उत्तरप्रदेश की राजनीति में दलित वोटबैंक को लेकर सियासी हलचल तेज है। आगामी विधानसभा चुनावों को देखते हुए समाजवादी पार्टी ने दलित मतदाताओं के बीच अपनी पहुंच बढ़ाने की रणनीति पर जोर देना शुरू किया है।इसी कड़ी में सपा 15 नवंबर को आगरा से दलित महासम्मेलन की शुरुआत करेगी। कार्यक्रम में पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव के शामिल होने की बात कही गई है। सम्मेलन में आगरा और आसपास के क्षेत्रों से बड़ी संख्या में पार्टी कार्यकर्ताओं के पहुंचने की संभावना है।सपा ने सम्मेलन के लिए आगरा को चुनकर एक राजनीतिक संदेश देने की कोशिश की है, क्योंकि यह शहर दलित आंदोलन और बहुजन राजनीति के इतिहास से गहराई से जुड़ा रहा है।
डॉ. अंबेडकर से भी जुड़ा है आगरा का इतिहास
आगरा का संबंध डॉ. भीमराव अंबेडकर से भी रहा है। 18 मार्च 1956 को आगरा की चक्री पाट जाटव बस्ती में अंबेडकर ने अपना आखिरी बड़ा भाषण दिया था।बताया जाता है कि इसी दौरान उन्होंने बौद्ध धर्म अपनाने की दिशा में संकेत दिया था। यह भाषण नागपुर में हुए दीक्षा समारोह से कुछ महीने पहले हुआ था।यही ऐतिहासिक पृष्ठभूमि आगरा को अंबेडकरवादी राजनीति के लिहाज से खास बनाती है।
कांशीराम ने भी आगरा को बनाया था संगठन का आधार
बहुजन राजनीति में कांशीराम की भूमिका को देखते हुए भी आगरा महत्वपूर्ण रहा है। कांशीराम ने 1978 में BAMCEF की औपचारिक स्थापना की थी और उत्तर प्रदेश में संगठन की शुरुआती इकाइयों में आगरा का भी महत्वपूर्ण स्थान रहा।बाद में इसी सामाजिक-संगठनात्मक आधार से डीएस-4 और बहुजन समाज पार्टी की राजनीति को विस्तार मिला।आगरा में शिक्षित दलित कर्मचारियों, छोटे व्यापारियों और जाटव समुदाय के बीच संगठन खड़ा करने की कोशिशों ने बहुजन राजनीति को पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मजबूत आधार दिया।
आगरा को दलित राजनीति की प्रयोगशाला क्यों माना जाता है?
आगरा में लंबे समय से दलित संगठनों और अंबेडकरवादी आंदोलनों की सक्रियता रही है। 1950 और 1960 के दशक से ही यहां दलित समुदाय ने सामाजिक पहचान और अधिकारों से जुड़े आंदोलनों में भाग लिया।अंबेडकर की प्रतिमाओं, जुलूसों और बौद्ध धर्म अपनाने जैसे आंदोलनों ने यहां एक अलग राजनीतिक-सामाजिक चेतना विकसित की। बाद में यही माहौल कांशीराम की बहुजन राजनीति के लिए भी उपयोगी आधार बना।इसी वजह से आगरा को उत्तर भारत में बहुजन राजनीति के शुरुआती मजबूत केंद्रों में गिना जाता है।
जाटव वोटबैंक पर सपा की नजर
आगरा और आसपास के जिलों में जाटव समुदाय की अच्छी राजनीतिक मौजूदगी है। सपा की रणनीति में यह वोटबैंक इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि जाटव समुदाय लंबे समय से BSP का प्रमुख आधार रहा है।आगरा मंडल में आगरा, मथुरा, मैनपुरी और फिरोजाबाद जिले आते हैं। इसके अलावा इटावा और हाथरस भी इस पूरे राजनीतिक क्षेत्र से जुड़े हुए हैं। इन इलाकों में दलित मतदाताओं की बड़ी संख्या चुनावी समीकरणों को प्रभावित करती है।राजनीतिक अनुमानों के मुताबिक आगरा में जाटव आबादी करीब 23%, मथुरा में 20%, मैनपुरी में 20%, फिरोजाबाद में 19%, इटावा में 25% और हाथरस में करीब 24% बताई जाती है।यही वजह है कि सपा इस क्षेत्र में दलित वोटरों के बीच अपनी राजनीतिक पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रही है।
नीले रंग और दलित नेताओं को भी मिल रही अहमियत
सपा की बदली रणनीति में पार्टी के प्रतीकों और संगठनात्मक प्राथमिकताओं में भी बदलाव दिखाई देता है। पार्टी के कार्यक्रमों में नीले रंग का इस्तेमाल बढ़ा है और गमछे से लेकर टी-शर्ट तक में नीला रंग नजर आने लगा है। इसके साथ ही सपा अपने दलित नेताओं को भी संगठन में अधिक राजनीतिक महत्व देने की कोशिश कर रही है। दलित महासम्मेलन इसी रणनीति का एक हिस्सा माना जा रहा है।
BSP की मौजूदा स्थिति का फायदा उठाने की कोशिश
सपा का यह सम्मेलन ऐसे समय में हो रहा है, जब बहुजन समाज पार्टी के भीतर नेतृत्व और संगठन को लेकर लगातार चर्चाएं चल रही हैं।BSP में आकाश आनंद और ईशान आनंद को लेकर हुए घटनाक्रम के बाद पार्टी के युवा कार्यकर्ताओं और समर्थकों के बीच भी राजनीतिक चर्चाएं तेज हुई हैं। सपा की कोशिश ऐसे माहौल में BSP के पारंपरिक वोटबैंक के बीच अपनी जगह बनाने की है।
क्या सपा BSP के कोर वोटबैंक में सेंध लगा पाएगी?
दलित महासम्मेलन के जरिए सपा आगरा से पश्चिमी उत्तर प्रदेश के दलित मतदाताओं तक अपना राजनीतिक संदेश पहुंचाने की कोशिश करेगी। खास तौर पर जाटव समुदाय को जोड़ना पार्टी के लिए बड़ी चुनौती भी है और बड़ा अवसर भी।हालांकि, BSP के पारंपरिक वोटबैंक में सेंध लगाना आसान नहीं होगा।