नई दिल्ली. भारत को रूस से पांचवां और अंतिम एस-400 वायु रक्षा प्रणाली जनवरी-फरवरी 2027 में मिलने की संभावना है। सरकारी अधिकारियों के हवाले से सामने आई जानकारी के मुताबिक, इसकी आपूर्ति से पहले दिसंबर 2026 में भारतीय अधिकारियों की एक टीम रूस जाएगी। वहां प्रणाली के विभिन्न हिस्सों और उनकी आपूर्ति से जुड़ी तैयारियों का निरीक्षण किया जाएगा। इसके बाद उपकरणों के अलग-अलग हिस्से जनवरी से भारत पहुंचने शुरू हो सकते हैं। पहले इसकी आपूर्ति नवंबर 2026 में होने की संभावना जताई गई थी, लेकिन अब समय-सीमा आगे बढ़ने के संकेत हैं। हालांकि, अंतिम तारीख को लेकर आधिकारिक पुष्टि का इंतजार है।
2018 के 5.43 अरब डॉलर के सौदे की आखिरी खेप
भारत ने अक्टूबर 2018 में रूस के साथ 5 एस-400 प्रणालियों की खरीद के लिए करीब 5.43 अरब डॉलर का समझौता किया था। इस सौदे के तहत अब तक 4 प्रणालियां भारत को मिल चुकी हैं और पांचवीं की आपूर्ति के साथ मूल समझौता पूरा हो जाएगा। चौथी प्रणाली मई-जून 2026 में भारत पहुंची थी। इस तरह पांचवीं प्रणाली का आगमन भारतीय वायु रक्षा क्षमता में एक और महत्वपूर्ण बढ़ोतरी होगा। रूस से खरीदी गई इन प्रणालियों का उद्देश्य देश के संवेदनशील सैन्य ठिकानों और सीमावर्ती क्षेत्रों को हवाई हमलों से सुरक्षा देना है। बदलती क्षेत्रीय सुरक्षा चुनौतियों के बीच इस आपूर्ति को भारत की रक्षा तैयारियों के लिहाज से अहम माना जा रहा है।
क्या है एस-400 और कितनी है इसकी क्षमता?
एस-400 ट्रायम्फ रूस में विकसित लंबी दूरी की जमीन से हवा में मार करने वाली मिसाइल प्रणाली है। इसे लड़ाकू विमानों, क्रूज और अन्य मिसाइलों, ड्रोन तथा हवाई निगरानी विमानों जैसे लक्ष्यों का पता लगाने और उन्हें निशाना बनाने के लिए तैयार किया गया है। इसकी विशेषता अलग-अलग दूरी और ऊंचाई पर आने वाले हवाई खतरों से निपटने की क्षमता है। यह प्रणाली रडार, कमान नियंत्रण व्यवस्था और विभिन्न प्रकार की मिसाइलों के समन्वय से काम करती है। किसी भी हवाई हमले की स्थिति में यह दुश्मन के विमानों और अन्य लक्ष्यों को भारतीय सीमा या सैन्य ठिकानों के करीब पहुंचने से पहले रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
पश्चिमी और पूर्वी मोर्चे पर तैनात हैं 4 प्रणालियां
भारत को अब तक मिली 4 एस-400 प्रणालियों में से 3 पश्चिमी मोर्चे पर और 1 पूर्वी क्षेत्र में तैनात है। यह तैनाती पाकिस्तान और चीन से जुड़ी सुरक्षा चुनौतियों को ध्यान में रखकर की गई है। पश्चिमी क्षेत्र में इसकी मौजूदगी पाकिस्तान की हवाई गतिविधियों पर नजर रखने और संभावित हमलों का जवाब देने की क्षमता बढ़ाती है। वहीं पूर्वी क्षेत्र में तैनाती का उद्देश्य चीन से जुड़े रणनीतिक मोर्चे की सुरक्षा मजबूत करना है। पांचवीं प्रणाली मिलने के बाद भारत के पास 2018 के समझौते के तहत खरीदी गई सभी 5 प्रणालियां उपलब्ध होंगी। इससे देश की बहुस्तरीय वायु रक्षा व्यवस्था को और मजबूती मिलने की उम्मीद है।
ऑपरेशन सिंदूर में एस-400 की भूमिका रही अहम
मई 2025 में ऑपरेशन सिंदूर के दौरान एस-400 प्रणाली की भूमिका विशेष चर्चा में आई थी। भारतीय वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल ए.पी. सिंह ने अगस्त 2025 में बताया था कि इस अभियान के दौरान भारतीय वायु रक्षा प्रणाली ने पाकिस्तान के कम से कम 5 लड़ाकू विमानों और एक बड़े हवाई निगरानी या चेतावनी विमान को मार गिराया था। उनके मुताबिक, बड़े विमान को लगभग 300 किलोमीटर की दूरी पर निशाना बनाया गया था और इस कार्रवाई में एस-400 की अहम भूमिका थी। हालांकि, पाकिस्तान ने भारतीय दावों को खारिज किया था। ऐसे में इन घटनाओं का उल्लेख भारतीय वायुसेना प्रमुख के बयान के संदर्भ में किया जाना चाहिए। इस अभियान ने लंबी दूरी की वायु रक्षा प्रणालियों के सामरिक महत्व को फिर रेखांकित किया।
पांचवीं प्रणाली से बढ़ेगी हवाई सुरक्षा की क्षमता
पांचवीं एस-400 प्रणाली की आपूर्ति पूरी होने के बाद भारत की लंबी दूरी की वायु रक्षा क्षमता और व्यापक होगी। आधुनिक युद्ध में लड़ाकू विमानों के साथ ड्रोन, मिसाइल और हवाई निगरानी मंच भी बड़ी चुनौती बन चुके हैं। ऐसे में किसी एक प्रणाली पर निर्भर रहने के बजाय अलग-अलग दूरी और ऊंचाई पर काम करने वाली रक्षा प्रणालियों का समन्वय जरूरी है। एस-400 इस बहुस्तरीय सुरक्षा व्यवस्था की एक महत्वपूर्ण कड़ी है। इसकी अतिरिक्त उपलब्धता से संवेदनशील क्षेत्रों और सैन्य प्रतिष्ठानों की सुरक्षा मजबूत करने में मदद मिल सकती है। हालांकि, इसकी वास्तविक प्रभावशीलता तैनाती, रडार नेटवर्क, प्रशिक्षित कर्मियों और अन्य रक्षा प्रणालियों के साथ समन्वय पर भी निर्भर करेगी।