जोधपुर. जापान के 3 एफ-2ए लड़ाकू विमान 9 से 21 सितंबर तक राजस्थान के जोधपुर में होने वाले भारत-जापान वायुसेना अभ्यास ‘वीर गार्जियन-2026’ में हिस्सा लेंगे। यह पहली बार होगा जब जापान का एफ-2 लड़ाकू विमान भारतीय धरती पर किसी सैन्य अभ्यास का हिस्सा बनेगा। इससे पहले जापान के 2 सी-2 परिवहन विमान 5 सितंबर को जोधपुर पहुंच चुके हैं। इस अभ्यास से दोनों देशों की वायु सेनाओं को एक-दूसरे की परिचालन क्षमता, युद्धक रणनीति और तकनीकी प्रक्रियाओं को समझने का अवसर मिलेगा।
एफ-2 का एफ-16 से कितना पुराना रिश्ता है
जापान के एफ-2 की मूल डिजाइन अमेरिकी एफ-16 फाइटिंग फाल्कन से जुड़ी है। इसका विकास जापान की मित्सुबिशी हेवी इंडस्ट्रीज और अमेरिका की लॉकहीड मार्टिन ने मिलकर किया था। विमान के विकास और उत्पादन में जापान की हिस्सेदारी करीब 60% तथा अमेरिका की करीब 40% रही। पहला एफ-2 वर्ष 2000 में जापान की वायु आत्मरक्षा बल में शामिल हुआ। हालांकि इसे एफ-16 की सीधी प्रति कहना सही नहीं होगा, क्योंकि जापान ने अपनी रणनीतिक जरूरतों के अनुसार इसमें कई महत्वपूर्ण बदलाव किए।
समुद्री रक्षा को ध्यान में रखकर बनाया गया
एफ-16 मूल रूप से बहुउद्देश्यीय लड़ाकू विमान के रूप में विकसित हुआ था, जबकि जापान ने एफ-2 को अपनी भौगोलिक और सामरिक परिस्थितियों के अनुरूप ढाला। जापान के लिए समुद्री क्षेत्र और द्वीपों की सुरक्षा बेहद महत्वपूर्ण है, इसलिए एफ-2 को विशेष रूप से समुद्री हमले और तटीय रक्षा की जरूरतों को ध्यान में रखकर विकसित किया गया। इसमें बड़े पंख, अधिक हथियार ले जाने की क्षमता और उन्नत एवियोनिक्स जैसी विशेषताएं जोड़ी गईं। इस तरह एफ-2 को एफ-16 की मूल अवधारणा पर विकसित एक अलग और अधिक विशिष्ट लड़ाकू विमान माना जाता है।
आकार में एफ-16 से बड़ा है एफ-2
दिखने में एफ-2 काफी हद तक एफ-16 जैसा नजर आता है, लेकिन दोनों विमानों के आकार और संरचना में महत्वपूर्ण अंतर है। एफ-2 का विंग एरिया एफ-16 की तुलना में करीब 25% बड़ा है, जबकि इसका फ्यूजलेज भी लगभग 17 इंच अधिक लंबा है। बड़े पंखों के कारण विमान में अधिक ईंधन और हथियार ले जाने की क्षमता बढ़ती है। इसके निर्माण में ग्रेफाइट-इपॉक्सी कंपोजिट सामग्री का इस्तेमाल किया गया, जिससे संरचनात्मक मजबूती बनाए रखते हुए वजन कम करने में मदद मिली।
ज्यादा हथियार और उपकरण ले जाने की क्षमता
एफ-2 की एक महत्वपूर्ण विशेषता इसके 11 बाहरी हार्डप्वाइंट हैं। इन स्थानों पर विभिन्न प्रकार के हथियारों के साथ इलेक्ट्रॉनिक युद्ध और टोही से जुड़े उपकरण लगाए जा सकते हैं। तुलना के लिए एफ-16 के अधिकांश संस्करणों में 9 हार्डप्वाइंट होते हैं। अधिक बाहरी हथियार बिंदु एफ-2 को मिशन के अनुसार अलग-अलग हथियार और उपकरण ले जाने में अधिक लचीलापन देते हैं। यही वजह है कि समान मूल डिजाइन होने के बावजूद एफ-2 की युद्धक भूमिका और क्षमताएं एफ-16 से अलग दिखाई देती हैं।
पाकिस्तान के एफ-16 से क्यों हो रही तुलना
एफ-2 और पाकिस्तान के एफ-16 के बीच चर्चा की मुख्य वजह दोनों विमानों की साझा डिजाइन विरासत है। पाकिस्तान लंबे समय से एफ-16 लड़ाकू विमानों का इस्तेमाल करता रहा है, जबकि जापान ने उसी मूल अमेरिकी डिजाइन से अलग जरूरतों वाला एफ-2 विकसित किया। इसलिए दोनों विमानों के बीच कुछ समानताएं दिखाई देती हैं, लेकिन उन्हें एक ही विमान मानना तकनीकी रूप से सही नहीं होगा। एफ-2 में जापान की आवश्यकताओं के अनुसार किए गए संरचनात्मक, तकनीकी और परिचालन बदलाव इसे एफ-16 से अलग श्रेणी में खड़ा करते हैं।
भारत-जापान अभ्यास के लिए क्यों अहम है एफ-2
भारतीय वायुसेना के लिए एफ-2 की पहली भारत यात्रा केवल एक विदेशी लड़ाकू विमान को देखने तक सीमित नहीं है। ‘वीर गार्जियन-2026’ जैसे अभ्यासों के माध्यम से दोनों देशों की वायु सेनाओं को जटिल परिचालन परिस्थितियों में साथ काम करने, रणनीतिक समन्वय बढ़ाने और युद्धक प्रक्रियाओं का अभ्यास करने का अवसर मिलता है। जापान का एफ-2 अपनी समुद्री रक्षा केंद्रित क्षमताओं के कारण विशेष रुचि का विषय है। हिंद-प्रशांत क्षेत्र में बदलते सुरक्षा समीकरणों के बीच भारत और जापान के बीच बढ़ता सैन्य सहयोग इस अभ्यास को और महत्वपूर्ण बनाता है।
पहली तैनाती से बढ़ेगा रणनीतिक संदेश
भारत में एफ-2 की पहली तैनाती को दोनों देशों के बढ़ते रक्षा संबंधों के व्यापक संदर्भ में देखा जा रहा है। जापान के अत्याधुनिक लड़ाकू विमान का भारतीय वायुसेना के साथ अभ्यास करना दोनों देशों के बीच बढ़ते सैन्य विश्वास और परिचालन सहयोग का संकेत है। साथ ही, एफ-2 और एफ-16 की साझा तकनीकी जड़ें इस अभ्यास को विमानन विशेषज्ञों के लिए भी खास बनाती हैं। हालांकि एफ-2 का विकास एफ-16 से हुआ है, लेकिन जापान ने इसे अपनी सामरिक जरूरतों के अनुरूप इतना बदला कि यह केवल एफ-16 का जापानी संस्करण नहीं, बल्कि अपनी विशिष्ट क्षमताओं वाला लड़ाकू विमान बन गया है।