नई दिल्ली - बचपन में जब बच्चों से पूछा जाता था कि बड़े होकर क्या बनना है, तो डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक, पायलट या शिक्षक जैसे जवाब आम थे। लेकिन डिजिटल दौर में बच्चों के करियर सपनों में तेजी से बदलाव देखने को मिल रहा है। अब बड़ी संख्या में बच्चे सोशल मीडिया कंटेंट क्रिएटर, यूट्यूबर और इन्फ्लुएंसर बनने की इच्छा जता रहे हैं।
60% से ज्यादा बच्चे बनना चाहते हैं कंटेंट क्रिएटर
अमेरिका और नॉर्वे में हुए एक अध्ययन के मुताबिक, मिडिल और हाई स्कूल के 60% से ज्यादा बच्चे भविष्य में टिकटॉकर, यूट्यूबर या सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर बनने में रुचि रखते हैं। खास बात यह है कि इस सोच का असर छोटे बच्चों पर भी दिखाई दे रहा है। शोध में करीब सात साल की उम्र के बच्चों में भी सोशल मीडिया से जुड़े करियर को लेकर आकर्षण पाया गया।
बच्चों ने बताया कि उन्होंने इन करियर विकल्पों को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर देखा और वहां मौजूद क्रिएटर्स से प्रभावित हुए। यानी अब बच्चों के सामने करियर के विकल्प केवल स्कूल की किताबों या परिवार से नहीं, बल्कि सोशल मीडिया फीड के जरिए भी पहुंच रहे हैं।
आखिर क्यों बढ़ रहा है इन्फ्लुएंसर बनने का आकर्षण?
विशेषज्ञों के मुताबिक, सोशल मीडिया पर दिखाई देने वाली लोकप्रियता और सफलता बच्चों को काफी आकर्षित करती है। बड़ी संख्या में फॉलोअर्स, वायरल वीडियो, ब्रांड प्रमोशन और कमाई की कहानियां इस पेशे को ग्लैमरस बनाकर पेश करती हैं। कई बच्चे यह मानने लगते हैं कि कैमरे के सामने वीडियो बनाकर कम समय में पहचान और पैसा हासिल किया जा सकता है। हालांकि, सोशल मीडिया की स्क्रीन पर दिखाई देने वाली सफलता के पीछे मौजूद मेहनत, लगातार कंटेंट बनाने का दबाव और असफलता के जोखिम अक्सर नजर नहीं आते।
कुछ साल पहले तस्वीर थी बिल्कुल अलग
करीब एक दशक पहले बच्चों की पसंद में पारंपरिक करियर का दबदबा ज्यादा था। 2018 में हुए एक बड़े अंतरराष्ट्रीय अध्ययन में डॉक्टर, वैज्ञानिक, इंजीनियर और शिक्षक जैसे पेशे बच्चों की पसंदीदा सूची में प्रमुख थे। आज सोशल मीडिया ने करियर की परिभाषा को काफी हद तक बदल दिया है। बच्चे अब ऐसे कामों को भी पेशे के रूप में देखने लगे हैं, जिनका अस्तित्व उनकी पिछली पीढ़ी के बचपन में लगभग नहीं था।
भारत में भी बढ़ रहा चाइल्ड इन्फ्लुएंसर कल्चर
यह बदलाव सिर्फ अमेरिका या यूरोप तक सीमित नहीं है। भारत में भी शॉर्ट वीडियो और सोशल मीडिया का प्रभाव बच्चों के बीच तेजी से बढ़ रहा है। उपलब्ध सर्वेक्षण आंकड़ों के मुताबिक, भारत के करीब 37% Gen Alpha बच्चे सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर बनने की इच्छा रखते हैं। वहीं, 16 वर्ष से कम उम्र के चाइल्ड इन्फ्लुएंसर्स की संख्या में भी तेजी दर्ज होने की बात सामने आई है। बताए गए आंकड़ों के अनुसार, इनकी संख्या 83,212 तक पहुंच चुकी है और पिछले साल इसमें करीब 41% की सालाना वृद्धि दर्ज की गई।
बच्चों के सपने बदले, तो माता-पिता की जिम्मेदारी भी बढ़ी
सोशल मीडिया को पूरी तरह नकारना समाधान नहीं है। कंटेंट क्रिएशन आज वास्तविक करियर विकल्प बन चुका है, लेकिन बच्चों को इसके अवसरों के साथ-साथ चुनौतियों की जानकारी देना भी जरूरी है। माता-पिता को बच्चों की रुचि समझने के साथ यह भी बताना चाहिए कि सोशल मीडिया पर सफलता तुरंत या आसान तरीके से नहीं मिलती। पढ़ाई, कौशल विकास और डिजिटल सुरक्षा के बीच संतुलन बनाना जरूरी है।
निष्कर्ष: बच्चों के करियर सपनों में आया यह बदलाव बताता है कि डिजिटल दुनिया उनकी सोच को किस तेजी से प्रभावित कर रही है। आने वाले वर्षों में कंटेंट क्रिएशन निश्चित तौर पर रोजगार का बड़ा क्षेत्र बन सकता है, लेकिन बच्चों को सोशल मीडिया की चमक के साथ उसकी वास्तविक चुनौतियों से भी परिचित कराना उतना ही जरूरी है।