भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद यानी ICMR के एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस निगरानी नेटवर्क से जुड़े शोधकर्ताओं ने देश के 20 तृतीयक चिकित्सा केंद्रों में अप्रैल 2022 से अप्रैल 2025 के बीच भर्ती 1,59,336 मरीजों के आंकड़ों का अध्ययन किया। शोध में विशेष रूप से 4 प्रमुख ग्राम-नेगेटिव जीवाणुओं से होने वाले संक्रमणों पर ध्यान दिया गया और यह तुलना की गई कि कार्बापेनेम के प्रति प्रतिरोधी संक्रमण वाले मरीजों की स्थिति संवेदनशील जीवाणुओं से संक्रमित मरीजों की तुलना में कैसी रहती है। निष्कर्ष में प्रतिरोधी संक्रमणों के साथ मृत्यु का जोखिम लगातार अधिक पाया गया।
कार्बापेनेम प्रतिरोध बना गंभीर खतरा
गंभीर संक्रमणों के इलाज में कार्बापेनेम महत्वपूर्ण एंटीबायोटिक वर्ग माना जाता है। लेकिन जब ई. कोलाई, क्लेब्सिएला न्यूमोनिया, एसिने्टोबैक्टर बाउमानी और स्यूडोमोनास एरुजिनोसा जैसे जीवाणु कार्बापेनेम के प्रति भी प्रतिरोधी हो जाते हैं, तो डॉक्टरों के पास प्रभावी उपचार के विकल्प सीमित हो जाते हैं। अध्ययन में इन चारों प्रमुख जीवाणुओं में कार्बापेनेम प्रतिरोध के साथ मृत्यु का जोखिम अधिक पाया गया और अलग-अलग जीवाणुओं में मृत्यु के सापेक्ष जोखिम का अनुपात 1.16 से 1.43 के बीच रहा। डॉ. कामिनी वालिया ने इसे विशेष रूप से गंभीर और रक्तप्रवाह से जुड़े संक्रमणों में मरीजों के जीवित बचने के लिए बड़ा खतरा बताया है।
समस्या केवल एंटीबायोटिक के ज्यादा इस्तेमाल की नहीं
दवा-प्रतिरोध की चर्चा होते ही सबसे पहले एंटीबायोटिक के अनावश्यक इस्तेमाल की बात सामने आती है, लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार तस्वीर इससे कहीं बड़ी है। किसी मरीज को सही दवा देने में देरी, संक्रमण की पहचान देर से होना और प्रयोगशाला जांच के परिणाम समय पर उपलब्ध न होना भी उपचार को प्रभावित करते हैं। यदि शुरुआत में संक्रमण के लिए उपयुक्त दवा का चयन नहीं हो पाता, तो मरीज की स्थिति बिगड़ सकती है और बाद में अधिक शक्तिशाली दवाओं की आवश्यकता पड़ सकती है। इस पूरी प्रक्रिया में प्रतिरोधी जीवाणुओं के फैलने की संभावना भी बढ़ती है।
अस्पताल खुद बन सकते हैं संक्रमण के प्रसार का केंद्र
दवा-प्रतिरोधी जीवाणुओं के प्रसार में अस्पतालों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि यहां गंभीर रूप से बीमार, कमजोर प्रतिरोधक क्षमता वाले और लंबे समय तक भर्ती रहने वाले मरीज बड़ी संख्या में होते हैं। ऐसे वातावरण में यदि हाथों की स्वच्छता, उपकरणों की सफाई, संक्रमित मरीजों की उचित निगरानी और अलग रखने की व्यवस्था में कमी रहती है, तो प्रतिरोधी जीवाणु एक मरीज से दूसरे तक पहुंच सकते हैं। आईसीएमआर के दिशा-निर्देश भी स्वास्थ्य-सेवा से जुड़े संक्रमण और एंटीमाइक्रोबियल प्रतिरोध के बीच संबंध को रेखांकित करते हैं। इसलिए केवल डॉक्टरों द्वारा एंटीबायोटिक लिखने के तरीके में बदलाव से इस समस्या का समाधान नहीं होगा।
देर से जांच मरीज की जान पर भारी पड़ सकती है
दवा-प्रतिरोधी संक्रमण में समय बेहद महत्वपूर्ण होता है। यदि यह पता लगाने में देर हो जाए कि संक्रमण किस जीवाणु से हुआ है और वह किन दवाओं के प्रति संवेदनशील या प्रतिरोधी है, तो शुरुआती उपचार प्रभावी न होने का जोखिम बढ़ जाता है। ऐसी स्थिति में संक्रमण शरीर के दूसरे हिस्सों तक फैल सकता है और रक्तप्रवाह में पहुंचने पर स्थिति और गंभीर हो सकती है। आईसीएमआर ने भी तेजी से रोगाणु की पहचान और एंटीमाइक्रोबियल संवेदनशीलता जांच के लिए विशेष मार्गदर्शन जारी किया है। इसका उद्देश्य उपचार शुरू करने और सही दवा चुनने के बीच लगने वाले समय को कम करना है।
इलाज महंगा होने के पीछे क्या है वजह?
