नई दिल्ली. IZA डिस्कशन पेपर सीरीज में प्रकाशित अध्ययन मैंडेटेड मैटर्निटी लीव एंड लेबर सब्सटीट्यूशन में भारत के विनिर्माण क्षेत्र पर 2017 के मातृत्व लाभ संशोधन का प्रभाव जांचा गया। शोधकर्ताओं ने वार्षिक उद्योग सर्वेक्षण के 2012-13 से 2019-20 तक के आंकड़ों का विश्लेषण किया। अध्ययन में पाया गया कि कानून लागू होने के बाद कवर फर्मों में महिलाओं की भर्ती कम हुई और पुरुषों की भर्ती बढ़ी। महिलाओं के रोजगार में 8.4 प्रतिशत की गिरावट दर्ज हुई जबकि पुरुषों के रोजगार में 2.6 प्रतिशत की वृद्धि हुई। फर्मों के उत्पादन और मुनाफे में कोई उल्लेखनीय बदलाव नहीं आया। यह अध्ययन IZA@LISER नेटवर्क के अंतर्गत प्रकाशित हुआ जो श्रम अर्थशास्त्र के वैश्विक विद्वानों का समूह है।
2017 के संशोधन ने बदली पुरानी व्यवस्था
मातृत्व लाभ संशोधन अधिनियम 2017 ने भुगतान वाले मातृत्व अवकाश को 12 सप्ताह से बढ़ाकर पहले दो बच्चों के लिए 26 सप्ताह कर दिया। नियोक्ताओं को इस अवकाश की पूरी लागत वहन करने का दायित्व दिया गया। 50 या अधिक कर्मचारियों वाले प्रत्येक प्रतिष्ठान में निर्धारित दूरी के अंदर क्रेच सुविधा अनिवार्य की गई। महिलाओं को दिन में चार बार क्रेच जाने की अनुमति दी गई। यह संशोधन 55 वर्ष पुराने कानून में महत्वपूर्ण बदलाव था। कानून का उद्देश्य महिलाओं को बेहतर सुविधा देना था लेकिन अध्ययन के अनुसार इसका उलटा असर रोजगार पर पड़ा। नियोक्ताओं पर अतिरिक्त वित्तीय बोझ पड़ने से महिलाओं की भर्ती में कमी आई।
महिलाओं के कार्य दिवसों में हुई गिरावट
अध्ययन में पाया गया कि महिलाओं के काम करने के दिनों की संख्या में 9.5 प्रतिशत की कमी आई। इसके विपरीत पुरुषों के काम करने के दिनों में 2.1 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज हुई। शोधकर्ताओं के अनुसार फर्मों ने महिलाओं की जगह पुरुषों को प्राथमिकता देनी शुरू कर दी। यह बदलाव इसलिए हुआ क्योंकि मातृत्व अवकाश की लागत सीधे नियोक्ता को वहन करनी पड़ती है। महिलाओं को दीर्घकालिक अवकाश पर जाने की संभावना को देखते हुए नियोक्ता जोखिम कम करने के लिए पुरुष कर्मचारियों को तरजीह देने लगे। यह प्रवृत्ति कानून के मूल उद्देश्य के विपरीत साबित हुई। रोजगार में लिंग आधारित प्रतिस्थापन स्पष्ट रूप से दिखाई दिया।
महिला प्रधान उद्योगों में अधिक गहरा असर
जिन उद्योगों में महिलाओं की संख्या अधिक थी वहां प्रभाव और ज्यादा देखा गया। इन उद्योगों में महिलाओं के रोजगार में 12 प्रतिशत की गिरावट आई जबकि पुरुषों के रोजगार में 4.1 प्रतिशत की वृद्धि हुई। अध्ययन से स्पष्ट है कि जहां महिला श्रमिकों की निर्भरता अधिक थी वहां नियोक्ताओं ने तेजी से पुरुषों की ओर रुख किया। महिला प्रधान क्षेत्रों में यह बदलाव श्रम बाजार की संरचना को प्रभावित कर रहा है। शोधकर्ताओं ने पाया कि कानून का बोझ उन इकाइयों पर अधिक पड़ा जो पहले से महिलाओं को रोजगार देती थीं। इससे महिलाओं के लिए अवसर और सीमित होते दिखे।
शोधकर्ताओं की प्रमुख सिफारिशें
अध्ययनकर्ताओं ने सुझाव दिया कि मातृत्व अवकाश की लागत व्यक्तिगत नियोक्ताओं से हटाकर सामाजिक बीमा प्रणाली पर स्थानांतरित की जाए। उन्होंने सरकार द्वारा वित्त पोषित पितृत्व अवकाश शुरू करने की भी सिफारिश की। अनौपचारिक क्षेत्र के श्रमिकों तक मातृत्व सुरक्षा का विस्तार करने पर जोर दिया गया। शोधकर्ताओं का मानना है कि वर्तमान व्यवस्था नियोक्ताओं को महिलाओं की भर्ती से बचने के लिए प्रेरित करती है। सामाजिक बीमा मॉडल अपनाने से यह बोझ साझा होगा और महिलाओं के रोजगार पर नकारात्मक असर कम होगा। ये सिफारिशें नीतिगत सुधार की दिशा में महत्वपूर्ण मानी जा रही हैं।
निर्माण क्षेत्र में भी दिखी समान बाधाएं
एक श्रम अध्ययन विशेषज्ञ ने बताया कि निर्माण क्षेत्र में भी महिलाओं के रोजगार में समान बाधाएं दिखती हैं। पीरियोडिक लेबर फोर्स सर्वे यानी PLFS आंकड़ों के अनुसार निर्माण क्षेत्र में भारत के पुरुष श्रमिकों का लगभग 15.6 प्रतिशत हिस्सा है जबकि महिलाओं का हिस्सा पांच प्रतिशत से भी कम है। पुरुष कृषि से निर्माण की ओर स्थानांतरित हुए लेकिन महिलाओं की हिस्सेदारी स्थिर रही। ठेकेदार अलग शौचालय, मातृत्व और सुरक्षा संबंधी दायित्वों से बचने के लिए महिलाओं को नौकरी देने से बचते हैं। पुरुषों को साझा आवास में रखना आसान होता है। विशेषज्ञ के अनुसार महिलाओं को सशक्त बनाने वाले कानून कभी-कभी उनके प्रवेश में बाधा बन जाते हैं।