Jaipur: राजस्थान में एक बार फिर आरक्षण आंदोलन (Jat Reservation) शुरू हो गया है। भरतपुर-धौलपुर जिलों के जाटों ने केंद्र में ओबीसी कोटे के तहत आरक्षण मांगते हुए पटरियां उखाड़ने, ट्रेनें रोकने और हाईवे जाम करने की चेतावनी दे डाली है। यह मुद्दा आज का नहीं, 24 साल से चलता आ रहा है।
केंद्र में नहीं मिला आरक्षण
भरतपुर-धौलपुर के जाटों को राजस्थान में तो ओबीसी आरक्षण मिला हुआ है, लेकिन केंद्र में नहीं है। राज्य सरकार केंद्र को सिफारिश भेज चुकी है, लेकिन लंबे अदालती मुकदमों और कानूनी प्रक्रियाओं में उलझने की वजह से दो जिलों में रहने वाले जाटों का आरक्षण केंद्र में अटका हुआ है। इन दो जिलों को छोड़ दें तो बाकी जिलों में रहने वाले जाटों को साल 2000 में ही केंद्र की नौकरियों में ओबीसी आरक्षण मिल गया था। आखिर कौनसी वो अड़चन है, जिससे केवल 2 जिलों के जाटों का आरक्षण केंद्र में अटकता आ रहा है? पढ़िए- पूरी रिपोर्ट
1999 में मिल गया था आरक्षण
राजस्थान में जाटों को केंद्र की नौकरियों में ओबीसी आरक्षण (Jat Reservation) की शुरुआत तत्कालीन अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने की थी। तब भरतपुर-धौलपुर को छोड़कर बाकी जिलों के जाटों को साल 1999 में केंद्र और राज्य दोनों जगह आरक्षण मिल गया था।व इन दो जिलों के जाटों को उस वक्त इस आधार पर ओबीसी आरक्षण नहीं दिया गया था, क्योंकि यहां के राजा जाट थे। भरतपुर-धौलपुर के जाटों को संपन्न माना गया था। तब केंद्र ने आरक्षण कोटे से इन दोनों जिलों के जाटों को अलग कर दिया था।
गहलोत सरकार ने भरतपुर-धौलपुर के जाटों को छोड़कर...
राजस्थान में भरतपुर-धौलपुर को छोड़कर बाकी जिलों के जाटों को पहले केंद्र में आरक्षण मिला था। इस पहल का बीजेपी को लोकसभा चुनावों में सियासी फायदा भी मिला था। राजस्थान के जाटों को केंद्रीय सूची में ओबीसी आरक्षण देने की घोषणा के बाद राजस्थान में कांग्रेस की गहलोत सरकार पर दबाव बढ़ा था। तब बीजेपी ने राज्य सरकार की देरी को मुद्दा बनाया था। लेकिन कुछ ही दिन बाद गहलोत सरकार ने भी फैसला लिया और केंद्र की तर्ज पर भरतपुर-धौलपुर को छोड़कर जाटों के लिए ओबीसी आरक्षण लागू कर दिया था। लेकिन लोकसभा चुनाव के वक्त दो जिलों के जाटों को ओबीसी से बाहर रखने का ये मुद्दा बड़ा बन गया।
साल 2000 में गहलोत सरकार ने दिया आरक्षण
साल 2000 में अशोक गहलोत की अगुवाई वाली कांग्रेस सरकार ने भरतपुर-धौलपुर जिलों के जाटों को आरक्षण लागू कर दिया। लेकिन इसमें तकनीकी खामियां रह गई थीं, जिसकी वजह से 10 अगस्त 2015 को कोर्ट ने रोक लगा दी थी। वैधानिक प्रक्रिया नहीं अपनाए जाने का तर्क देकर कोर्ट ने भरतपुर-धौलपुर के जाटों का ओबीसी आरक्षण खत्म कर दिया था। उस वक्त दोनों जिलों के जाटों की सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक पिछड़ेपन साबित करने वाली रिपोर्ट नहीं थी, ओबीसी आयोग का भी कानून पेच था, जिसकी वजह से रोक लग गई थी।
2015 में सुप्रीम कोर्ट ने लगाई रोक
मनमोहन सरकार ने लोकसभा चुनाव की आचार संहिता लगने से पहले 4 मार्च 2014 को चुनावों से पहले आठ राज्यों के जाटों को केंद्र में आरक्षण देने का फैसला किया था। इसमें भरतपुर-धौलपुर के जाटों को भी शामिल किया गया था। लेकिन साल 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने इस पर रोक लगा दी थी। सुप्रीम कोर्ट की रोक के बाद धौलपुर-भरतपुर के जाटों को केंद्रीय सूची में आरक्षण अब भी अटका हुआ है।
2016 में वसुंधरा सरकार ने करवाया सर्वे
