Jaipur: प्रदेश के सबसे बड़े हॉस्पिटल सवाई मानसिंह (SMS Hospital) में डॉक्टर-नर्सिंग स्टाफ की लापरवाही का एक बड़ा मामला सामने आया हैं। जिससे एक युवक की जान चले गई। दरअसल एक्सीडेंट में घायल बांदीकुई (दौसा) निवासी सचिन को ट्रॉमा सेंटर में भर्ती करवाया गया था। यहां उसे ‘ओ’ पॉजिटिव की जगह ‘एबी’ पॉजिटिव ब्लड और प्लाज्मा चढ़ा दिया गया। ऐसा एक नहीं चार बार हुआ। नतीजा ये हुआ कि 10 दिन तक ICU में जिंदगी की जंग लड़ते-लड़ते सचिन ने शुक्रवार की सुबह दम तोड़ दिया। मौत से परिजन इस कदर टूट गए हैं कि अपना दर्द भी बयां नहीं कर पा रहे। इस मामले में चिकित्सा मंत्री ने एक डॉक्टर, दो रेजिडेंट को एपीओ और एक नर्सिंग स्टाफ को सस्पेंड किया है। जांच कमेटी ने रिपोर्ट में भी ये माना है कि सचिन का ब्लड ग्रुप ‘ओ’ पॉजिटिव था।
अज्ञात बाइक की टक्कर से सचिन के पैर में लगी थी गहरी चोट
दौसा के रायपुरिया का बास का रहने वाला सचिन कोटपूतली में एचपीसीएल के पेट्रोल पंप पर अपने पिता की जगह अनुकंपा पर नौकरी कर रहा था। पिता की किडनी खराब होने की वजह से उनकी जगह सचिन को काम पर रखा गया था। 12 फरवरी की शाम ड्यूटी के बाद पैदल लौटते समय अज्ञात बाइक की टक्कर से सचिन का पैर बुरी तरह जख्मी हो गया। साथी उसे कोटपूतली के एक निजी अस्पताल लेकर गए जहां से 13 फरवरी की सुबह 4 बजे के करीब उसे जयपुर के एसएमएस हॉस्पिटल में रेफर कर दिया गया।
वॉर्ड बॉय ने मंगवाया AB+ ब्लड
उस वक्त सचिन के साथ आए प्रेम नाम के युवक (SMS Hospital) ने बताया कि ट्रॉमा सेंटर में जख्मों की पट्टी करने के बाद सचिन को दूसरी मंजिल पर सर्जिकल वार्ड में शिफ्ट कर दिया गया। करीब आधा घंटा मेडिकल स्टाफ का इंतजार करने के बाद उन्होंने खुद जाकर आगे के ट्रीटमेंट के लिए वहां मौजूद स्टाफ को कहा। तब एक वार्ड बॉय ने ब्लड सैंपल थमाते हुए उसे जमा करवाने और ब्लड बैंक से ‘एबी’ पॉजिटिव ग्रुप का ब्लड बैग लाने को कहा। वार्ड बॉय ने जो वॉइल पकड़ाई (ब्लड का सैंपल दिया) उस पर मरीज नाम, रजिस्ट्रेशन नंबर और ब्लड ग्रुप कौन सा है, जैसी डिटेल लिखी हुई थी।
4 बार चढ़ाया AB+ ब्लड
इस दौरान सचिन के बड़े भाई नटराज (चचेरे) भी वहां पहुंच गए। ट्रॉमा सेंटर का खुद का अलग से ब्लड बैंक है, उन्होंने वहीं से ब्लड सैंपल के आधार पर जारी हुआ प्लाज्मा और एबी पॉजिटिव ग्रुप का ब्लड बैग लाकर स्टाफ को दे दिया। सर्जिकल वॉर्ड में सचिन का ऑपरेशन हुआ। उसे प्लाज्मा और ब्लड चढ़ाने के एक दिन बाद जगह की कमी बताकर एसएमएस के जनरल वार्ड में शिफ्ट कर दिया गया। जहां 16 फरवरी से उसके पेट व कमर में दर्द शुरू हो गया। पीलिया की शिकायत के बाद उसकी तबीयत लगातार बिगड़ने लगी। इस दौरान तक सचिन को ‘एबी’ पॉजिटिव ग्रुप का ब्लड 4 बार चढ़ाया जा चुका था।
18 फरवरी को बिगड़ी तबीयत
सचिन के भाई सुनील शर्मा ने बताया कि जब 18 फरवरी की रात करीब डेढ़ बजे उसकी तबीयत ज्यादा बिगड़ी तो उन्होंने रेजिडेंट डॉक्टर को कॉल किया। उस डॉक्टर ने यह कहकर फोन काट दिया कि यह कोई वक्त नहीं है फोन करने का, मैं फिलहाल नहीं आ सकता। डॉक्टर खुद आने की बजाय नर्सिंग स्टाफ को भेजता रहा। इसके अगले दिन से सचिन की तबीयत लगातार बिगड़ती चली गई। सुनील ने बताया कि शुरुआती जांच में डॉक्टर्स को गलत खून चढ़ाने के कारण किडनी डैमेज का अंदेशा हो गया था, लेकिन उन्होंने सीनियर डॉक्टर्स और हमसे इस बात को छुपाए रखा। हमें यह समझ नहीं आ रहा था कि एक एक्सीडेंट से किडनी कैसे डैमेज हो सकती है।
ऐसे हुआ गलत ब्लड चढ़ाने का खुलासा
