शंघाई सहयोग संगठन की बिश्केक बैठक से सामने आई एक तस्वीर ने भारत और पाकिस्तान के बीच पहले से तनावपूर्ण संबंधों के बीच नया विवाद खड़ा कर दिया। 1 सितंबर 2026 को संगठन के सदस्य देशों के नेताओं ने सामूहिक तस्वीर खिंचवाई थी, जिसमें भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग, ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ समेत कई नेता मौजूद थे। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री कार्यालय ने जब इस तस्वीर का एक बदला हुआ रूप अपने आधिकारिक माध्यम पर साझा किया तो तस्वीर के दोनों किनारों से कई नेता गायब नजर आए। इनमें नरेंद्र मोदी और मसूद पेजेश्कियन भी शामिल थे।
मोदी को हटाकर शहबाज को बीच में दिखाने की कोशिश
मामले ने इसलिए ज्यादा ध्यान खींचा क्योंकि पाकिस्तान की ओर से साझा किया गया संस्करण ऐसा दिखाई दे रहा था, जिसमें शहबाज शरीफ तस्वीर के मध्य में प्रमुखता से नजर आ रहे थे। मूल तस्वीर में उनकी स्थिति अलग थी और नरेंद्र मोदी समेत अन्य नेताओं की मौजूदगी स्पष्ट दिखाई देती थी। इस बदलाव को लेकर भारत में सोशल मीडिया से लेकर राजनीतिक गलियारों तक सवाल उठने लगे कि आखिर एक बहुपक्षीय संगठन के आधिकारिक कार्यक्रम की तस्वीर को इस तरह क्यों बदला गया। खास बात यह रही कि कुछ ही समय बाद शहबाज शरीफ ने अपने निजी माध्यम से पूरी समूह तस्वीर साझा कर दी। इससे विवाद और बढ़ गया और पहले जारी तस्वीर की मंशा को लेकर सवाल खड़े होने लगे।
भारत में तीखी प्रतिक्रिया, एकनाथ शिंदे ने साधा निशाना
पाकिस्तान के इस कदम पर भारत में तीखी राजनीतिक प्रतिक्रिया देखने को मिली। महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने इसे बेहद दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए पाकिस्तान पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि भारत के प्रधानमंत्री चाहें तो पाकिस्तान को विश्व की तस्वीर से ही बाहर कर सकते हैं। उनका बयान इस विवाद को केवल तस्वीर बदलने की घटना के बजाय दोनों देशों के बीच मौजूद राजनीतिक और कूटनीतिक तनाव के संदर्भ में रखता है। भारतीय पक्ष की प्रतिक्रिया में यह संदेश भी दिखाई दिया कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर किसी नेता की तस्वीर को काट देने से उसकी वास्तविक वैश्विक भूमिका या भारत की कूटनीतिक स्थिति पर कोई असर नहीं पड़ता।
पूरी तस्वीर सामने आने से खुल गई कहानी
विवाद के बीच नरेंद्र मोदी ने अपने आधिकारिक माध्यम से एससीओ नेताओं की पूरी समूह तस्वीर साझा की। इस तस्वीर में सभी प्रमुख नेता अपनी वास्तविक स्थिति में दिखाई दिए और इससे पाकिस्तान के प्रधानमंत्री कार्यालय द्वारा साझा किए गए काटे गए संस्करण की तुलना भी संभव हो गई। बाद में शहबाज शरीफ की ओर से भी पूरी तस्वीर साझा की गई। इस घटनाक्रम ने पाकिस्तान की शुरुआती तस्वीर को लेकर उठे सवालों को और हवा दी, क्योंकि जब मूल तस्वीर सार्वजनिक रूप से उपलब्ध थी तो उसे काटकर अलग रूप में प्रस्तुत करने की जरूरत पर सवाल उठना स्वाभाविक था।
यह सिर्फ तस्वीर नहीं, कूटनीतिक संदेश का मामला
अंतरराष्ट्रीय राजनीति में तस्वीरें केवल दृश्य रिकॉर्ड नहीं होतीं, बल्कि कई बार वे प्रतीकात्मक संदेश का माध्यम भी बनती हैं। किसी नेता को किसी आधिकारिक तस्वीर से हटाना या किसी नेता को प्रमुख स्थान पर दिखाना राजनीतिक धारणा बनाने की कोशिश के रूप में देखा जा सकता है। हालांकि, इस मामले में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री कार्यालय ने सार्वजनिक रूप से यह नहीं बताया कि तस्वीर को इस तरह क्यों काटा गया। इसलिए इसे निश्चित रूप से किसी सोची-समझी कूटनीतिक रणनीति का परिणाम बताना जल्दबाजी होगी। लेकिन यह जरूर है कि तस्वीर के बदलाव ने उस समय अनावश्यक विवाद पैदा किया जब एससीओ जैसे बहुपक्षीय मंच पर सदस्य देशों के बीच सहयोग और क्षेत्रीय मुद्दों पर चर्चा हो रही थी।
उसी सम्मेलन में मोदी ने आतंकवाद पर दिया कड़ा संदेश
तस्वीर विवाद के समानांतर एससीओ सम्मेलन में नरेंद्र मोदी ने आतंकवाद के मुद्दे पर भी कड़ा संदेश दिया। उन्होंने सदस्य देशों से आतंकवाद के वित्तपोषण, भर्ती, कट्टरपंथ और आतंकवादियों को सुरक्षित ठिकाने उपलब्ध कराने वाले पूरे तंत्र को खत्म करने की दिशा में मिलकर काम करने का आह्वान किया। उन्होंने यह भी कहा कि जो देश आतंकवाद को राज्य की नीति के साधन के रूप में इस्तेमाल करते हैं और आतंकवादियों को समर्थन या संरक्षण देते हैं, उन्हें स्पष्ट संदेश दिया जाना चाहिए कि आतंकवाद को रणनीतिक संपत्ति के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता। पाकिस्तान की मौजूदगी वाले मंच पर दिया गया यह संदेश दोनों देशों के तनावपूर्ण संबंधों के संदर्भ में खास महत्व रखता है।
तस्वीर काटने से नहीं बदलती वैश्विक तस्वीर
पाकिस्तान की ओर से साझा की गई तस्वीर में बदलाव चाहे जिस उद्देश्य से किया गया हो, इससे अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की मौजूदगी कम नहीं होती। एससीओ जैसे संगठन में भारत की भूमिका उसके आर्थिक आकार, रणनीतिक महत्व और क्षेत्रीय प्रभाव से तय होती है, किसी एक तस्वीर के फ्रेम से नहीं। यही वजह है कि विवाद का सबसे बड़ा असर तस्वीर से ज्यादा उस राजनीतिक संदेश पर पड़ा जिसे लोगों ने इस कदम में देखा। यदि किसी बहुपक्षीय मंच की वास्तविक तस्वीर को काटकर किसी एक नेता को अधिक प्रमुख दिखाने का प्रयास किया जाता है, तो उससे तस्वीर बदल सकती है, लेकिन सम्मेलन की वास्तविकता नहीं बदलती। इस पूरे घटनाक्रम ने यही सवाल सामने रखा है कि आज के डिजिटल कूटनीतिक दौर में प्रतीकात्मक राजनीति कितनी जल्दी उलटी पड़ सकती है।