नई दिल्ली: केंद्र की योजनाओं के जमीनी स्तर पर क्रियान्वयन की समीक्षा को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से राज्यों के मंत्रियों के साथ सीधे संवाद की एक नई कवायद की चर्चा तेज हो गई है। राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में चर्चा है कि आगामी त्योहारी सीजन, खासकर दुर्गा पूजा और दिवाली के बाद नई दिल्ली में एक उच्चस्तरीय बैठक आयोजित की जा सकती है। संभावित बैठक में केंद्रीय योजनाओं के क्रियान्वयन, बजट के इस्तेमाल, परियोजनाओं की प्रगति और राज्यों के सामने आने वाली प्रशासनिक या तकनीकी अड़चनों की समीक्षा किए जाने की बात कही जा रही है। हालांकि, इस बैठक को लेकर अभी कोई आधिकारिक घोषणा सामने नहीं आई है। इसलिए यह स्पष्ट नहीं है कि बैठक वास्तव में कब होगी और इसमें किन राज्यों के मंत्री शामिल होंगे।
केंद्रीय मंत्रियों की समीक्षा बैठकों की तर्ज पर राज्यों पर फोकस
प्रधानमंत्री मोदी केंद्रीय मंत्रालयों और शीर्ष अधिकारियों के साथ नियमित रूप से विभिन्न योजनाओं और परियोजनाओं की प्रगति की समीक्षा करते रहे हैं। इसी तरह की समीक्षा व्यवस्था को राज्य स्तर पर लागू करने की संभावना को लेकर चर्चा है। अगर ऐसी बैठक होती है, तो इसमें केंद्र प्रायोजित योजनाओं की जमीनी प्रगति पर विशेष ध्यान दिया जा सकता है। प्रधानमंत्री आवास योजना, जल जीवन मिशन, सड़क और बुनियादी ढांचा परियोजनाओं जैसी योजनाओं में लाभार्थियों तक पहुंच, फंड के इस्तेमाल और परियोजनाओं की गति की समीक्षा अहम मुद्दे हो सकते हैं। इसके अलावा, राज्यों की ओर से केंद्र को भेजे जाने वाले Utilization Certificate (UC) और विभिन्न योजनाओं के लिए जारी राशि के उपयोग की स्थिति पर भी चर्चा हो सकती है।
किन राज्यों के मंत्री होंगे शामिल, सबसे बड़ा सवाल
इस संभावित बैठक को लेकर सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या इसमें केवल भाजपा या एनडीए शासित राज्यों के मंत्री शामिल होंगे या गैर-भाजपा शासित राज्यों को भी आमंत्रित किया जाएगा। खास तौर पर पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों को लेकर राजनीतिक और संवैधानिक सवाल उठ सकते हैं। यदि केंद्र सरकार किसी राज्य के मुख्यमंत्री की मौजूदगी के बिना सीधे उसके विभागीय मंत्रियों के साथ केंद्रीय योजनाओं की समीक्षा करती है, तो विपक्ष इसे संघीय ढांचे और राज्यों के अधिकारों से जोड़कर देख सकता है। हालांकि, ऐसी बैठक का वास्तविक प्रारूप क्या होगा, इस पर अभी अंतिम तस्वीर साफ नहीं है।
पश्चिम बंगाल को लेकर क्यों बढ़ सकती है राजनीतिक बहस?
पश्चिम बंगाल में केंद्र और राज्य सरकार के बीच केंद्रीय योजनाओं के क्रियान्वयन और फंडिंग को लेकर पहले भी कई मुद्दों पर टकराव देखने को मिला है। ऐसे में अगर प्रधानमंत्री सीधे राज्य के मंत्रियों के साथ किसी योजना की समीक्षा करते हैं, तो इसका राजनीतिक महत्व और बढ़ सकता है।वहीं, भाजपा का तर्क यह हो सकता है कि केंद्रीय योजनाओं के बेहतर क्रियान्वयन और लाभार्थियों तक उनका लाभ पहुंचाने के लिए केंद्र को राज्यों के साथ सीधे प्रशासनिक समन्वय की जरूरत है। इसलिए संभावित बैठक सिर्फ विकास योजनाओं की समीक्षा तक सीमित नहीं रह सकती, बल्कि इसके राजनीतिक और संघीय आयाम भी चर्चा का विषय बन सकते हैं।
नीति आयोग के मंच से अलग क्यों होगी ऐसी बैठक?
केंद्र और राज्यों के बीच समन्वय के लिए पहले से ही नीति आयोग की Governing Council एक प्रमुख मंच है। प्रधानमंत्री इसके अध्यक्ष होते हैं और राज्यों के मुख्यमंत्री इसमें हिस्सा लेते हैं। इस मंच पर राष्ट्रीय विकास से जुड़े व्यापक मुद्दों, राज्यों की प्राथमिकताओं और केंद्र-राज्य समन्वय पर चर्चा होती है। इसके अलावा नीति आयोग समय-समय पर राज्यों के मुख्य सचिवों और अन्य अधिकारियों के साथ भी बैठक करता है। ऐसे में प्रधानमंत्री की ओर से राज्यों के विभागीय मंत्रियों के साथ अलग से समीक्षा बैठक होती है तो उसका उद्देश्य अधिक व्यावहारिक और योजना-विशेष आधारित हो सकता है। खासकर भाजपा शासित राज्यों में सरकार की योजनाओं की गति और प्रशासनिक जवाबदेही पर सीधे राजनीतिक नेतृत्व से चर्चा इसका संभावित उद्देश्य हो सकता है।
अभी आधिकारिक पुष्टि का इंतजार
फिलहाल राज्यों के मंत्रियों के साथ प्रधानमंत्री की ऐसी बैठक की कोई आधिकारिक तारीख या प्रतिभागियों की सूची सार्वजनिक नहीं हुई है। इसलिए यह कहना जल्दबाजी होगी कि बैठक केवल भाजपा-एनडीए शासित राज्यों तक सीमित रहेगी या इसमें विपक्षी राज्यों को भी शामिल किया जाएगा। त्योहारी सीजन के बाद अगर बैठक का औपचारिक ऐलान होता है, तो कौन-कौन से मंत्री बुलाए जाते हैं और बैठक का एजेंडा क्या रहता है, इससे केंद्र-राज्य संबंधों और केंद्रीय योजनाओं के क्रियान्वयन की दिशा को लेकर महत्वपूर्ण संकेत मिल सकते हैं।