सनातन धर्म में श्रावण मास के सोमवार का विशेष महत्व माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन भगवान शिव और माता पार्वती की विधि-विधान से पूजा करने पर विशेष कृपा प्राप्त होती है। शास्त्रों में सावन सोमवार व्रत को अत्यंत पुण्यदायी बताया गया है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार इस व्रत से कालसर्प दोष, ग्रह दोष तथा चंद्र और राहु से जुड़े अशुभ प्रभावों को कम करने में भी सहायता मिलती है। इसलिए सावन का प्रत्येक सोमवार भक्तों के लिए आस्था और साधना का विशेष अवसर माना जाता है।
माता पार्वती ने रखी थी सावन सोमवार व्रत की नींव
ज्योतिषाचार्यों के अनुसार शिव पुराण में माता पार्वती के कठोर तप और भगवान शिव की आराधना का विस्तार से वर्णन मिलता है। कथा के अनुसार माता पार्वती ने महादेव को पति रूप में पाने के लिए सावन मास में निर्जला और निराहार रहकर कठोर तपस्या की थी। उनकी अटूट भक्ति और समर्पण ने भगवान शिव को प्रसन्न किया। मान्यता है कि उन्होंने ही 'सोलह सोमवार' और 'सावन सोमवार' व्रत की परंपरा की शुरुआत की। तभी से यह व्रत सनातन परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है।
तप से प्रसन्न होकर शिवजी ने दिया वरदान
पौराणिक मान्यता के अनुसार माता पार्वती की कठिन साधना से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने सावन मास में ही उन्हें पत्नी रूप में स्वीकार करने का वरदान दिया था। इसी कारण सावन सोमवार का व्रत अखंड सौभाग्य, सुखी दांपत्य जीवन और मनचाहा जीवनसाथी प्राप्त करने वाला माना जाता है। श्रद्धा और नियमपूर्वक इस व्रत का पालन करने वाले भक्तों पर भगवान शिव और माता पार्वती की विशेष कृपा बनी रहती है। यही कारण है कि सावन के सोमवारों का धार्मिक महत्व और भी बढ़ जाता है।
कन्याएं योग्य वर की कामना से रखती हैं व्रत
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार सावन सोमवार व्रत विशेष रूप से अविवाहित कन्याओं के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है। लोककथाओं में उल्लेख मिलता है कि एक गरीब ब्राह्मण की पुत्री ने श्रद्धापूर्वक सावन सोमवार व्रत किया, जिसके फलस्वरूप उसे योग्य वर प्राप्त हुआ। इसी विश्वास के कारण आज भी अनेक कुंवारी कन्याएं अच्छे जीवनसाथी की कामना से यह व्रत रखती हैं। वहीं विवाहित महिलाएं पति की लंबी आयु, सुख-समृद्धि और अखंड सौभाग्य की कामना के लिए सावन सोमवार का व्रत करती हैं।