सचिन को 4 यूनिट तक ‘एबी’ पॉजिटिव ब्लड (1 यूनिट पैक्ड रेड ब्लड सेल, 1 यूनिट फ्रेश फ्रोजेन प्लाज्मा और दो यूनिट ब्लड) चढ़ चुका था। गलत ब्लड ग्रुप चढ़ाने का खुलासा तब हुआ जब घाव की दोबारा प्लास्टिक सर्जरी और हड्डी के ऑपरेशन के दौरान ब्लड चढ़ाने की जरूरत पड़ी। एसएमएस अस्पताल के ब्लड बैंक में सचिन के सैंपल की क्रॉस मैचिंग हुई तो उसका ब्लड ग्रुप ‘ओ’ पॉजिटिव आया। जब परिजनों ने कहा कि ट्रॉमा सेंटर पर तो सचिन को ‘एबी’ ग्रुप चढ़ाया गया था तो SMS के ब्लड बैंक के स्टाफ ने बताया कि सैंपल में यही मैच हुआ है। इसके बाद परिजनों ने हंगामा कर दिया। मामला बढ़ता देख सचिन को एमआईसीयू में वेंटिलेटर पर शिफ्ट कर दिया। तब से गुरुवार की शाम आठ बजे तक सचिन की किडनी का चार डायलिसिस हो चुकी थी और मेडिकल बोर्ड की निगरानी में उसका इलाज किया गया।
हर स्तर पर बरती गई लापरवाही
सचिन के मामले में एसएमएस मेडिकल स्टाफ ने हर स्तर पर लापरवाही बरती। यह सिलसिला सचिन के 13 फरवरी को ट्रॉमा सेंटर में आते ही शुरू हो गया था। ब्लड सैंपल लेने का अधिकार सिर्फ मेडिकल स्टाफ और नर्सिंग स्टाफ को है। लेकिन सचिन का ब्लड सैंपल वॉर्ड बॉय ने लिया। ट्रॉमा सेंटर में सचिन के ब्लड ग्रुप की ठीक से मैचिंग नहीं की गई। अगर ब्लड सैंपल की क्रॉस मैचिंग सही से की जाती तो यह नौबत ही नहीं आती। गलती होने के बाद भी स्टाफ लीपापोती में लगा रहा। समय रहते उसे सुधारा नहीं गया। न ही सीनियर डॉक्टर से कंसल्ट किया गया।
क्या है ब्लड बैंक से ब्लड जारी करने की प्रक्रिया, जिसे फॉलो नहीं किया गया
सबसे पहले मरीज जिस वार्ड में भर्ती है वहां से ब्लड का सैंपल, रजिस्ट्रेशन नंबर, नाम और रेफर करने वाले डॉक्टर का नाम जैसी सभी जरूरी बातें लिखकर पर्चा आता है। भले ही सैंपल या पर्चे पर ब्लड ग्रुप कोई भी लिखा हो ब्लड बैंक ग्रुप की जांच खुद करके क्रॉस चेक करता है।
फिर जो ब्लड के बदले जो यूनिट सौंपी जाती है, उसका भी ब्लड ग्रुप से एक बार फिर से मिलान करते हैं, ताकि पता किया जा सके कि यह मरीज के लिए सूटेबल है। ब्लड ग्रुप के क्रॉस मैच को कुम्स टेस्ट कहा जाता है। अगर डायरेक्ट कुम्स टेस्ट और इनडायरेक्ट कुम्स टेस्ट पॉजिटिव आता है तो ब्लड इश्यू नहीं किया जाता। क्योंकि इसका मतलब है कि कोई न कोई गड़बड़ है।
इन लापरवाहियों के चलते जान बचाने वाले खून ने ली सचिन की जान
एक्सीडेंट केस में आमतौर पर मैनुअली ब्लड ग्रुप मैचिंग (SMS Hospital) की जाती है, जिसका रिजल्ट आने में 3 से 5 मिनट लग जाते हैं। लेकिन नर्सिंग स्टाफ ब्लड ग्रुप जांचते समय अक्सर सैंपल का शुरुआती रिजल्ट देखकर ही लिखकर देते हैं। ट्रॉमा सेंटर में सचिन के ब्लड की मैनुअली क्रॉस मैचिंग में ग्रुप क्लियर ही नहीं हुआ था। इस बात का खुलासा इससे होता है कि जब ऑटोमेशन से ब्लड की क्रॉस मैचिंग करवाई गई तो सही ब्लड ग्रुप ‘ओ’ पॉजिटिव होने का पता चला। ब्लड बैंक से जारी होने वाले हर ब्लड बैग की मॉनिटरिंग की जिम्मेदारी वहां के मेडिकल ऑफिसर की होती है। सैंपल पर उनके साइन भी होते हैं। लेकिन सचिन के मामले में ऐसा नहीं हुआ। जारी किए गए ब्लड बैग पर किसी भी डॉक्टर के साइन नहीं थे।
ये है नियम
ब्लड बैंक प्रभारी की यह ड्यूटी है कि वह अगले दिन रजिस्टर में दर्ज हर बैग की जानकारी की बारीकी से जांच करें, सचिन के केस में यह भी नहीं हुआ। वर्ना पहले दिन ही चूक सामने आ सकती थी। नियमानुसार नर्सिंग स्टाफ या वॉर्ड बॉय ही ब्लड बैंक से जारी ब्लड बैग जांचकर लाने के लिए अधिकृत है। लेकिन सचिन के मामले में उसके भाई नटराज को बैग लाने के लिए भेजा गया।