नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने कर्मचारियों की अनुपस्थिति और बकाया वेतन से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में बड़ा फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि कोई कर्मचारी बिना पूर्व सूचना या अनुमति के लंबे समय तक काम से गैरहाजिर रहता है और अपने दावों के समर्थन में पर्याप्त सबूत पेश नहीं कर पाता, तो उसे बकाया वेतन या नौकरी में बहाली जैसी राहत नहीं दी जा सकती।
क्या था पूरा मामला?
मामला एक निजी इंजीनियरिंग कंपनी में कार्यरत कर्मचारी अर्जुन गुप्ता से जुड़ा था। कर्मचारी का दावा था कि वह पारिवारिक कारणों से कुछ समय के लिए अनुपस्थित रहा था और बाद में काम पर लौटने की कोशिश की, लेकिन कंपनी ने उसे कार्यभार संभालने नहीं दिया। दूसरी ओर कंपनी का कहना था कि कर्मचारी बिना किसी सूचना के ड्यूटी से गायब हो गया था और उसे स्पष्टीकरण देने के लिए नोटिस भी भेजा गया था।
लेबर कोर्ट और हाईकोर्ट ने दिया था कर्मचारी के पक्ष में फैसला
विवाद पहले श्रम न्यायालय पहुंचा, जहां कर्मचारी के पक्ष में निर्णय दिया गया। बाद में पुनर्विचार के दौरान भी लेबर कोर्ट ने कर्मचारी को राहत देते हुए नौकरी में बहाली और आंशिक बकाया वेतन देने का आदेश दिया। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भी इस फैसले को बरकरार रखा था।
सुप्रीम कोर्ट ने क्यों पलटा फैसला?
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने मामले की सुनवाई के दौरान पाया कि कर्मचारी अपने दावों को साबित करने के लिए कोई ठोस दस्तावेजी प्रमाण पेश नहीं कर सका। अदालत ने कहा कि अनुपस्थिति की अवधि के दौरान न तो कोई लिखित सूचना दी गई और न ही छुट्टी लेने का कोई रिकॉर्ड उपलब्ध कराया गया।
पते पर भेजे गए नोटिस को लेकर भी कोर्ट की टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि नियोक्ता केवल उसी पते पर संपर्क कर सकता है जो कर्मचारी ने आधिकारिक रिकॉर्ड में दर्ज कराया हो। यदि कर्मचारी ने अपना पता बदल लिया है तो इसकी जानकारी देना उसकी जिम्मेदारी है। ऐसे में कंपनी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
कर्मचारियों और कंपनियों के लिए महत्वपूर्ण संदेश
अदालत के इस फैसले को श्रम कानूनों के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इससे स्पष्ट संकेत मिलता है कि कार्यस्थल पर अनुशासन, समय पर सूचना और दस्तावेजी प्रमाण बेहद जरूरी हैं। केवल मौखिक दावों के आधार पर वेतन, बहाली या अन्य लाभों की मांग स्वीकार नहीं की जा सकती।
सुप्रीम कोर्ट ने कंपनी की अपील स्वीकार करते हुए लेबर कोर्ट और हाईकोर्ट के पूर्व आदेशों को रद्द कर दिया। इस फैसले के साथ अदालत ने स्पष्ट कर दिया कि बिना अनुमति अनुपस्थित रहने वाले कर्मचारी को कानूनी राहत पाने के लिए अपने दावों के समर्थन में पर्याप्त सबूत प्रस्तुत करने होंगे।