Jaipur: राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मू ने जैसलमेर में शनिवार (Rajasthan News) को एक प्रोग्राम में राजस्थान राजीविका की ब्रांड ऐंबैस्डर डॉ. रूमादेवी की तारीफ की। उन्होंने कहा कि ग्रामीण परिवेश कि इस महिला ने आगे आकर अपने आपको स्वावलंबी बनाया और अन्य महिलाओं को भी आगे बढ़ने में मदद की। वहां बैठे लोगों से राष्ट्रपति ने रूमादेवी के लिए ताली भी बजवाई।
राष्ट्रपति ने किया स्वयं सहायता समूह की स्टॉल का निरिक्षण
स्वयं सहायता समूह की स्टॉल का राष्ट्रपति ने निरीक्षण किया और बताया कि उनको बड़ी खुशी है कि राजीविका से महिलाएं स्वावलंबन की ओर आगे बढ़ रही है। उन सभी से मिलकर काफी खुशी हुई और प्रभावित भी। उन्होंने बताया कि अब महिला अबला नहीं सबला बन रही है, यह बड़ी खुशी की बात है।
दरअसल, शनिवार को राजस्थान सरकार के ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज विभाग एवं राजस्थान ग्रामीण आजीविका विकास परिषद ( राजीविका) के तहत लखपति दीदी सम्मेलन प्रोग्राम का आयोजन पूनम स्टेडियम में किया गया। इस दौरान राष्ट्रपति ने स्वंय सहायता समूह की स्टॉल का राष्ट्रपति ने निरीक्षण किया। वहीं स्वावलंबी महिलाओं का हौसला अफजाई की।
क्या बोली राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मू
राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मू ने लखपति दीदी सम्मेलन में अपने संबोधन (Rajasthan News) में कहा कि रूमादेवी का मैं उल्लेख करना चाहूंगी कि जो एक ग्रामीण परिवार से आती है और राजीविका की ब्रांड ऐंबैस्डर बन चुकी है। उनके लिए एक बड़ा ताली तो हो जाए। उन्होंने सेल्फ ऑफ ग्रुप के माध्यम से हजारों महिलाओं को आगे बढ़ने और स्वावलंबी बनने में मदद की है। अपनी प्रतिभा के बल पर देश का नाम दुनिया में रोशन कर रही है।
4 साल की उम्र में मां चल बसी, 17 साल में शादी
बाड़मेर जिले की रहने वाली रूमादेवी, नाम जितना छोटा काम उतना ही बड़ा, जिसके सामने हर बड़ी उपलब्धि छोटी पड़ जाए। 4 साल की थीं तब मां चल बसीं, पिता ने दूसरी शादी कर ली और चाचा के पास रहने के लिए छोड़ दिया। गरीबी की गोद में पल रही रूमा को हंसने-खेलने की उम्र में खिलौनों की जगह बड़े-बड़े मटके मिले, जिन्हें सिर पर रखकर वो दूर से पानी भरकर लाती थीं। 8वीं में पढ़ाई छूट गई और 17 साल की उम्र में शादी।
पहली संतान चढ़ी बीमारी की भेंट
पहली संतान हुई वो भी बीमारी की भेंट चढ़ गई। रूमा के सामने मुश्किलों का पहाड़ था, सब कुछ बिखर गया था लेकिन उन्होंने हौसले को नहीं टूटने दिया। खुद के दम पर गरीबी से लड़ने की ठान ली और घर से ही हैंडीक्राफ्ट का काम शुरू किया। आज वे अपने आप में एक फैशन ब्रांड हैं। देश-विदेश में ख्याति है और 22 हजार महिलाओं की जिंदगी संवार रही हैं।
पहले खुद को संभाला फिर आगे बढ़ी
32 साल की रूमा देवी कहती हैं कि शादी के बाद भी मुसीबतें कम नहीं हो रही थीं। बच्चे को आर्थिक तंगी के चलते हम बीमारी से नहीं बचा सके थे। तब मुझे बड़ा धक्का लगा था। अंदर से पूरी तरह टूट चुकी थी, जिंदगी से तंग आ गई थी। जी करता था कि आत्महत्या कर लूं। ऐसी जिंदगी का क्या मतलब जब हम अपनी जरूरतें ही नहीं पूरी कर सकें।
सिलाई मशीन खरीदने के लिए नहीं थे पैसे
रूमा ने खुद को संभाला। तय किया कि मुश्किलों के सामने हार (Rajasthan News) मानने की बजाय उससे लड़ना है। उन्होंने दादी से सिलाई-बुनाई और कशीदाकारी का काम सीखा था। इसी काम को आगे बढ़ाने का प्लान किया। वे सुई धागे से कुशन और कढ़ाई वाले बैग तैयार कर उन लड़कियों को देने लगीं जो पहली बार ससुराल जाती थीं। धीरे-धीरे रूमा का काम बढ़ने लगा, लेकिन दिक्कत ये थी कि उनके पास न तो पैसे थे न पर्याप्त संसाधन। सिलाई मशीन खरीदने के लिए भी उनके पास पैसे नहीं थे।
100-100 रुपए जुटाकर सिलाई मशीन खरीदी
इसके बाद रूमा ने 2006 में 10 महिलाओं के साथ मिलकर एक स्वयं सहायता समूह बनाया। सभी महिलाओं ने 100-100 रुपए लगाकर एक हजार रुपए में सिलाई मशीन खरीदी। संसाधन की थोड़ी बहुत व्यवस्था तो हो गई, लेकिन दिक्कत ये कि 10 महिलाओं के लिए काम कहां मिलेगा? वे जो हैंडीक्राफ्ट तैयार करेंगी, उन्हें कौन खरीदेगा, मार्केट कहां मिलेगा? इस बीच बाड़मेर में ग्रामीण विकास चेतना संस्थान से जुडी और फिर हैंडीक्राफ्ट तैयार करने के साथ-साथ महिलाओं को जोड़ती गई। डॉ. रूमादेवी 11 विदेशों की यात्रा कर चुकी है। वहां पर भारत का गौरव बढ़ाया।
10 महिलाओं से सफर शुरू हुआ, आज 22 हजार महिलाएं जुड़ी हैं
इसके बाद रूमा देवी का कारवां बढ़ता गया। वे एक के बाद एक शहरों में (Rajasthan News) प्रदर्शनी लगाती गईं। कई फैशन शो में भी उन्होंने भाग लिया। 2011 में दिल्ली फिर से गईं। इस बार जबरदस्त मार्केटिंग हुई और करीब 11 लाख रुपए की सेल उन्होंने की। इसके बाद रूमा ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। भारत के बाहर भी कई देशों में वे गईं। उन्होंने अमेरिका, मलेशिया, जर्मनी, सिंगापुर, श्रीलंका सहित दर्जनभर देशों में अपनी प्रदर्शनी लगाई और लोगों की वाहवाही बटोरी।