नई दिल्ली. केंद्र सरकार की ओर से पिछले सप्ताह सुप्रीम कोर्ट के समक्ष पेश किए गए आंकड़ों ने देश में कैद हाथियों की वास्तविक संख्या और उनके रिकॉर्ड को लेकर नई बहस छेड़ दी है। आंकड़ों के अनुसार, 2019 में हुई पिछली गणना के बाद देश में कैद हाथियों की संख्या में 50 की वृद्धि दर्ज की गई है। हालांकि निजी स्वामित्व वाले हाथियों, सर्कसों और मंदिरों में रखे जाने वाले हाथियों की संख्या में वर्षों बाद भी कोई बदलाव नहीं दिखाया गया है।
यही स्थिर आंकड़े अब सवालों के घेरे में हैं। पर्यावरण और वन्यजीव संरक्षण से जुड़े कार्यकर्ताओं का कहना है कि इतने लंबे समय के दौरान किसी भी हाथी की मृत्यु न होना या इन श्रेणियों में कोई नया हाथी शामिल न होना स्वाभाविक स्थिति नहीं लगती। ऐसे में वास्तविक संख्या से कम पंजीकरण या रिकॉर्ड के पूरी तरह अद्यतन न होने की आशंका जताई जा रही है।
मुख्य न्यायाधीश की पीठ ने मांगी डीएनए प्रोफाइलिंग रिपोर्ट
18 अगस्त को भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय तथा प्रोजेक्ट एलीफेंट के तहत गठित कैप्टिव एलीफेंट हेल्थकेयर एंड वेलफेयर कमेटी को विस्तृत स्थिति रिपोर्ट पेश करने का निर्देश दिया। अदालत ने विशेष रूप से सभी कैद हाथियों की डीएनए प्रोफाइलिंग की प्रगति की जानकारी मांगी है।
डीएनए प्रोफाइलिंग के माध्यम से प्रत्येक हाथी की अलग जैविक पहचान स्थापित की जा सकती है। इससे हाथियों की वास्तविक संख्या, पहचान और पंजीकरण से जुड़े रिकॉर्ड को अधिक विश्वसनीय बनाने में मदद मिल सकती है। साथ ही किसी हाथी के स्वामित्व, स्थानांतरण या रिकॉर्ड में संभावित अनियमितताओं की जांच के लिए भी एक अधिक ठोस आधार तैयार हो सकता है।
गज सूचना ऐप पर डिजिटल रिकॉर्ड अपलोड करने पर जोर
सुप्रीम कोर्ट ने कैद हाथियों से संबंधित जानकारी को गज सूचना ऐप पर अपलोड करने की स्थिति पर भी व्यापक रिपोर्ट मांगी है। अदालत का उद्देश्य केवल आंकड़े जुटाना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी है कि प्रत्येक पंजीकृत हाथी की पहचान और उससे संबंधित आवश्यक जानकारी व्यवस्थित डिजिटल रिकॉर्ड में उपलब्ध रहे।
डिजिटल रिकॉर्डिंग से हाथियों के स्थान, स्वामित्व और अन्य आवश्यक विवरणों की निगरानी अधिक प्रभावी ढंग से की जा सकती है। यदि पंजीकरण और वास्तविक स्थिति के बीच कोई अंतर हो, तो ऐसी प्रणाली उसे पहचानने में सहायक हो सकती है। अदालत के निर्देशों से संकेत मिलता है कि कैद हाथियों के मामले में केवल कागजी रिकॉर्ड के बजाय अधिक व्यवस्थित और सत्यापित व्यवस्था की आवश्यकता महसूस की जा रही है।
स्वामित्व प्रमाणपत्रों के नियमित नवीनीकरण की भी तैयारी
अदालत के आदेश में कैद हाथियों के स्वामित्व प्रमाणपत्रों के समय-समय पर नवीनीकरण के लिए एक प्रभावी व्यवस्था तैयार करने की आवश्यकता पर भी जोर दिया गया है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि वर्षों पुराने प्रमाणपत्र बिना किसी नई जांच या सत्यापन के अनिश्चितकाल तक मान्य न बने रहें।
नियमित नवीनीकरण की व्यवस्था से यह पता लगाने में मदद मिल सकती है कि हाथी वास्तव में उसी स्थान पर मौजूद है या नहीं, उसकी वर्तमान स्थिति क्या है और उसके रखरखाव से जुड़े नियमों का पालन किया जा रहा है या नहीं। इससे पंजीकरण प्रणाली को अधिक जवाबदेह बनाने के साथ-साथ हाथियों की देखभाल और कल्याण की निगरानी भी मजबूत हो सकती है।
स्वास्थ्य और रखरखाव पर सुप्रीम कोर्ट की गंभीर चिंता
कैद में रखे जाने वाले हाथियों के मामले में केवल उनकी संख्या और स्वामित्व ही महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि उनकी स्वास्थ्य सेवाएं, भोजन, रहने की परिस्थितियां और समग्र कल्याण भी बड़ा मुद्दा हैं। सुप्रीम कोर्ट की चिंता इसी व्यापक संदर्भ में देखी जा रही है। अदालत ने केंद्र सरकार और संबंधित समिति से स्थिति स्पष्ट करने को कहा है, ताकि यह पता लगाया जा सके कि कैद हाथियों के लिए उपलब्ध स्वास्थ्य और कल्याण व्यवस्था वास्तव में कितनी प्रभावी है।
हाथी लंबे समय तक जीवित रहने वाले और विशेष देखभाल की आवश्यकता रखने वाले वन्यजीव हैं। कैद में उनकी शारीरिक और मानसिक स्थिति, पर्याप्त स्थान, चिकित्सकीय सुविधा तथा प्राकृतिक व्यवहार के अनुकूल परिस्थितियां उनके कल्याण के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती हैं। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट की निगरानी से भविष्य में कैद हाथियों के प्रबंधन और स्वास्थ्य देखभाल के मानकों पर अधिक ध्यान केंद्रित हो सकता है।
आंकड़ों की विश्वसनीयता और वास्तविक स्थिति पर उठे सवाल
2019 के बाद कुल संख्या में केवल 50 की वृद्धि, जबकि निजी स्वामित्व, मंदिरों और सर्कस जैसी श्रेणियों में कोई बदलाव न दिखने से आंकड़ों की विश्वसनीयता पर सवाल उठे हैं। आलोचकों का तर्क है कि इतने वर्षों में मृत्यु, स्थानांतरण या नए पंजीकरण जैसी घटनाओं का होना स्वाभाविक है। इसलिए एक जैसे बने हुए आंकड़ों के पीछे रिकॉर्ड अद्यतन न होने या कम रिपोर्टिंग जैसी संभावनाओं की जांच जरूरी हो सकती है।
सुप्रीम कोर्ट द्वारा मांगी गई डीएनए प्रोफाइलिंग और डिजिटल डेटा की विस्तृत रिपोर्ट इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकती है। यदि प्रत्येक कैद हाथी की अलग पहचान और उसका अद्यतन रिकॉर्ड तैयार होता है, तो भविष्य में संख्या संबंधी विसंगतियों को कम करने और उनके स्वास्थ्य व कल्याण की बेहतर निगरानी में मदद मिल सकती है।