नई दिल्ली. भारतीय नौसेना के आधुनिकीकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए भारत और जर्मनी के बीच छह अत्याधुनिक पारंपरिक पनडुब्बियों के निर्माण को लेकर वार्ता अंतिम चरण में पहुंच चुकी है। लगभग 90 हजार करोड़ रुपये की इस महत्वाकांक्षी परियोजना के वर्ष 2026 की सितंबर तक अंतिम रूप लेने की संभावना जताई जा रही है। रक्षा मंत्रालय के स्तर पर आवश्यक प्रक्रियाएं काफी हद तक पूरी हो चुकी हैं और अब अंतिम तकनीकी मूल्यांकन के बाद यह प्रस्ताव प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली सुरक्षा मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति के समक्ष स्वीकृति के लिए प्रस्तुत किया जाएगा। यह समझौता केवल हथियार खरीद तक सीमित नहीं होगा, बल्कि भारत की स्वदेशी रक्षा निर्माण क्षमता को भी नई दिशा देगा।
तकनीक हस्तांतरण पर टिकी है अंतिम मंजूरी
इस परियोजना का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष जर्मन कंपनी द्वारा प्रस्तावित तकनीक हस्तांतरण है। सरकार द्वारा गठित विशेषज्ञ समूह यह मूल्यांकन करेगा कि भारत को मिलने वाली तकनीक भविष्य में स्वदेशी पनडुब्बी डिजाइन, निर्माण, उन्नयन और रखरखाव की क्षमता को किस स्तर तक मजबूत करेगी। सरकार का उद्देश्य केवल तैयार प्लेटफॉर्म प्राप्त करना नहीं, बल्कि ऐसी तकनीकी विशेषज्ञता हासिल करना है जिससे आने वाले वर्षों में भारत रक्षा उत्पादन के क्षेत्र में अधिक आत्मनिर्भर बन सके। यही कारण है कि तकनीकी हस्तांतरण के हर पहलू की विस्तृत समीक्षा की जा रही है।
प्रोजेक्ट-75आई से नौसेना को मिलेगी नई रणनीतिक शक्ति
प्रोजेक्ट-75आई भारतीय नौसेना की सबसे महत्वपूर्ण आधुनिकीकरण योजनाओं में शामिल है। इसके तहत छह अत्याधुनिक डीजल-इलेक्ट्रिक आक्रमण पनडुब्बियों का निर्माण किया जाएगा, जिनमें ईंधन सेल आधारित एयर इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन (AIP) प्रणाली होगी। यह तकनीक पनडुब्बियों को लंबे समय तक समुद्र के भीतर बिना सतह पर आए संचालन करने की क्षमता प्रदान करती है। इससे उनकी गोपनीयता, मारक क्षमता और दुश्मन की निगरानी से बचने की क्षमता कई गुना बढ़ जाएगी। आधुनिक सेंसर, उन्नत युद्ध प्रबंधन प्रणाली और अत्याधुनिक हथियारों से लैस ये पनडुब्बियां हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की सामरिक बढ़त को और मजबूत करेंगी।
'मेक इन इंडिया' को मिलेगा बड़ा प्रोत्साहन
इस परियोजना का निर्माण भारत में ही किया जाएगा। मुंबई स्थित मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड जर्मनी की कंपनी के साथ रणनीतिक साझेदारी मॉडल के तहत इन पनडुब्बियों का निर्माण करेगी। अनुमान है कि परियोजना में 45 से 60 प्रतिशत तक स्वदेशी सामग्री और उपकरणों का उपयोग होगा। इससे भारतीय रक्षा उद्योग, सूक्ष्म एवं मध्यम विनिर्माण इकाइयों, इंजीनियरिंग क्षेत्र तथा उच्च कौशल वाले रोजगार को व्यापक बढ़ावा मिलेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि यह परियोजना केवल रक्षा क्षमता ही नहीं बढ़ाएगी, बल्कि भारत को वैश्विक रक्षा विनिर्माण केंद्र बनाने की दिशा में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।
2032 के बाद समुद्र में उतरेगी नई पीढ़ी की पनडुब्बिया
यदि सभी स्वीकृतियां निर्धारित समय के अनुसार मिल जाती हैं तो समझौते पर हस्ताक्षर होने के तुरंत बाद निर्माण कार्य शुरू किया जाएगा। योजना के अनुसार पहली पनडुब्बी वर्ष 2032-33 के आसपास भारतीय नौसेना में शामिल हो सकती है। इसके बाद चरणबद्ध तरीके से शेष पनडुब्बियों की आपूर्ति होगी। बदलते वैश्विक सुरक्षा परिदृश्य, हिंद-प्रशांत क्षेत्र में बढ़ती सामरिक प्रतिस्पर्धा और समुद्री सुरक्षा की नई चुनौतियों को देखते हुए यह परियोजना भारत की दीर्घकालिक रक्षा रणनीति का महत्वपूर्ण आधार मानी जा रही है। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि इससे भारतीय नौसेना की समुद्री प्रतिरोधक क्षमता, निगरानी शक्ति और रणनीतिक संतुलन पहले की तुलना में कहीं अधिक सुदृढ़ होगा।