नई दिल्ली. आगामी रबी सीजन से पहले भारत के लिए उर्वरक उपलब्धता को लेकर सकारात्मक संकेत सामने आए हैं। होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास समुद्री गतिविधियों में व्यवधान और पश्चिम एशिया में बनी तनावपूर्ण परिस्थितियों के कारण यूरिया तथा अन्य आवश्यक संसाधनों की आपूर्ति प्रभावित होने की आशंका जताई जा रही थी। इसके बावजूद यूरिया आयात के लिए जारी ताजा निविदा में जरूरत से अधिक मात्रा के लिए बोलियां मिलने से बाजार और कृषि क्षेत्र से जुड़े लोगों को राहत मिली है। यह स्थिति बताती है कि वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला पर दबाव के बावजूद भारत ने रबी की बुवाई से पहले आवश्यक उर्वरक उपलब्धता सुनिश्चित करने की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति की है।
अगस्त में आयात की तैयारी, सितंबर-अक्टूबर में पहुंचेंगे मालवाहक जहाज
भारत में उर्वरक कंपनियां सामान्यतः अगस्त के दौरान आयात संबंधी समझौते और खरीद प्रक्रिया को अंतिम रूप देती हैं, ताकि सितंबर और अक्टूबर तक उर्वरक की खेप भारतीय बंदरगाहों तक पहुंच सके। यही समय रबी फसलों की बुवाई से पहले सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि इस दौरान किसानों की उर्वरक मांग तेजी से बढ़ती है। समय पर आयात सुनिश्चित न होने की स्थिति में घरेलू वितरण व्यवस्था पर दबाव पड़ सकता है। इस बार होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास उत्पन्न परिस्थितियों ने समुद्री मार्ग से होने वाली आपूर्ति को लेकर आशंकाएं बढ़ाई थीं, लेकिन ताजा निविदा में पर्याप्त से अधिक प्रस्ताव मिलने से यह संकेत मिला है कि आवश्यक खेप समय पर जुटाई जा सकती है।
17 लाख टन यूरिया के लिए जारी की गई थी निविदा
राष्ट्रीय केमिकल्स एंड फर्टिलाइजर्स लिमिटेड ने 29 जुलाई को बड़ी मात्रा में यूरिया आयात के लिए निविदा जारी की थी। इस प्रक्रिया के तहत कुल 17 लाख टन थोक यूरिया की खरीद का लक्ष्य रखा गया, जिसमें 10 लाख टन भारत के पश्चिमी तट और सात लाख टन पूर्वी तट के लिए निर्धारित किया गया। प्रतिबंधों के दायरे में आने वाले देशों के आपूर्तिकर्ताओं को इस निविदा से बाहर रखा गया था। 11 अगस्त को बंद हुई बोली प्रक्रिया में सितंबर में आपूर्ति के लिए आवश्यक मात्रा से काफी अधिक प्रस्ताव मिलने की जानकारी सामने आई है। इससे यह संभावना मजबूत हुई है कि रबी सीजन के दौरान यूरिया की उपलब्धता बनाए रखने के लिए आयात व्यवस्था पर्याप्त रह सकती है।
घरेलू उत्पादन के बावजूद आयात क्यों है जरूरी
भारत की सालाना यूरिया आवश्यकता लगभग तीन करोड़ 90 लाख टन के आसपास मानी जाती है। देश अपनी कुल जरूरत का करीब तीन-चौथाई हिस्सा घरेलू उत्पादन से पूरा करता है, जबकि शेष आवश्यकता को आयात के माध्यम से पूरा करना पड़ता है। लगभग 80 लाख टन यूरिया की आयात निर्भरता के कारण वैश्विक बाजार, समुद्री परिवहन और अंतरराष्ट्रीय भू-राजनीतिक परिस्थितियों का भारत की उर्वरक आपूर्ति पर सीधा प्रभाव पड़ता है। घरेलू उत्पादन क्षमता में निरंतर विस्तार के बावजूद कृषि क्षेत्र की विशाल जरूरतों के कारण आयात अभी भी आपूर्ति व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा बना हुआ है। ऐसे में रबी से पहले पर्याप्त बोलियां मिलना केवल व्यापारिक घटनाक्रम नहीं, बल्कि खाद्य सुरक्षा और कृषि उत्पादन की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण संकेत है।
होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़ी चिंता क्यों बढ़ी थी
पश्चिम एशिया में संघर्ष और समुद्री मार्गों में व्यवधान ने भारत की उर्वरक आपूर्ति को लेकर चिंता बढ़ाई थी, क्योंकि आयातित यूरिया का बड़ा हिस्सा इसी समुद्री क्षेत्र से होकर आता है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार भारत के आयातित यूरिया का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा सामान्य परिस्थितियों में होर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते परिवहन होता है। यही मार्ग देश के लिए तरलीकृत प्राकृतिक गैस यानी एलएनजी की आपूर्ति की दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। एलएनजी घरेलू यूरिया उत्पादन में प्रमुख कच्चे माल के रूप में उपयोग की जाती है, इसलिए समुद्री मार्गों में लंबा व्यवधान आयातित उर्वरक के साथ-साथ घरेलू उत्पादन लागत और उपलब्धता पर भी दबाव डाल सकता था।