दोनों जिलों के जाटों को ओबीसी आरक्षण पर 2015 में कोर्ट (Jat Reservationकी रोक के बाद 2016 में तत्कालीन वसुंधरा सरकार ने फिर प्रक्रिया शुरू की थी। ओबीसी आयोग ने भरतपुर-धौलपुर के जाट परिवारों का सर्वे करवाया था। सर्वे के आधार पर तैयार रिपोर्ट में दोनों जिलों के जाटों को सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक रूप से पिछड़ा मानते हुए आरक्षण की सिफारिश की थी। यह सर्वे नहीं होने के चलते ही पहले कानूनी रोक लगी थी, जिससे धौलपुर-भरतपुर के जाटों का पिछड़ापन साबित नहीं हो रहा था।
2017 में मिला ओबीसी आरक्षण
वसुंधरा राजे के नेतृत्व वाली बीजेपी सरकार ने 23 अगस्त 2017 को भरतपुर और धौलपुर के जाटों को राज्य में ओबीसी आरक्षण देने की अधिसूचना जारी की थी। राज्य की ओबीसी लिस्ट में 54 वें नंबर पर भरतपुर-धौलपुर के जाटों को शामिल किया गया था। इससे पहले राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग ने 2017 में अपनी रिपोर्ट में भरतपुर-धौलपुर के जाटों को पिछड़ा मानते हुए ओबीसी में आरक्षण की सिफारिश की थी। आयोग की सिफारिश के आधार पर राज्य सरकार ने ओबीसी आरक्षण दिया था।
2020 में क्या हुआ?
गहलोत सरकार ने दिसंबर 2020 में राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग (एनबीसीसी) से भरतपुर-धौलपुर के जाटों को केंद्र में आरक्षण देने की सिफारिशी चिट्ठी भेजी। राज्य ओबीसी आयोग की रिपोर्ट के साथ भेजी गई सिफारिशी चिट्ठी में तर्क दिया था कि राजस्थान में सभी जिलों के जाट ओबीसी में शामिल है।
क्यों नहीं मिल रहा लाभ
2017 में भरतपुर-धौलपुर के जाट भी ओबीसी में शामिल हैं, राज्य सरकार ओबीसी आरक्षण देने में भौगोलिक आधार पर कोई फर्क नहीं करती है, इसलिए इन्हें केंद्र में भी आरक्षण दिया जाए। अभी इन दो जिलों के जाटों को केंद्रीय सेवाओं और शैक्षणिक संस्थानों में ओबीसी आरक्षण का लाभ नहीं मिल रहा है।
क्या बोले जाट महासभा के अध्यक्ष
जाट महासभा के अध्यक्ष राजाराम मील ने दैनिक भास्कर से बातचीत में कहा- भरतपुर-धौलपुर के जाट भी केंद्र में आरक्षण के हकदार हैं, उन्हें इससे वंचित रखने का कोई कारण नहीं बनता। राज्य सरकार अपनी सिफारिश भेज चुकी है, सारी रिपोर्ट इनके पक्ष में हैं, ऐसे में केंद्र सरकार को चाहिए कि वह वाजिब मांग मानकर उनका हक दे। केंद्र सरकार को तत्काल इस पर ध्यान देना चाहिए।
राजस्थान में जो पात्र है वह केंद्र में अपात्र कैसे हुआ?
आरक्षण आंदोलन से जुड़े नेम सिंह फौजदार ने कहा- धौलपुर और भरतपुर के जाटों के साथ लंबे समय से अन्याय हो रहा है। जो राज्य में आरक्षण का पात्र है, वह केंद्र में अपात्र कैसे हो गया? आप राजस्थान में पिछड़े हैं तो कहीं भी जाइए आपका स्टेटस बदल जाएगा क्या? यह क्या मजाक बना कर रखा हुआ है प्रावधानों का। हमने बहुत इंतजार किया, ज्ञापन दिए, लेकिन सड़क पर आए बिना सरकार ध्यान ही नहीं देती। हम केंद्रीय सूची में ओबीसी आरक्षण मिलने तक आंदोलन जारी रखेंगे, किसी की अनदेखी की हद
कैसे मिलता हैं केंद्र में ओबीसी आरक्षण?
राज्य सरकार राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग को राज्य ओबीसी आयोग की रिपोर्ट के साथ उस जाति को ओबीसी की केंद्रीय सूची में शामिल करने के लिए सिफारिश भेजती है। उस सिफारिश पर राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग विचार करता है। आयोग सुनवाई करता है और राज्य ओबीसी आयोग की रिपोर्ट का खुद के स्तर पर भी सत्यापन करता है, उसके बाद केंद्र सरकार को सिफारिश भेजी जाती है। राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग की मंजूरी के बाद केंद्र सरकार का सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय उस जाति को केंद्रीय ओबीसी की सूची में शामिल करता है। केंद्रीय ओबीसी में शामिल जातियों को केंद्र की नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में ओबीसी का आरक्षण मिलता है।