उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की तैयारियों के बीच बहुजन समाज पार्टी ने अपने राजनीतिक विमर्श में युवाओं को प्रमुख स्थान देना शुरू कर दिया है। पार्टी प्रमुख मायावती ने सामाजिक न्याय के साथ रोजगार के मुद्दे को जोड़ते हुए ‘हर हाथ को काम’ का नारा बुलंद किया है। उन्होंने बेरोजगारी, भर्ती परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं और पेपर लीक जैसी समस्याओं को देश के युवाओं के भविष्य से जुड़ा गंभीर विषय बताते हुए केंद्र और राज्य सरकारों से पारदर्शी एवं भ्रष्टाचार मुक्त भर्ती प्रक्रिया सुनिश्चित करने की मांग की। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, पहली बार मतदान करने वाले और युवा वर्ग की बढ़ती संख्या को देखते हुए लगभग सभी प्रमुख राजनीतिक दल अपनी रणनीतियों में इस वर्ग को विशेष महत्व दे रहे हैं।
पेपर लीक और भर्ती व्यवस्था पर सरकार से जवाबदेही की मांग
मायावती ने अपने सार्वजनिक संदेश में हाल के महीनों में भर्ती परीक्षाओं और पेपर लीक को लेकर सामने आए विवादों का उल्लेख करते हुए कहा कि युवाओं को निष्पक्ष अवसर उपलब्ध कराना सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारी है। उन्होंने मांग की कि सभी सरकारी भर्तियां समयबद्ध, पारदर्शी और भ्रष्टाचार मुक्त ढंग से पूरी की जाएं ताकि प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे लाखों अभ्यर्थियों का विश्वास बहाल हो सके। उनका कहना था कि रोजगार केवल आर्थिक आवश्यकता नहीं बल्कि सामाजिक स्थिरता और युवाओं के आत्मविश्वास से भी जुड़ा हुआ विषय है। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता स्थापित करना सुशासन की मूल कसौटी माना जाना चाहिए।
‘हर हाथ को काम’ को सामाजिक न्याय से जोड़ा
बसपा प्रमुख ने रोजगार के मुद्दे को केवल आर्थिक दृष्टि से नहीं बल्कि सामाजिक न्याय के व्यापक परिप्रेक्ष्य में भी प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि यदि किसी परिवार के एक सदस्य को भी सरकारी नौकरी प्राप्त होती है तो पूरे परिवार की आर्थिक और सामाजिक स्थिति में सकारात्मक परिवर्तन आ सकता है। उन्होंने अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति तथा अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षण व्यवस्था को सामाजिक सुरक्षा का महत्वपूर्ण आधार बताते हुए कहा कि नियमित सरकारी भर्तियों से इन वर्गों को स्थायी अवसर मिल सकते हैं। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि बसपा अपने पारंपरिक सामाजिक आधार को युवा मतदाताओं के साथ जोड़ने की दिशा में यह नया राजनीतिक संदेश देने का प्रयास कर रही है।
युवा आंदोलनों के बीच बदला बसपा का राजनीतिक रुख
हाल के दिनों में बेरोजगारी और प्रतियोगी परीक्षाओं से जुड़े मुद्दों पर राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर सहित विभिन्न स्थानों पर हुए युवा आंदोलनों ने राष्ट्रीय राजनीति का ध्यान आकर्षित किया है। इन आंदोलनों को लेकर समाजवादी पार्टी और कांग्रेस लगातार सरकार पर हमलावर रही हैं। वहीं, बसपा ने शुरुआती दौर में अपेक्षाकृत संतुलित प्रतिक्रिया देते हुए राजनीतिक दलों को इस विषय पर अनावश्यक राजनीति से बचने की सलाह दी थी। किंतु अब मायावती का इस मुद्दे पर अधिक मुखर होना यह संकेत देता है कि पार्टी युवाओं से जुड़े सवालों को आगामी राजनीतिक एजेंडे में प्रमुख स्थान देना चाहती है। विश्लेषकों का मानना है कि यह विपक्षी राजनीति में अपनी अलग पहचान मजबूत करने की रणनीति का भी हिस्सा हो सकता है।
सरकारी नौकरियों और निजीकरण पर उठाए सवाल
मायावती ने अपने संदेश में दावा किया कि उनके नेतृत्व वाली सरकार के कार्यकाल में बड़ी संख्या में सरकारी नियुक्तियां की गई थीं। उन्होंने वर्तमान परिस्थितियों का उल्लेख करते हुए कहा कि रोजगार सृजन को प्राथमिकता दी जानी चाहिए तथा सरकारी रिक्त पदों को शीघ्र भरा जाना आवश्यक है। इसके साथ ही उन्होंने राष्ट्रीय परिसंपत्तियों के निजीकरण पर भी चिंता व्यक्त करते हुए केंद्र और राज्य सरकारों से सार्वजनिक क्षेत्र में रोजगार के अवसरों को सुरक्षित रखने का आग्रह किया। उनका कहना था कि नियमित सरकारी भर्तियां न केवल प्रशासनिक व्यवस्था को मजबूत करेंगी बल्कि युवाओं में भविष्य के प्रति विश्वास भी बढ़ाएंगी।
जेन-ज़ी की राजनीति बनेगी चुनावी मुकाबले का प्रमुख आधार
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आगामी विधानसभा चुनावों में पहली बार मतदान करने वाले तथा युवा आयु वर्ग के मतदाता चुनावी परिणामों को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं। यही कारण है कि भारतीय जनता पार्टी, समाजवादी पार्टी, कांग्रेस और अब बहुजन समाज पार्टी भी युवाओं के मुद्दों को अपनी राजनीतिक प्राथमिकताओं में शामिल कर रही हैं। रोजगार, शिक्षा, कौशल विकास, पारदर्शी भर्ती व्यवस्था और डिजिटल अवसर जैसे विषय आने वाले समय में चुनावी बहस के केंद्र में रहने की संभावना है। ऐसे परिदृश्य में मायावती का ‘हर हाथ को काम’ का संदेश यह संकेत देता है कि बसपा भी युवा मतदाताओं के बीच अपनी राजनीतिक उपस्थिति को नए सिरे से मजबूत करने की दिशा में सक्रिय हो गई है।