एलएनजी आपूर्ति पर असर की आशंका ने बढ़ाई चिंता
भारत की कुल एलएनजी आयात व्यवस्था का भी बड़ा हिस्सा पश्चिम एशियाई समुद्री मार्गों से जुड़ा हुआ है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार देश की लगभग 60 प्रतिशत आयातित एलएनजी सामान्यतः होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर गुजरती है। प्राकृतिक गैस उर्वरक उद्योग के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि यूरिया निर्माण की प्रक्रिया में इसका उपयोग प्रमुख कच्चे माल के रूप में होता है। इसलिए यदि इस समुद्री मार्ग में लंबे समय तक गंभीर व्यवधान बना रहता, तो केवल तैयार यूरिया की आयातित खेप ही नहीं, बल्कि घरेलू उर्वरक उत्पादन पर भी असर पड़ने की आशंका थी। ताजा आयात निविदा में पर्याप्त रुचि दिखने से तत्काल आपूर्ति संकट की चिंता कम हुई है, हालांकि वैश्विक परिस्थितियों पर लगातार नजर बनाए रखना जरूरी रहेगा।
किसानों के लिए समय पर उपलब्धता सबसे बड़ी प्राथमिकता
रबी सीजन में गेहूं, चना, सरसों और अन्य प्रमुख फसलों की बुवाई के दौरान उर्वरकों की मांग तेजी से बढ़ती है। यदि यूरिया और अन्य पोषक तत्वों वाले उर्वरक समय पर उपलब्ध नहीं होते हैं तो बुवाई से लेकर फसल की वृद्धि तक कृषि चक्र प्रभावित हो सकता है। भारत जैसे विशाल कृषि प्रधान देश में उर्वरक आपूर्ति की निरंतरता सीधे तौर पर किसानों की लागत, उत्पादन और खाद्य बाजार की स्थिति से जुड़ी होती है। इसलिए सरकार और उर्वरक कंपनियों के लिए चुनौती केवल पर्याप्त मात्रा खरीदने की नहीं, बल्कि उसे समय पर बंदरगाहों से राज्यों और फिर किसानों तक पहुंचाने की भी है। ताजा निविदा में मिली मजबूत प्रतिक्रिया से रबी की तैयारियों के लिए एक सकारात्मक आधार जरूर तैयार हुआ है।
वैश्विक तनाव के बीच आपूर्ति श्रृंखला की होगी असली परीक्षा
हालांकि यूरिया आयात के लिए जरूरत से अधिक बोलियां मिलना भारत के लिए राहत की खबर है, लेकिन पश्चिम एशिया की भू-राजनीतिक परिस्थितियां और समुद्री मार्गों की स्थिति आने वाले महीनों में महत्वपूर्ण बनी रहेंगी। वैश्विक उर्वरक बाजार केवल उत्पादन और मांग से संचालित नहीं होता, बल्कि ऊर्जा कीमतों, समुद्री मालभाड़े, अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों और युद्ध जैसी परिस्थितियों से भी प्रभावित होता है। यदि होर्मुज क्षेत्र में व्यवधान लंबे समय तक बना रहता है तो माल ढुलाई की लागत और आपूर्ति समय दोनों पर असर पड़ सकता है। ऐसे में भारत के लिए वैकल्पिक आपूर्तिकर्ताओं, पर्याप्त भंडारण और घरेलू उत्पादन क्षमता को मजबूत बनाए रखना कृषि आपूर्ति श्रृंखला की दीर्घकालिक सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण होगा।
रबी की बुवाई से पहले फिलहाल मजबूत दिखाई दे रही स्थिति
ताजा निविदा प्रक्रिया के परिणामों ने संकेत दिया है कि आगामी रबी सीजन से पहले यूरिया की उपलब्धता को लेकर तत्काल संकट की स्थिति नहीं दिख रही है। पर्याप्त से अधिक बोलियां मिलने से आयातकों को आवश्यक मात्रा सुनिश्चित करने के लिए अधिक विकल्प मिल सकते हैं और समय पर खेप पहुंचने की संभावना भी मजबूत होती है। भारत के लिए यह घटनाक्रम विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि रबी की बुवाई से पहले उर्वरक आपूर्ति में किसी भी प्रकार की बड़ी कमी कृषि क्षेत्र पर व्यापक असर डाल सकती है। फिलहाल तस्वीर राहत देने वाली है, लेकिन होर्मुज जलडमरूमध्य और पश्चिम एशिया की परिस्थितियों में बदलाव के साथ सरकार, उर्वरक कंपनियों और कृषि क्षेत्र को वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला पर लगातार नजर रखनी होगी।