देश के कई राज्यों में तापमान 46 से 47 डिग्री सेल्सियस तक पहुंचने के कारण जनजीवन प्रभावित हो रहा है। लगातार चल रही लू और तपती धूप के बीच लोगों की निगाहें मानसून पर टिकी हुई हैं। ऐसे समय में भारत मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) ने जानकारी दी है कि दक्षिण-पश्चिम मानसून भारतीय तटों की ओर तेजी से बढ़ रहा है और अगले दो से तीन दिनों में इसके अरब सागर, बंगाल की खाड़ी तथा अंडमान सागर के शेष हिस्सों में आगे बढ़ने के लिए अनुकूल परिस्थितियां बन रही हैं।
दक्षिणी समुद्री क्षेत्रों में मानसून की रफ्तार तेज
मौसम विभाग के अनुसार मानसून फिलहाल दक्षिण-पश्चिम और दक्षिण-पूर्व अरब सागर, कोमोरिन क्षेत्र, पूर्वी मध्य बंगाल की खाड़ी तथा अंडमान सागर के इलाकों में सक्रियता बढ़ा रहा है। यह प्रगति संकेत देती है कि आने वाले दिनों में केरल तट सहित दक्षिण भारत के कई हिस्सों में मानसूनी गतिविधियां तेज हो सकती हैं। इससे तापमान में गिरावट और आंधी-बारिश की घटनाओं में वृद्धि की संभावना है।
पिछले वर्ष से अलग रह सकता है इस बार का मानसून
पिछले वर्ष मानसून ने निर्धारित समय से पहले दस्तक देकर रिकॉर्ड बनाया था। वर्ष 2025 में मानसून 24 मई को ही केरल पहुंच गया था और 29 जून तक पूरे देश को कवर कर चुका था। हालांकि इस वर्ष परिस्थितियां कुछ अलग दिखाई दे रही हैं। मौसम वैज्ञानिकों का मानना है कि समुद्री और वायुमंडलीय परिस्थितियों के कारण मानसून की गति सामान्य से भिन्न रह सकती है और इसका असर वर्षा वितरण पर भी पड़ सकता है।
एल नीनो बन सकता है बारिश का बड़ा बाधक
मॉनसून मिशन क्लाइमेट फोरकास्ट सिस्टम के आकलन के अनुसार जुलाई के बाद एल नीनो परिस्थितियां विकसित होने की संभावना है। फिलहाल जून तक स्थिति न्यूट्रल रहने का अनुमान है, लेकिन इसके बाद प्रशांत महासागर में तापमान बढ़ने से एल नीनो सक्रिय हो सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि इसका सबसे अधिक प्रभाव अगस्त और सितंबर के दौरान मानसूनी वर्षा पर पड़ सकता है, जिससे कई क्षेत्रों में सामान्य से कम बारिश दर्ज होने की आशंका है।
कृषि अर्थव्यवस्था पर क्या होगा असर?
भारत की कृषि व्यवस्था का बड़ा हिस्सा दक्षिण-पश्चिम मानसून पर निर्भर करता है। विशेष रूप से खरीफ फसलों की बुआई जून और जुलाई में होती है। मौसम विभाग का मानना है कि भले ही पूरे मानसून सीजन में वर्षा सामान्य से कम रहने का अनुमान हो, लेकिन शुरुआती महीनों में पर्याप्त बारिश होने की स्थिति में खरीफ फसलों की बुआई पर बड़ा नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ेगा। इससे किसानों को राहत मिल सकती है और कृषि उत्पादन पर दबाव सीमित रह सकता है।
औसत से कम बारिश का अनुमान, फिर भी पूरी तरह निराशा नहीं
आईएमडी की पहली दीर्घकालिक पूर्वानुमान रिपोर्ट के अनुसार जून से सितंबर 2026 के बीच देशभर में दीर्घकालिक औसत (एलपीए) का लगभग 92 प्रतिशत वर्षा होने की संभावना है। यह सामान्य से कम जरूर है, लेकिन अत्यधिक कमजोर मानसून की श्रेणी में नहीं आता। इसलिए विशेषज्ञों का कहना है कि क्षेत्रवार बारिश के वितरण और समय पर निर्भर करेगा कि इसका वास्तविक प्रभाव कितना व्यापक होगा।
देश जहां एक ओर भीषण गर्मी और लू से परेशान है, वहीं मानसून की प्रगति राहत की उम्मीद जगा रही है। हालांकि एल नीनो की संभावित सक्रियता और औसत से कम वर्षा का अनुमान यह संकेत भी देता है कि आने वाले महीनों में मौसम पर लगातार नजर बनाए रखना जरूरी होगा। किसानों, नीति निर्माताओं और आम नागरिकों के लिए यह मानसून राहत और चुनौती दोनों का मिश्रण साबित हो सकता है।