लखनऊ. समाजवादी पार्टी की पहचान लंबे समय से लाल टोपी, लाल गमछे और समाजवादी विचारधारा से जुड़ी रही है, लेकिन अब पार्टी की छात्र इकाई के रंग में बड़ा बदलाव दिखाई दे रहा है। समाजवादी छात्र सभा के पदाधिकारी और कार्यकर्ता अब नीली जींस और नीली टी-शर्ट में नजर आएंगे। लखनऊ में 8 सितंबर को आयोजित छात्र सभा के सम्मेलन में नए परिधान को सामने लाया गया। पार्टी की ओर से इसे संगठन को अधिक स्पष्ट पहचान देने की कवायद बताया जा रहा है, लेकिन उत्तर प्रदेश की राजनीति में रंगों के गहरे राजनीतिक अर्थ को देखते हुए इस बदलाव को केवल संगठनात्मक फैसला मानना मुश्किल है।
नीला रंग क्यों है इतना महत्वपूर्ण?
उत्तर प्रदेश की राजनीति में नीला रंग लंबे समय से दलित अस्मिता और डॉ. भीमराव आंबेडकर की विचारधारा से जोड़ा जाता रहा है। बहुजन समाज पार्टी ने इसी रंग को अपनी राजनीतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया, जबकि आजाद समाज पार्टी भी नीले रंग के जरिए दलित राजनीति से अपना जुड़ाव प्रदर्शित करती है। ऐसे में समाजवादी पार्टी की छात्र इकाई के परिधान में नीले रंग को प्रमुखता देना एक प्रतीकात्मक राजनीतिक संदेश के तौर पर देखा जा रहा है। खासकर तब, जब पार्टी अपने पारंपरिक सामाजिक आधार से आगे बढ़कर दलित समुदाय में अपनी स्वीकार्यता मजबूत करने की कोशिश कर रही है।
पीडीए में ‘डी’ को मजबूत करने की रणनीति
समाजवादी पार्टी पिछले कुछ वर्षों से पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक यानी पीडीए सामाजिक समीकरण को अपनी राजनीति के केंद्र में रखती रही है। 2024 के लोकसभा चुनाव में पार्टी ने इस सामाजिक गठजोड़ को व्यापक रूप से आगे बढ़ाया था और चुनावी प्रदर्शन में भी उसे इसका लाभ मिला। अब 2027 के विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए पार्टी की कोशिश इस समर्थन को बनाए रखने के साथ-साथ नए सामाजिक वर्गों तक विस्तार करने की है। छात्र सभा के ड्रेस कोड में नीले रंग का प्रवेश इसी रणनीति में दलित वर्ग, विशेषकर युवा दलितों को अधिक मजबूती से जोड़ने के प्रयास के रूप में देखा जा रहा है।
निशाने पर युवा और नई पीढ़ी
सपा की रणनीति केवल दलित मतदाताओं तक सीमित नहीं दिखाई दे रही है। पार्टी अपने विभिन्न युवा संगठनों को अलग-अलग पहचान देने और जनरेशन जेड तथा जनरेशन अल्फा से जुड़े मुद्दों पर सक्रियता बढ़ाने की तैयारी में है। समाजवादी युवा जनसभा, समाजवादी लोहिया वाहिनी, समाजवादी आंबेडकर वाहिनी और समाजवादी छात्र सभा को इसी व्यापक संगठनात्मक कवायद का हिस्सा माना जा रहा है। पार्टी नेतृत्व चाहता है कि कॉलेज और विश्वविद्यालयों में सक्रिय युवाओं के बीच संगठन की स्पष्ट पहचान बने और शिक्षा, रोजगार तथा सामाजिक न्याय जैसे मुद्दों के जरिए नई पीढ़ी के साथ राजनीतिक संवाद मजबूत हो।
अखिलेश के नीले गमछे ने भी बढ़ाया संकेत
छात्र सभा के ड्रेस कोड में बदलाव से पहले समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव और शिवपाल सिंह यादव भी पार्टी के एक कार्यक्रम में नीले गमछे के साथ नजर आए थे। इसके बाद छात्र सभा के परिधान में नीले रंग को शामिल किए जाने से इस बदलाव को लेकर राजनीतिक चर्चाएं और तेज हो गईं। हालांकि किसी राजनीतिक दल के परिधान का रंग बदलना अपने आप में चुनावी समर्थन की गारंटी नहीं होता, लेकिन उत्तर प्रदेश जैसे प्रतीकप्रधान राजनीतिक माहौल में रंगों का इस्तेमाल मतदाताओं तक संदेश पहुंचाने का प्रभावी माध्यम रहा है। इसलिए सपा के इस कदम को उसकी व्यापक सामाजिक पहुंच की कोशिश से जोड़कर देखा जा रहा है।
भाजपा ने साधा निशाना
समाजवादी पार्टी के इस बदलाव को लेकर भारतीय जनता पार्टी ने भी प्रतिक्रिया दी है। भाजपा प्रवक्ता राकेश त्रिपाठी ने इसे दलित मतदाताओं को आकर्षित करने की कोशिश बताते हुए कहा कि केवल परिधान का रंग बदलने से पुराने राजनीतिक सवाल समाप्त नहीं हो जाते। दूसरी ओर, सपा के भीतर इसे संगठन को नई पीढ़ी के अनुरूप ढालने और छात्र राजनीति में अपनी सक्रियता बढ़ाने की कवायद बताया जा रहा है। इस तरह नीले रंग की नई पहचान अब केवल छात्र सभा के परिधान तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि इसके बहाने दोनों प्रमुख राजनीतिक धाराओं के बीच दलित मतदाताओं और युवा वर्ग को लेकर राजनीतिक प्रतिस्पर्धा भी सामने आ गई है।
2027 में असली परीक्षा होगी
समाजवादी पार्टी के लिए नीला ड्रेस कोड प्रतीकात्मक राजनीति से आगे कितना असर पैदा करता है, इसकी वास्तविक परीक्षा 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में होगी। दलित मतदाता राज्य की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं और इस वर्ग के बीच बहुजन समाज पार्टी की लंबे समय से स्थापित राजनीतिक पहचान रही है। सपा यदि दलित युवाओं को अपने पीडीए गठजोड़ में स्थायी रूप से जोड़ना चाहती है, तो केवल रंग और प्रतीकों के बजाय शिक्षा, रोजगार, प्रतिनिधित्व, सामाजिक न्याय और अवसरों से जुड़े ठोस मुद्दों पर भी लगातार सक्रियता दिखानी होगी। फिलहाल नीला रंग यह संकेत जरूर दे रहा है कि 2027 से पहले समाजवादी पार्टी अपने सामाजिक और युवा आधार को नए सिरे से विस्तार देने की तैयारी में है।