पश्चिम बंगाल में होने वाले आगामी विधानसभा चुनावों से पहले मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर दिल्ली में जिस तरह मोर्चा खोला, उसने राष्ट्रीय राजनीति का ध्यान अपनी ओर खींच लिया। तीन दिनों तक उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में उपस्थिति से लेकर चुनाव आयोग के साथ वार्ता तक हर मंच पर जो सक्रियता दिखाई, उसने यह स्पष्ट कर दिया कि यह सिर्फ प्रशासनिक मुद्दा नहीं, बल्कि चुनावी रणनीति का केन्द्रीय हिस्सा है। ममता की उपस्थिति ने यह संदेश दिया कि मतदाता सूची से छेड़छाड़ को लेकर राज्य की राजनीति अब सीधे राष्ट्रीय मंच पर पहुंच चुकी है।
अदालत में स्वयं दलील: संघर्षशील छवि का पुनर्पुष्टि
ममता बनर्जी की छवि हमेशा से ही संघर्ष के मैदान में डटी रहने वाली नेता की रही है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट में जाकर खुद दलील देना एक अभूतपूर्व कदम था, जिसने उनकी राजनीतिक शैली को एक बार फिर अनोखी धार दी। अदालत में कई घंटे मौजूद रहकर उन्होंने यह तर्क रखा कि 2025 की मतदाता सूची को ही 2026 के विधानसभा चुनाव का आधार बनाया जाए और किसी भी नए प्रयोग से चुनावी प्रक्रिया को अस्थिर न किया जाए। इस कदम के माध्यम से उन्होंने यह स्पष्ट किया कि वह चुनावी व्यवस्था में किसी भी संभावित अनियमितता को लेकर गंभीर हैं और इसे हल्के में नहीं लिया जा सकता।
संदेश: लड़ाई किसी भी स्तर पर, किसी भी मंच पर
ममता बनर्जी द्वारा अदालत में स्वयं खड़े होकर दलील देना केवल कानूनी रणनीति नहीं था, बल्कि एक शक्तिशाली राजनीतिक संदेश था। उन्होंने यह प्रदर्शित किया कि वह न केवल प्रशासनिक प्रमुख हैं, बल्कि लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं की संरक्षक की भूमिका निभाने को भी तैयार हैं। यह कदम मतदाताओं को यह भरोसा दिलाने का प्रयास है कि उनकी पहचान, उनका वोट और उनकी आवाज़ किसी भी तरह के हस्तक्षेप से सुरक्षित रखने के लिए सरकार पूरी शक्ति से खड़ी है।
विपक्ष की प्रतिक्रिया और राजनीतिक ध्रुवीकरण
स्वाभाविक रूप से, विपक्षी दलों ने ममता बनर्जी की इस सक्रियता को “ड्रामेबाज़ी” कहकर खारिज किया। उनकी आलोचना का तर्क यह है कि मुख्यमंत्री का अदालत में जाना एक संवैधानिक पद की गरिमा के विरुद्ध है और इसका उद्देश्य सिर्फ राजनीतिक लाभ लेना है। लेकिन समर्थकों और तटस्थ विश्लेषकों के बीच यह धारणा भी मजबूत हुई है कि ममता इस कदम के जरिए राष्ट्रीय स्तर पर अपनी प्रासंगिकता को सुदृढ़ कर रही हैं और बंगाल की राजनीति को केंद्र में लाने का प्रयास कर रही हैं।
चुनाव आयोग से सीधी टकराहट और उसका अर्थ
चुनाव आयोग के साथ बैठक में भी ममता बनर्जी ने यह दावा दोहराया कि एसआईआर की प्रक्रिया कई तरह की आशंकाओं को जन्म देती है और समय की दृष्टि से भी यह उचित नहीं है। उनका जोर इस बात पर रहा कि किसी भी चुनावी सुधार का उद्देश्य पारदर्शिता बढ़ाना होना चाहिए, न कि मतदाता सूची में अनावश्यक दबाव और भ्रम उत्पन्न करना। आयोग के सामने उनकी यह assertive शैली यह स्पष्ट करती है कि वह चुनावी प्रशिक्षण, प्रयोगों और प्रक्रियाओं में केन्द्र सरकार की भूमिका को लेकर सतर्क हैं और किसी भी विवादित नीति के विस्तार को रोकने का प्रयास कर रही हैं।
2026 चुनावों की पृष्ठभूमि में रणनीतिक महत्व
2026 में होने वाले विधानसभा चुनावों से पहले यह राजनीतिक संघर्ष एक बड़े narrative को जन्म दे चुका है—मतदाता सूची की पवित्रता, चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता और लोकतांत्रिक अधिकारों की सुरक्षा। ममता बनर्जी का यह आक्रामक रुख बंगाल की राजनीति को भावनात्मक और राजनीतिक दोनों स्तर पर उबाल देता है। यह बयान भी देता है कि उनकी पार्टी और नेतृत्व चुनावी तैयारी को लेकर पूरी तरह सतर्क और आक्रामक है।
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