार, पर्यटन, निवेश और रोजगार को बढ़ावा मिल सकता है। शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी जरूरी सेवाओं के लिए दूसरे शहरों की यात्रा करने वाले लोगों के समय की भी बचत होगी। इससे क्षेत्रीय विकास में हवाई संपर्क की भूमिका और मजबूत हो सकती है।
किसी क्षेत्र में हवाई अड्डा उपलब्ध होने का वास्तविक लाभ तभी मिलेगा, जब वहां पर्याप्त और नियमित उड़ान सेवाएं भी संचालित हों। इसलिए नए हवाई अड्डों के निर्माण के साथ उनकी आर्थिक व्यवहार्यता और यात्री मांग पर भी ध्यान देना जरूरी होगा। छोटे शहरों में कम यात्री संख्या होने पर संचालन लागत बड़ी चुनौती बन सकती है। ऐसे में बुनियादी ढांचे के साथ विमान सेवाओं की निरंतरता और किफायती किराया भी योजना की सफलता के महत्वपूर्ण आधार होंगे।
पहाड़ी इलाकों में दूरी नहीं, स्थानीय परिस्थिति होगी आधार
भारत के पहाड़ी और दुर्गम क्षेत्रों में हवाई संपर्क बढ़ाना सामान्य मैदानी इलाकों की तुलना में अधिक चुनौतीपूर्ण है। कई जगह सड़क मार्ग से 100 या 150 किलोमीटर की दूरी तय करने में कई घंटे लग जाते हैं। वहीं जमीन की उपलब्धता, ऊंचाई, मौसम और निर्माण संबंधी कठिनाइयां भी हवाई अड्डे की स्थिति को प्रभावित करती हैं। इसलिए इन क्षेत्रों में केवल दूरी के आधार पर निर्णय लेना व्यावहारिक नहीं होगा। स्थानीय भौगोलिक परिस्थितियों को प्राथमिकता देना आवश्यक होगा।
हवाई अड्डे के लिए पर्याप्त जमीन, सुरक्षित उड़ान संचालन और आपातकालीन सुविधाओं की उपलब्धता भी महत्वपूर्ण होगी। इसके अलावा पर्यावरणीय प्रभाव और आसपास की आबादी पर पड़ने वाले असर का आकलन करना होगा। सरकार यदि इन सभी पहलुओं को ध्यान में रखकर स्थान तय करती है तो क्षेत्रीय हवाई संपर्क अधिक उपयोगी और टिकाऊ बनाया जा सकता है। इससे दुर्गम क्षेत्रों को देश की आर्थिक मुख्यधारा से जोड़ने में भी मदद मिलेगी।
कोच्चि से लक्षद्वीप तक जलविमान सेवा की तैयारी
सरकार पारंपरिक हवाई अड्डों के अलावा नए परिवहन विकल्पों पर भी काम कर रही है। इसी क्रम में कोच्चि और लक्षद्वीप के बीच जलविमान सेवा शुरू करने की तैयारी की जा रही है। जलविमान ऐसे विमान होते हैं, जो पानी की सतह से उड़ान भरने और पानी पर उतरने में सक्षम होते हैं। इससे उन तटीय और द्वीपीय क्षेत्रों तक संपर्क बढ़ाया जा सकता है, जहां पारंपरिक हवाई अड्डे का निर्माण कठिन या महंगा हो सकता है।
लक्षद्वीप जैसे द्वीपीय क्षेत्रों के लिए तेज परिवहन व्यवस्था पर्यटन और स्थानीय अर्थव्यवस्था दोनों के लिहाज से महत्वपूर्ण हो सकती है। जलविमान सेवा सफल रहती है तो समुद्री परिवहन और पारंपरिक हवाई संपर्क के बीच एक नया विकल्प विकसित होगा। हालांकि इसके लिए मौसम, समुद्री यातायात, जलक्षेत्र की सुरक्षा, परिचालन लागत और यात्री मांग जैसे पहलुओं का ध्यान रखना होगा। इन चुनौतियों के बावजूद यह क्षेत्रीय संपर्क विस्तार की दिशा में महत्वपूर्ण प्रयोग साबित हो सकता है।
विमान और कलपुर्जों के घरेलू निर्माण पर जोर
सरकार की विमानन नीति केवल हवाई अड्डों और यात्रियों की संख्या बढ़ाने तक सीमित नहीं है। भारत को विमान और उनके कलपुर्जों के निर्माण का बड़ा केंद्र बनाने पर भी जोर दिया जा रहा है। नागरिक उड्डयन मंत्री ने देश को संभावित बड़े विमान निर्माण केंद्र के रूप में विकसित करने की आवश्यकता पर बल दिया है। भारत में विमानन बाजार तेजी से बढ़ रहा है, इसलिए आने वाले वर्षों में विमान, कलपुर्जों और रखरखाव से जुड़ी मांग भी बढ़ने की संभावना है।
उपलब्ध जानकारी के अनुसार देश में विमान के कलपुर्जों का करीब 4 अरब डॉलर का घरेलू उद्योग मौजूद है और इसके साथ विनिर्माण से जुड़ी व्यवस्था भी विकसित हो चुकी है। इस क्षमता का विस्तार भारत को केवल विमानन सेवाओं का बड़ा बाजार बनने के बजाय वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला का हिस्सा बना सकता है। कलपुर्जों के निर्माण, रखरखाव और तकनीकी सेवाओं में निवेश बढ़ने से रोजगार के अवसर भी पैदा होंगे। साथ ही विदेशी विमानन कंपनियों के लिए भारत में उत्पादन और साझेदारी की संभावनाएं बढ़ सकती हैं।
बदलते विमानन नेटवर्क से छोटे शहरों को मिल सकती है नई गति
भारत में विमान यात्रा की मांग बढ़ने के साथ हवाई अड्डों का विस्तार अब केवल महानगरों की जरूरतों के अनुसार नहीं किया जा सकता। छोटे शहरों, पर्यटन क्षेत्रों, औद्योगिक केंद्रों और दूरदराज के इलाकों को बेहतर हवाई संपर्क से जोड़ना भविष्य की महत्वपूर्ण जरूरत बन सकता है। यदि लोगों को अपने क्षेत्र से अपेक्षाकृत कम समय में हवाई अड्डे तक पहुंच मिले तो विमान यात्रा अधिक व्यावहारिक बनेगी। इसका सीधा असर स्थानीय व्यापार, पर्यटन और निवेश पर भी पड़ सकता है।
हालांकि इस विस्तार के सामने जमीन, लागत, पर्यावरणीय मंजूरी और नियमित उड़ानों की उपलब्धता जैसी चुनौतियां रहेंगी। केवल हवाई अड्डा बना देना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि वहां लगातार और आर्थिक रूप से व्यवहार्य विमान सेवाएं भी जरूरी होंगी। इसलिए सरकार को बुनियादी ढांचे के साथ विमानन कंपनियों, यात्रियों और स्थानीय अर्थव्यवस्था के बीच संतुलन बनाना होगा। यदि यह संतुलन कायम रहा तो हवाई संपर्क आने वाले वर्षों में छोटे शहरों और दूरदराज के क्षेत्रों के विकास का महत्वपूर्ण आधार बन सकता है।