विदिशा. बालकृष्ण विश्वकर्मा का नाम आज विदिशा जिले ही नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र में प्रगतिशील खेती के पर्याय के रूप में लिया जा रहा है। शिक्षक होने के साथ-साथ उन्होंने खेती को प्रयोगशाला की तरह अपनाया और पारंपरिक कृषि पद्धतियों से आगे बढ़कर नई तकनीकों पर काम किया। वर्षों के अध्ययन, प्रशिक्षण और निरंतर प्रयोगों के परिणामस्वरूप उन्होंने अपने खेत और बगीचे को ऐसी पहचान दिलाई है, जहां कृषि विज्ञान और प्रकृति का अद्भुत संगम दिखाई देता है। उनकी सफलता यह संदेश देती है कि सीमित संसाधनों के बावजूद ज्ञान और नवाचार के बल पर असाधारण उपलब्धियां हासिल की जा सकती हैं।
बगीचे में महक रहा दुनिया के सबसे चर्चित मियाजाकी आम का स्वाद
बालकृष्ण विश्वकर्मा के बगीचे की सबसे बड़ी विशेषता जापान की प्रसिद्ध और अत्यंत मूल्यवान मियाजाकी आम की सफल खेती है। यह आम अपने आकर्षक लाल-बैंगनी रंग, असाधारण मिठास और उच्च पोषण मूल्य के कारण दुनिया भर में चर्चा का विषय रहता है। अंतरराष्ट्रीय बाजारों में इसकी कीमत लाखों रुपये प्रति किलोग्राम तक बताई जाती है, इसलिए इसे दुनिया के सबसे महंगे आमों में गिना जाता है। मध्य प्रदेश के एक ग्रामीण क्षेत्र में इस विदेशी प्रजाति का सफल उत्पादन न केवल तकनीकी उपलब्धि है, बल्कि यह इस बात का भी प्रमाण है कि भारतीय किसान आधुनिक कृषि तकनीकों को अपनाकर वैश्विक स्तर की फसलों का उत्पादन करने में सक्षम हैं।
दुर्लभ किस्मों का खजाना बना शिक्षक का बगीचा
मियाजाकी आम के अलावा उनके बगीचे में कई ऐसी दुर्लभ और आकर्षक प्रजातियां मौजूद हैं, जिन्हें देखने के लिए दूर-दूर से लोग पहुंच रहे हैं। यहां दुनिया के सबसे भारी आमों में गिने जाने वाले ब्रूनाई किंग आम का उत्पादन भी किया जा रहा है, जिसका वजन लगभग छह किलोग्राम तक पहुंच जाता है। इसके साथ ही अत्यंत छोटे आकार वाला अंगूर दाना आम भी लोगों का ध्यान आकर्षित कर रहा है। आकार, स्वाद, रंग और विशेषताओं की दृष्टि से एक-दूसरे से बिल्कुल अलग ये किस्में उनके बगीचे को किसी कृषि संग्रहालय जैसा स्वरूप प्रदान करती हैं। कृषि विशेषज्ञ भी इन प्रयोगों को नवाचार का उत्कृष्ट उदाहरण मान रहे हैं।
ग्राफ्टिंग तकनीक से एक ही पेड़ पर उगा दीं 35 किस्में
बालकृष्ण विश्वकर्मा की सबसे उल्लेखनीय उपलब्धियों में से एक उन्नत ग्राफ्टिंग तकनीक का सफल उपयोग है। उन्होंने कलमकारी की वैज्ञानिक विधि का इस्तेमाल करते हुए एक ही आम के वृक्ष पर 35 अलग-अलग किस्मों को विकसित कर दिया है। परिणामस्वरूप एक ही पेड़ की विभिन्न शाखाओं पर अलग-अलग रंग, आकार, स्वाद और गुणों वाले आम लग रहे हैं। यह प्रयोग न केवल उनकी तकनीकी दक्षता को दर्शाता है, बल्कि सीमित भूमि पर अधिक विविधता और उत्पादन प्राप्त करने की संभावनाओं को भी उजागर करता है। कृषि क्षेत्र में इस तरह के प्रयोग भविष्य की टिकाऊ और लाभकारी खेती की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माने जा रहे हैं।
किसानों के लिए बन रहे प्रेरणा और प्रशिक्षण का केंद्र
उनकी उपलब्धियों की चर्चा अब केवल गांव या जिले तक सीमित नहीं रही है। आसपास के क्षेत्रों के किसान उनके बगीचे का दौरा कर नई तकनीकों की जानकारी ले रहे हैं और आधुनिक बागवानी के गुर सीख रहे हैं। बालकृष्ण विश्वकर्मा स्वयं भी किसानों को वैज्ञानिक खेती, ग्राफ्टिंग तकनीक और उच्च मूल्य वाली फसलों के महत्व के बारे में जागरूक करते हैं। उनके प्रयासों ने यह साबित किया है कि कृषि में नवाचार केवल उत्पादन बढ़ाने का माध्यम नहीं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने और किसानों की आय बढ़ाने का प्रभावी रास्ता भी है।
नई पीढ़ी को दे रहे विज्ञान आधारित खेती का संदेश
आज जब युवा पीढ़ी खेती से दूरी बना रही है, ऐसे समय में बालकृष्ण विश्वकर्मा का उदाहरण नई सोच को जन्म देता है। उन्होंने दिखाया है कि आधुनिक विज्ञान, तकनीक और सतत सीखने की प्रवृत्ति के साथ खेती को लाभकारी, आकर्षक और सम्मानजनक व्यवसाय बनाया जा सकता है। उनका बगीचा केवल आमों का उत्पादन केंद्र नहीं, बल्कि नवाचार, अनुसंधान और कृषि उद्यमिता का जीवंत मॉडल बन चुका है। यही कारण है कि वे क्षेत्र के किसानों, छात्रों और कृषि प्रेमियों के लिए प्रेरणा के सशक्त स्रोत बन गए हैं।