उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारियों को लेकर भारतीय जनता पार्टी ने अपने केंद्रीय नेतृत्व की सक्रियता बढ़ा दी है। राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन 11 सितंबर से पश्चिमी उत्तर प्रदेश के 2 दिवसीय दौरे की शुरुआत करेंगे। उनके दौरे का पहला पड़ाव मेरठ मंडल होगा, जहां वह सांसदों, विधायकों, महापौरों और जिलाध्यक्षों के साथ बैठक कर संगठन की स्थिति और चुनावी तैयारियों की समीक्षा करेंगे। पार्टी का लक्ष्य जमीनी संगठन को सक्रिय करने के साथ स्थानीय नेतृत्व को स्पष्ट चुनावी दिशा देना है। इसके बाद दौरे के दूसरे दिन गाजियाबाद में भी संगठनात्मक बैठक प्रस्तावित है।
नितिन नवीन के साथ पूरी प्रदेश टीम रहेगी मौजूद
नितिन नवीन के पश्चिमी उत्तर प्रदेश दौरे को केवल औपचारिक संगठनात्मक यात्रा नहीं माना जा रहा है। उनके साथ उत्तर प्रदेश भाजपा अध्यक्ष पंकज चौधरी, पश्चिमी उत्तर प्रदेश के क्षेत्रीय अध्यक्ष नवाब सिंह नागर और पश्चिम क्षेत्र के प्रभारी रामप्रताप सिंह चौहान भी मौजूद रहेंगे। हाल में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के लिए नई क्षेत्रीय टीम का गठन किया गया है, जिसमें 10 उपाध्यक्ष, 4 महामंत्री, 10 सचिव और 13 सदस्य शामिल किए गए हैं। ऐसे में राष्ट्रीय अध्यक्ष का दौरा नई टीम को सीधे केंद्रीय नेतृत्व से जोड़ने और चुनाव से पहले संगठनात्मक जिम्मेदारियां स्पष्ट करने के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
बीएल संतोष लखनऊ में परखेंगे संगठन की तैयारी
एक तरफ नितिन नवीन पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जमीनी संगठन से संवाद करेंगे, वहीं भाजपा के राष्ट्रीय महामंत्री संगठन बीएल संतोष 10 और 11 सितंबर को लखनऊ में संगठन की तैयारियों का जायजा ले सकते हैं। उनके दौरे में विशेष रूप से संगठन, मीडिया और सामाजिक माध्यमों से जुड़ी रणनीति पर चर्चा होने की संभावना है। इससे पहले उत्तर प्रदेश के प्रभारी विनोद तावड़े और सह-प्रभारी जगदीश ईश्वरभाई पटेल भी लखनऊ का दौरा कर चुके हैं। भाजपा ने अगस्त में इन दोनों नेताओं को उत्तर प्रदेश की जिम्मेदारी सौंपी थी, जिसके बाद प्रदेश संगठन में केंद्रीय नेतृत्व की निगरानी और बढ़ी है।
अमित शाह भी संभाल सकते हैं चुनावी मोर्चा
भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व की सक्रियता यहीं थमती नहीं दिख रही है। गृह मंत्री अमित शाह का भी इसी महीने उत्तर प्रदेश दौरा प्रस्तावित बताया जा रहा है। उत्तर प्रदेश की राजनीति और संगठन पर शाह की लंबे समय से विशेष पकड़ रही है और वह पहले राज्य के प्रभारी की भूमिका भी निभा चुके हैं। ऐसे में नितिन नवीन और बीएल संतोष के संगठनात्मक दौरों के बाद अमित शाह की सक्रियता को चुनावी रणनीति को राजनीतिक धार देने की कवायद के रूप में देखा जा रहा है। पार्टी नेतृत्व का जोर संगठन, सरकार और चुनावी अभियान के बीच बेहतर तालमेल तैयार करने पर दिखाई दे रहा है।
पश्चिमी यूपी पर इतना जोर क्यों?