प्रतिरोधी संक्रमण केवल मृत्यु का खतरा नहीं बढ़ाते, बल्कि उपचार की आर्थिक लागत भी बढ़ा देते हैं। जब सामान्य एंटीबायोटिक प्रभावी नहीं रहते, तो डॉक्टरों को अधिक महंगी या सीमित उपलब्धता वाली दवाओं का सहारा लेना पड़ सकता है। इसके साथ मरीज को अस्पताल में अधिक समय तक भर्ती रखने, अतिरिक्त जांच कराने और जटिल संक्रमणों के उपचार की जरूरत पड़ सकती है। आईसीएमआर के हालिया अध्ययन में भी कार्बापेनेम-प्रतिरोधी संक्रमणों को अधिक उपचार लागत से जोड़ा गया है। इसका असर केवल अस्पताल या स्वास्थ्य व्यवस्था पर नहीं, बल्कि मरीज और उसके परिवार की आर्थिक स्थिति पर भी पड़ता है।
एंटीबायोटिक दबाव भी बढ़ा रहा है संकट
एंटीबायोटिक का आवश्यकता से अधिक या गलत इस्तेमाल जीवाणुओं पर लगातार दवा का दबाव बनाता है। संवेदनशील जीवाणु समाप्त हो सकते हैं, जबकि ऐसे जीवाणु बच जाते हैं जिनमें प्रतिरोध विकसित हो चुका है। समय के साथ यही प्रतिरोधी जीवाणु फैल सकते हैं और उपचार को कठिन बना सकते हैं। आईसीएमआर के एंटीमाइक्रोबियल स्ट्यूअर्डशिप दिशा-निर्देश बताते हैं कि स्वास्थ्य-सेवा से जुड़े संक्रमणों में प्रतिरोधी जीवाणुओं की मौजूदगी और एंटीमाइक्रोबियल इस्तेमाल के बीच महत्वपूर्ण संबंध देखा गया है। इसलिए सही दवा, सही मात्रा और सही अवधि का पालन दवा-प्रतिरोध रोकने की बुनियादी जरूरत है।
ग्राम-नेगेटिव जीवाणु क्यों हैं ज्यादा चुनौतीपूर्ण?
ग्राम-नेगेटिव जीवाणु शरीर के फेफड़ों, मूत्र मार्ग, घाव और रक्तप्रवाह सहित कई हिस्सों में संक्रमण पैदा कर सकते हैं। इनमें ई. कोलाई और क्लेब्सिएला जैसे जीवाणु आम संक्रमणों से जुड़े हैं, जबकि एसिने्टोबैक्टर और स्यूडोमोनास जैसे जीवाणु गंभीर अस्पताल-जनित संक्रमणों में बड़ी चुनौती बन सकते हैं। इन जीवाणुओं में जब कई महत्वपूर्ण एंटीबायोटिक के खिलाफ प्रतिरोध विकसित हो जाता है, तो उपचार के विकल्प तेजी से सीमित होते जाते हैं। यही वजह है कि कार्बापेनेम-प्रतिरोधी ग्राम-नेगेटिव संक्रमणों को चिकित्सकीय दृष्टि से विशेष गंभीरता से देखा जाता है।
समाधान अस्पताल से लेकर घर तक जरूरी
भारत में दवा-प्रतिरोध की चुनौती से निपटने के लिए अस्पतालों में संक्रमण नियंत्रण मजबूत करने, तेजी से जांच की सुविधा बढ़ाने और एंटीबायोटिक के विवेकपूर्ण इस्तेमाल को सुनिश्चित करने की जरूरत है। चिकित्सकों को संक्रमण की सही पहचान के आधार पर दवा चुननी होगी, जबकि अस्पतालों को स्वच्छता और संक्रमण-नियंत्रण के मानकों को लगातार लागू करना होगा। आम लोगों के स्तर पर भी बिना चिकित्सकीय सलाह एंटीबायोटिक लेना या बीमारी के लक्षण कम होते ही दवा बंद कर देना जोखिम पैदा कर सकता है। आईसीएमआर की निगरानी और शोध व्यवस्था इसी व्यापक चुनौती पर लगातार आंकड़े जुटाने और उपचार संबंधी दिशा-निर्देश विकसित करने पर केंद्रित है।
आने वाले समय की असली चुनौती
दवा-प्रतिरोध का संकट उस समय सबसे गंभीर हो जाता है जब सामान्य संक्रमण के इलाज के लिए उपलब्ध दवाएं धीरे-धीरे कम प्रभावी होने लगती हैं। आईसीएमआर का नया अध्ययन इस खतरे को केवल प्रयोगशाला या शोध का विषय नहीं रहने देता, बल्कि मृत्यु और उपचार खर्च से जोड़कर इसकी वास्तविक मानवीय कीमत सामने रखता है। भारत के लिए चुनौती यह है कि एंटीबायोटिक के विवेकपूर्ण इस्तेमाल के साथ-साथ अस्पतालों में संक्रमण रोकने, तेजी से जांच करने और प्रतिरोधी जीवाणुओं की निगरानी की व्यवस्था को भी मजबूत किया जाए। विशेषज्ञों का संदेश स्पष्ट है कि एंटीबायोटिक दवा प्रतिरोध के खिलाफ अकेली ढाल नहीं हो सकती; संक्रमण को फैलने से रोकना उतना ही जरूरी है।