नई दिल्ली. देश में पहले से ही खाद्य पदार्थों, सब्जियों और दैनिक जरूरत की वस्तुओं की बढ़ती कीमतों से लोग परेशान हैं। ऐसे में पेट्रोल और डीजल के दामों में लगातार वृद्धि ने परिवहन लागत और घरेलू बजट दोनों पर अतिरिक्त दबाव डाल दिया है। आर्थिक विश्लेषकों का मानना है कि वैश्विक ऊर्जा बाजार में अस्थिरता और बढ़ती लागत के कारण आने वाले समय में ईंधन कीमतों पर दबाव बना रह सकता है।
11 दिनों में चार बार बढ़े दाम
हाल के दिनों में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में लगातार वृद्धि दर्ज की गई है। पिछले 11 दिनों के दौरान चार अलग-अलग चरणों में कीमतें बढ़ाई गईं। पहले तीन रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी हुई, इसके बाद 90 पैसे और 87 पैसे प्रति लीटर की वृद्धि की गई। ताजा संशोधन में 2.61 रुपये प्रति लीटर का इजाफा हुआ। इस तरह कुल मिलाकर 11 दिनों में पेट्रोल और डीजल दोनों के दाम सात रुपये प्रति लीटर से अधिक बढ़ चुके हैं।
आखिर क्यों बढ़ाने पड़ रहे हैं दाम?
ईंधन कीमतों में बढ़ोतरी का सबसे बड़ा कारण कच्चे तेल की ऊंची लागत और उसके प्रसंस्करण पर आने वाला खर्च है। अंतरराष्ट्रीय बाजार से कच्चा तेल खरीदने, उसे रिफाइन करने, परिवहन और वितरण की लागत लगातार बढ़ रही है। जब खुदरा बिक्री मूल्य इन लागतों से कम रहता है, तब तेल विपणन कंपनियों को वित्तीय नुकसान उठाना पड़ता है। इसी अंतर को कम करने के लिए समय-समय पर कीमतों में संशोधन किया जाता है।
सरकारी तेल कंपनियां अब भी घाटे में
देश की प्रमुख सरकारी तेल विपणन कंपनियां—इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन, भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड और हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड—हालिया मूल्य वृद्धि के बावजूद वित्तीय दबाव का सामना कर रही हैं। विशेषज्ञों के अनुसार बढ़ी हुई कीमतें अभी तक कंपनियों के पुराने घाटे और वर्तमान लागत के अंतर को पूरी तरह समाप्त नहीं कर पाई हैं।
क्या अभी और बढ़ सकते हैं दाम?
वित्तीय बाजार के आकलन बताते हैं कि तेल कंपनियों के घाटे की पूरी भरपाई के लिए सैद्धांतिक रूप से ईंधन कीमतों में 28 से 33 रुपये प्रति लीटर तक की अतिरिक्त वृद्धि की आवश्यकता हो सकती है। हालांकि वास्तविक मूल्य निर्धारण केवल लागत पर निर्भर नहीं करता, बल्कि इसमें सरकारी नीतियां, कर ढांचा, वैश्विक बाजार की स्थिति और उपभोक्ता हित जैसे कई कारक भी शामिल होते हैं। इसलिए इतनी बड़ी वृद्धि होना आवश्यक नहीं है, लेकिन यह संकेत अवश्य मिलता है कि लागत और बिक्री मूल्य के बीच अभी भी बड़ा अंतर मौजूद है।
आम लोगों और अर्थव्यवस्था पर क्या असर पड़ता है?
पेट्रोल और डीजल की कीमतें बढ़ने का प्रभाव केवल वाहन चालकों तक सीमित नहीं रहता। परिवहन महंगा होने से खाद्यान्न, फल-सब्जियां, निर्माण सामग्री और अन्य वस्तुओं की लागत भी बढ़ सकती है। इससे महंगाई दर पर दबाव बनता है और उपभोक्ताओं की क्रय शक्ति प्रभावित होती है। विशेष रूप से मध्यम वर्ग और निम्न आय वर्ग के परिवारों पर इसका असर अधिक महसूस किया जाता है।
वैश्विक बाजार की भूमिका भी अहम
भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयातित कच्चे तेल से पूरा करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव का सीधा असर घरेलू ईंधन कीमतों पर पड़ता है। भू-राजनीतिक तनाव, उत्पादन में कटौती, आपूर्ति संबंधी बाधाएं और वैश्विक मांग में बदलाव जैसे कारक तेल बाजार को प्रभावित करते हैं, जिसका असर अंततः भारतीय उपभोक्ताओं तक पहुंचता है।
पेट्रोल और डीजल की कीमतों में हालिया बढ़ोतरी केवल एक अस्थायी फैसला नहीं बल्कि बढ़ती लागत और वित्तीय दबावों का परिणाम है। हालांकि पिछले 11 दिनों में सात रुपये से अधिक की वृद्धि हो चुकी है, विशेषज्ञ मानते हैं कि लागत और खुदरा मूल्य के बीच का अंतर अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। ऐसे में आने वाले समय में वैश्विक तेल बाजार और सरकारी नीतियां यह तय करेंगी कि ईंधन कीमतों की दिशा क्या होगी और आम उपभोक्ताओं पर इसका कितना असर पड़ेगा।