पश्चिमी उत्तर प्रदेश भाजपा के लिए रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण क्षेत्र है। इस इलाके में बड़ी संख्या में विधानसभा क्षेत्र हैं और यहां के चुनावी रुझान राज्य की सत्ता के समीकरण पर असर डाल सकते हैं। 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को उत्तर प्रदेश में बड़ा झटका लगा था और उसकी सीटों की संख्या 62 से घटकर 33 रह गई थी, जबकि समाजवादी पार्टी 37 सीटों के साथ सबसे बड़े दल के रूप में उभरी। पश्चिमी क्षेत्र में भी भाजपा के प्रदर्शन में गिरावट दिखाई दी और विपक्ष ने कई महत्वपूर्ण इलाकों में अपनी पकड़ मजबूत की। इसलिए 2027 से पहले पार्टी की पहली बड़ी संगठनात्मक कवायद पश्चिम से शुरू होना अपने आप में महत्वपूर्ण संकेत है।
जाट, किसान और गठबंधन की राजनीति पर नजर
पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति में जाट समुदाय, किसान मुद्दे और क्षेत्रीय दलों की भूमिका लंबे समय से महत्वपूर्ण रही है। राष्ट्रीय लोक दल के भाजपा के साथ आने के बाद पश्चिमी क्षेत्र का राजनीतिक समीकरण पहले की तुलना में बदला है। आगामी चुनाव में भाजपा के लिए चुनौती यह होगी कि वह अपने पारंपरिक समर्थक वर्गों को साथ रखते हुए 2024 में हुए नुकसान की भरपाई कैसे करे। खास तौर पर समाजवादी पार्टी के नेतृत्व वाले सामाजिक गठजोड़ के मुकाबले भाजपा की रणनीति में सहयोगी दलों और क्षेत्रीय प्रभावशाली समूहों की भूमिका महत्वपूर्ण रह सकती है। हालिया राजनीतिक गतिविधियां भी संकेत दे रही हैं कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश 2027 की चुनावी रणनीति का शुरुआती और अहम केंद्र बनने जा रहा है।
योगी सरकार के कामकाज को भी चुनावी मुद्दा बनाने की तैयारी
संगठनात्मक सक्रियता के साथ भाजपा सरकार की उपलब्धियों को भी चुनावी विमर्श में प्रमुखता देने की तैयारी में है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पिछले कुछ महीनों में लगातार जिलों और विधानसभा क्षेत्रों का दौरा कर विकास परियोजनाओं का उद्घाटन और शिलान्यास कर रहे हैं। हालिया रिपोर्ट के अनुसार वह 44 से अधिक जिलों में 115 विधानसभा क्षेत्रों को कवर कर चुके हैं, जहां 2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान विपक्षी दलों ने बड़ी संख्या में बढ़त हासिल की थी। इन परियोजनाओं में सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, बिजली, स्वच्छता, पर्यटन और कौशल विकास से जुड़े कार्य शामिल हैं। इससे साफ है कि भाजपा संगठन के साथ सरकार के कामकाज को भी चुनावी रणनीति का महत्वपूर्ण आधार बनाने की कोशिश कर रही है।
2024 की चुनौती से 2027 की वापसी तक
भाजपा के लिए उत्तर प्रदेश इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि राज्य लोकसभा में सबसे अधिक 80 सीटें भेजता है और यहां की विधानसभा में 403 सीटें हैं। 2024 के लोकसभा चुनाव में पार्टी का प्रदर्शन उसके पिछले दो चुनावों की तुलना में कमजोर रहा, जबकि समाजवादी पार्टी ने उल्लेखनीय बढ़त हासिल की। अब 2027 का विधानसभा चुनाव भाजपा के लिए केवल राज्य सरकार बचाने की लड़ाई नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश में अपने व्यापक राजनीतिक आधार को दोबारा मजबूत करने की परीक्षा भी होगा। पश्चिमी उत्तर प्रदेश से राष्ट्रीय अध्यक्ष की शुरुआत, लखनऊ में संगठन की समीक्षा और अमित शाह की प्रस्तावित सक्रियता इसी बड़े अभियान की शुरुआती कड़ियों के रूप में देखी जा रही है।
चुनाव से पहले संगठन को बूथ तक मजबूत करने की कोशिश
भाजपा की रणनीति का अगला बड़ा हिस्सा बूथ और शक्ति केंद्र स्तर तक संगठन को सक्रिय करना है। पार्टी ने प्रदेश और क्षेत्रीय टीमों में बदलाव के बाद अब विभिन्न मोर्चों के गठन और जमीनी कार्यकर्ताओं की सक्रियता बढ़ाने पर जोर देना शुरू किया है। केंद्रीय नेतृत्व के लगातार दौरों का उद्देश्य केवल नेताओं के साथ बैठक करना नहीं, बल्कि स्थानीय स्तर पर संगठन की कमजोरियों को पहचानना और चुनाव से पहले उन्हें दूर करना भी है। 2027 के चुनाव में अभी समय बाकी है, लेकिन भाजपा का मौजूदा कार्यक्रम बताता है कि पार्टी इस बार अंतिम चरण तक इंतजार करने के बजाय काफी पहले से चुनावी मशीनरी को सक्रिय करना चाहती है।
2027 की लड़ाई में पश्चिम बनेगा पहली बड़ी परीक्षा
उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव की औपचारिक घोषणा अभी दूर है, लेकिन प्रमुख दलों की राजनीतिक गतिविधियां तेजी से चुनावी रंग लेने लगी हैं। भाजपा के लिए पश्चिमी उत्तर प्रदेश से अभियान की शुरुआत इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यही क्षेत्र 2024 के बाद बदले राजनीतिक समीकरण की शुरुआती परीक्षा भी देगा। नितिन नवीन का दौरा संगठन को सक्रिय करने, बीएल संतोष की समीक्षा रणनीति को कसने और अमित शाह की संभावित सक्रियता राजनीतिक संदेश को मजबूत करने की दिशा में कदम मानी जा रही है। अब देखना यह होगा कि भाजपा 2024 में मिले झटके को 2027 तक किस तरह संगठनात्मक मजबूती और नए सामाजिक-राजनीतिक समीकरण में बदल पाती है।