हिंदू पंचांग के अनुसार इस वर्ष नृसिंह जयंती 30 अप्रैल, गुरुवार को मनाई जाएगी। चतुर्दशी तिथि 29 अप्रैल की शाम से आरंभ होकर 30 अप्रैल की रात्रि तक रहेगी, लेकिन उदयातिथि के अनुसार 30 अप्रैल को ही इस पर्व का विशेष महत्व माना गया है। यह दिन भगवान भगवान नृसिंह की आराधना के लिए अत्यंत पवित्र और फलदायी होता है।
गुरुवार और रवि योग से बढ़ा पर्व का महत्व
इस वर्ष नृसिंह जयंती पर दो अत्यंत शुभ संयोग बन रहे हैं, जो इसे और भी खास बना रहे हैं। पहला गुरुवार का संयोग है, जो भगवान विष्णु की पूजा के लिए समर्पित दिन माना जाता है। दूसरा रवि योग का निर्माण, जिसे ज्योतिष शास्त्र में सभी दोषों को नष्ट करने वाला और सफलता प्रदान करने वाला योग बताया गया है। इन दोनों संयोगों के कारण इस दिन की गई साधना का प्रभाव कई गुना बढ़ जाता है।
नृसिंह जयंती का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान नृसिंह ने अपने परम भक्त प्रह्लाद की रक्षा के लिए अत्याचारी हिरण्यकशिपु का वध किया था। यह घटना धर्म की अधर्म पर विजय का प्रतीक मानी जाती है। इस दिन उनकी पूजा करने से भय, शत्रु बाधा और नकारात्मक शक्तियों का नाश होता है। साथ ही भक्तों को साहस, आत्मबल और दिव्य संरक्षण की प्राप्ति होती है।
पूजा विधि और आवश्यक नियम
इस पावन दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करना और जल में गंगाजल मिलाकर शुद्धि करना शुभ माना जाता है। इसके बाद भगवान नृसिंह की मूर्ति या चित्र का पंचामृत से अभिषेक करना चाहिए। पूजा के दौरान पीले या केसरिया वस्त्र धारण करना और मंत्र जाप करना विशेष फलदायी होता है। श्रद्धा और नियमपूर्वक की गई पूजा से भगवान शीघ्र प्रसन्न होते हैं।
दान-पुण्य का विशेष महत्व
नृसिंह जयंती के दिन दान-पुण्य करने से जीवन के कष्ट दूर होते हैं। तिल, गुड़ और सत्तू का दान विशेष रूप से शुभ माना गया है। इस दिन जरूरतमंदों की सहायता करने से पुण्य फल की प्राप्ति होती है और जीवन में सुख-समृद्धि का मार्ग प्रशस्त होता है।
क्या करें और क्या न करें
इस दिन सात्विक भोजन ग्रहण करना चाहिए और मन को शांत रखते हुए भक्ति में लीन रहना चाहिए। क्रोध, विवाद और नकारात्मक विचारों से दूर रहना अत्यंत आवश्यक है। पूजा के समय शुद्धता और नियमों का पालन करना चाहिए, जिससे पूजा का पूर्ण लाभ प्राप्त हो सके।