कोलकाता। पश्चिम बंगाल में कथित शराब घोटाले को लेकर विवाद लगातार गहराता जा रहा है। अब राज्य के शराब कारोबारियों ने भी खुलकर सामने आकर गंभीर आरोप लगाए हैं। विदेशी शराब विक्रेताओं के एक बड़े संगठन ने दावा किया है कि राज्य में वर्ष 2021 से लागू की गई नई वितरण व्यवस्था के बाद लाइसेंसधारी शराब दुकानों से अवैध रूप से परिवहन, लोडिंग और अनलोडिंग शुल्क वसूला जा रहा है। संगठन का कहना है कि इस व्यवस्था से खुदरा कारोबारियों को करोड़ों रुपये का आर्थिक नुकसान हुआ है और पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराई जानी चाहिए। यह विवाद उस रिपोर्ट के बाद और तेज हो गया है जिसमें आरोप लगाया गया था कि पश्चिम बंगाल की शराब नीति में किए गए बदलावों से कुछ प्रभावशाली लोगों को लाभ पहुंचाया गया। रिपोर्ट में तृणमूल कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी का नाम भी कथित तौर पर जोड़ा गया था। हालांकि इन आरोपों को लेकर राजनीतिक बहस जारी है, लेकिन अब शराब कारोबारियों के संगठन द्वारा लगाए गए आरोपों ने इस मामले को नया मोड़ दे दिया है।
2017 में बदली गई थी शराब वितरण नीति
जानकारी के मुताबिक वर्ष 2017 में पश्चिम बंगाल सरकार ने शराब वितरण प्रणाली में बड़ा बदलाव किया था। इसके तहत वेस्ट बंगाल स्टेट बेवरेजेज कॉरपोरेशन लिमिटेड (WBSBCL) यानी बेवको को शराब वितरण व्यवस्था में प्रमुख भूमिका दी गई। इसका उद्देश्य राज्य के भीतर शराब वितरण को नियंत्रित करना बताया गया था। इसके बाद वर्ष 2021 में वितरण प्रणाली में एक और बड़ा बदलाव करते हुए डिस्ट्रीब्यूटर मॉडल लागू किया गया। इसी व्यवस्था को लेकर अब सवाल उठ रहे हैं। आरोप है कि नई व्यवस्था लागू होने के बाद शराब दुकानों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ डाला गया और कई तरह के शुल्क वसूले जाने लगे।
रिटेलर्स पर डाला गया अतिरिक्त शुल्क का बोझ
'सोसाइटी फॉर द वेलफेयर ऑफ वेस्ट बंगाल फॉरेन लिकर लाइसेंस' नामक संगठन ने आबकारी आयुक्त को लिखे पत्र में आरोप लगाया है कि डिस्ट्रीब्यूटर्स ने अपनी प्रभावशाली स्थिति का इस्तेमाल करते हुए खुदरा विक्रेताओं से प्रति क्रेट 10 से 13 रुपये तक अतिरिक्त परिवहन शुल्क वसूला। संगठन के सचिव बिजोन कुमार पात्रा का कहना है कि नई वितरण प्रणाली लागू होने के बाद से यह वसूली लगातार जारी है। उन्होंने आरोप लगाया कि यदि कोई दुकानदार इन शुल्कों का भुगतान करने से इनकार करता था तो उसकी शराब आपूर्ति प्रभावित होने का खतरा बना रहता था। इसी वजह से अधिकांश दुकानदारों को मजबूरी में भुगतान करना पड़ा।
लोडिंग और अनलोडिंग के नाम पर भी वसूली
संगठन का दावा है कि परिवहन शुल्क के अलावा प्रति क्रेट लगभग 3 रुपये लोडिंग और 3 रुपये अनलोडिंग शुल्क भी लिया गया। यह पूरी राशि नकद में जमा कराई गई, लेकिन इसके बदले दुकानदारों को कोई रसीद, बिल या अन्य दस्तावेज उपलब्ध नहीं कराए गए। कारोबारियों का कहना है कि उनसे लिए गए पैसे का कोई आधिकारिक रिकॉर्ड नहीं दिया गया, जिससे यह साबित हो सके कि यह रकम वास्तव में परिवहन एजेंसियों या श्रमिकों को भुगतान की गई थी।
आबकारी विभाग पर शिकायतें नजरअंदाज करने का आरोप
शराब कारोबारियों के संगठन का आरोप है कि उन्होंने कई बार आबकारी विभाग के अधिकारियों को इस संबंध में शिकायतें दीं, लेकिन उनकी शिकायतों पर कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं की गई। संगठन का कहना है कि यदि समय रहते मामले पर ध्यान दिया जाता तो खुदरा कारोबारियों को इतना बड़ा आर्थिक नुकसान नहीं उठाना पड़ता।
125 करोड़ रुपये की अतिरिक्त वसूली का दावा
बिजोन कुमार पात्रा के अनुसार, संगठन के शुरुआती आकलन बताते हैं कि पिछले चार वर्षों में राज्यभर के खुदरा शराब विक्रेताओं से लगभग 125 करोड़ रुपये की अतिरिक्त वसूली की गई है। यह अनुमान केवल लाइसेंसधारी दुकानदारों द्वारा वहन किए गए परिवहन और अन्य शुल्कों पर आधारित है।
700 दुकानों का प्रतिनिधित्व, 6 हजार दुकानों पर असर की संभावना
संगठन लगभग 700 लाइसेंसधारी शराब दुकानों का प्रतिनिधित्व करता है। वहीं पश्चिम बंगाल आबकारी विभाग के एक अधिकारी के अनुसार, पूरे राज्य में करीब 6,000 शराब दुकानें संचालित हैं। ऐसे में यदि लगाए गए आरोप सही साबित होते हैं तो इसका प्रभाव राज्य के शराब कारोबार के बड़े हिस्से पर पड़ सकता है।
जांच और पारदर्शिता की मांग
संगठन ने आबकारी आयुक्त से पूरे मामले की स्वतंत्र जांच कराने, कथित अवैध वसूली को तत्काल बंद कराने और शराब वितरण नीति का सख्ती से पालन सुनिश्चित करने की मांग की है। साथ ही वितरण व्यवस्था में मौजूद कथित विसंगतियों को दूर कर पारदर्शिता बढ़ाने की भी अपील की गई है। अब यह मामला केवल शराब कारोबार तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि पश्चिम बंगाल की शराब नीति, प्रशासनिक जवाबदेही और राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का बड़ा मुद्दा बनता जा रहा है। आने वाले दिनों में इस मामले की जांच और सरकार की प्रतिक्रिया पर सभी की नजरें टिकी रहेंगी।