नई दिल्ली: गंभीर आपराधिक मामलों में फंसे और जेल की हवा खा रहे देश के प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या मंत्रियों को पद से हटाने के लिए लाए गए केंद्र सरकार के बेहद महत्वाकांक्षी बिल पर संयुक्त संसदीय समिति (JPC) ने अपनी अंतिम रिपोर्ट तैयार कर ली है। समाचार एजेंसी पीटीआई (PTI) के मुताबिक, जेपीसी इस ऐतिहासिक विधेयक में 'बर्खास्तगी বা हटाने' (Removal) के कड़े प्रावधान के पक्ष में नहीं है। जेपीसी ने इसके बदले दागी जनप्रनिधियों को केवल 'सस्पेंड' करने की एक बीच का रास्ता निकालने की सिफारिश की है।
सूत्रों के अनुसार, समिति अगले सप्ताह संसद में अपनी यह बहुप्रतीक्षित रिपोर्ट पेश करने जा रही है। इस रिपोर्ट के सामने आने के बाद सरकार और विपक्ष के बीच एक बार फिर सियासी खींचतान तेज होने के आसार हैं।
क्या था केंद्र सरकार का मूल विधेयक?
पिछले साल अगस्त में संसद के मानसून सत्र के आखिरी दिन केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने लोकसभा में तीन बेहद महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक विधेयक पेश किए थे। इनमें केंद्रशासित प्रदेश प्रशासन (संशोधन) विधेयक 2025, संविधान (130वां संशोधन) विधेयक 2025 और जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन (संशोधन) विधेयक 2025 शामिल थे।
इस प्रस्तावित कानून का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि गंभीर अपराधों में लिप्त कोई भी मंत्री, मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री अपने पद के संवैधानिक विशेषाधिकार या ढाल का दुरुपयोग न कर सके। विधेयक में साफ प्रावधान था कि:
यदि प्रधानमंत्री, कोई केंद्रीय मंत्री, किसी राज्य के मुख्यमंत्री या मंत्री पद पर रहते हुए कोई व्यक्ति किसी गंभीर अपराध के आरोप में लगातार 30 दिनों से अधिक समय तक न्यायिक हिरासत (जेल) में रहता है, तो उसे तुरंत उसके पद से हटा (Dismiss) दिया जाएगा।

विपक्ष ने बताया था 'सुपर इमरजेंसी', सरकार ने JPC को भेजा था बिल
इस बिल के पेश होते ही कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस (TMC) समेत पूरे विपक्षी खेमे ने संसद से लेकर सड़क तक इसका पुरजोर विरोध किया था। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने तब तीखा हमला बोलते हुए कहा था, "यह बिल और कुछ नहीं बल्कि देश में 'सुपर इमरजेंसी' लागू करने की केंद्र की एक सोची-समझी साजिश है। मोदी सरकार इसके जरिए भारत के लोकतांत्रिक ढांचे को हमेशा के लिए ध्वस्त करना चाहती है।" विपक्ष के भारी हंगामे और विरोध को देखते हुए सरकार ने इस पर तुरंत वोटिंग कराने के बजाय इसे विस्तृत समीक्षा के लिए संयुक्त संसदीय समिति (JPC) के पास भेज दिया था।
JPC की रिपोर्ट में क्या है नया फॉर्मूला?
महीनों की समीक्षा और चर्चा के बाद अब जेपीसी ने अपनी रिपोर्ट को अंतिम रूप दे दिया है। समिति की मुख्य सिफारिशें इस प्रकार हैं:'हटाने' की जगह 'सस्पेंशन': जेपीसी का मानना है कि सीधे पद से हटाने के बजाय आरोपी मंत्री या मुख्यमंत्री को सस्पेंड किया जाना चाहिए।
दोषमुक्त होने पर बहाली: अगर भविष्य में वह व्यक्ति अदालत से बेकसूर (खालास) साबित हो जाता है, तो उसका सस्पेंशन तुरंत वापस लेकर उसे दोबारा पद पर बहाल करने का प्रावधान होना चाहिए।
गंभीर अपराध' की नई परिभाषा: जेपीसी ने स्पष्ट किया है कि केवल उन्हीं अपराधों को 'गंभीर' माना जाएगा, जिनमें कम से कम 5 वर्ष या उससे अधिक की जेल का प्रावधान हो। इसके लिए एक अलग सूची (List) बनाने का भी सुझाव दिया गया है।
फास्ट ट्रैक कोर्ट का गठन: संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों के मुकदमों का फैसला सालों-साल न लटके, इसके लिए जेपीसी ने विशेष फास्ट ट्रैक कोर्ट (त्वरित विचार न्यायालय) के जरिए जल्द से जल्द ट्रायल पूरा करने की पुरजोर सिफारिश की है।
अब देखना दिलचस्प होगा कि अगले हफ्ते जब यह रिपोर्ट संसद के पटल पर रखी जाएगी, तो मोदी सरकार जेपीसी के इन सुझावों को किस तरह स्वीकार करती है और विपक्ष का इस पर क्या रुख रहता है।