डोईवाला : उत्तराखंड जैसे आपदा की दृष्टि से संवेदनशील राज्य में मानसून के दौरान बाढ़ भूस्खलन और बादल फटने जैसी घटनाएं अक्सर जनजीवन को प्रभावित करती हैं। ऐसी आपदाओं के दौरान मोबाइल नेटवर्क और अन्य संचार सेवाएं बाधित होने से राहत एवं बचाव कार्यों में जुटी टीमों के सामने एक-दूसरे से संपर्क बनाए रखना बड़ी चुनौती बन जाता है। इसी समस्या को ध्यान में रखते हुए डोईवाला के खैरी गांव निवासी डॉ. जसप्रीत कौर और उनकी टीम ने एक वायरलेस डिवाइस तैयार की है जो आपदा के दौरान संचार व्यवस्था को बनाए रखने में मददगार साबित हो सकती है।
आपदा के समय संचार व्यवस्था को बेहतर बनाने की पहल
डॉ. जसप्रीत कौर और उनकी सात सदस्यीय टीम ने डिवाइस फॉर वायरलेस नेटवर्क एक्सटेंशन नामक वायरलेस डिवाइस को डिजाइन किया है। टीम का उद्देश्य ऐसी तकनीक विकसित करना है जिसके माध्यम से आपदा के दौरान नेटवर्क सेवाएं बाधित होने की स्थिति में भी जरूरी सूचनाओं का आदान-प्रदान किया जा सके।
आपदा के दौरान कई बार मोबाइल टावर और संचार नेटवर्क प्रभावित हो जाते हैं। इसके चलते प्रभावित क्षेत्रों में फंसे लोगों प्रशासन राहत दल और रेस्क्यू टीमों के बीच संपर्क स्थापित करने में दिक्कत आती है। ऐसे समय में यदि सूचना समय पर संबंधित टीम तक नहीं पहुंचती है तो राहत एवं बचाव कार्य प्रभावित हो सकते हैं। टीम द्वारा तैयार की गई डिवाइस इसी चुनौती को ध्यान में रखकर विकसित की गई है।
डेढ़ से दो साल तक किया रिसर्च और काम
डॉ. जसप्रीत कौर के अनुसार, इस डिवाइस को तैयार करने में टीम ने करीब डेढ़ से दो वर्ष तक रिसर्च और तकनीकी कार्य किया। डिवाइस को विकसित करते समय इसे कॉम्पैक्ट टिकाऊ और किफायती बनाने पर विशेष ध्यान दिया गया है ताकि भविष्य में इसका उपयोग व्यापक स्तर पर किया जा सके।
डिवाइस में कम बिजली की खपत जैसी विशेषता रखी गई है। इसके अलावा इसमें सेल्फ-हीलिंग नेटवर्क की सुविधा भी बताई गई है जो नेटवर्क व्यवस्था को अधिक प्रभावी और परिस्थितियों के अनुरूप बनाए रखने में मदद कर सकती है।
पेटेंट कार्यालय में डिजाइन पंजीकृत
टीम के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि यह भी है कि डिवाइस के मॉडल और इससे संबंधित डिजाइन का पंजीकरण भारत सरकार के पेटेंट कार्यालय में कराया जा चुका है। टीम को डिजाइन पंजीकरण का प्रमाण पत्र भी मिल चुका है। इससे डिवाइस के विकास और इसे आगे व्यावसायिक रूप से तैयार करने की दिशा में टीम को प्रोत्साहन मिला है।
फिलहाल टीम इस डिवाइस को बाजार में उपलब्ध कराने की दिशा में आगे की तैयारियों में जुटी है। हालांकि आम लोगों के लिए यह डिवाइस कब तक उपलब्ध होगी और इसकी कीमत कितनी होगी इसे लेकर अभी तस्वीर स्पष्ट नहीं है।
उत्तराखंड में हो सकता है महत्वपूर्ण उपयोग
उत्तराखंड भौगोलिक दृष्टि से संवेदनशील राज्य है। मानसून के दौरान कई इलाकों में बाढ़ भूस्खलन और बादल फटने जैसी घटनाओं का खतरा बना रहता है। ऐसी परिस्थितियों में सड़क मार्ग बाधित होने के साथ-साथ मोबाइल नेटवर्क और संचार सेवाओं पर भी असर पड़ सकता है।
ऐसे में यदि यह डिवाइस वास्तविक परिस्थितियों में प्रभावी ढंग से काम करती है तो राहत एवं बचाव एजेंसियों के लिए यह उपयोगी तकनीक साबित हो सकती है। विशेष रूप से उन क्षेत्रों में जहां सामान्य संचार नेटवर्क जल्दी बहाल नहीं हो पाता वहां ऐसी तकनीक आपदा प्रबंधन में मददगार बन सकती है।
युवाओं से तकनीक के इस्तेमाल की अपील
डॉ. जसप्रीत कौर ने युवाओं से अपील की कि शिक्षा को केवल किताबों तक सीमित न रखा जाए। उन्होंने कहा कि युवाओं को अपने ज्ञान और तकनीकी क्षमता का इस्तेमाल समाज के सामने मौजूद समस्याओं के समाधान के लिए करना चाहिए।
उनका मानना है कि स्थानीय समस्याओं को समझकर उनके लिए तकनीकी समाधान विकसित किए जा सकते हैं। उनकी टीम द्वारा तैयार की गई वायरलेस डिवाइस भी इसी सोच का उदाहरण है।
बाजार में आने का इंतजार
फिलहाल इस डिवाइस को बाजार में लाने की दिशा में तैयारियां चल रही हैं। अब देखना होगा कि इसे आम जनता और आपदा प्रबंधन से जुड़ी एजेंसियों के लिए कब तक उपलब्ध कराया जाता है और वास्तविक आपदा परिस्थितियों में यह कितनी प्रभावी साबित होती है।
यदि डिवाइस परीक्षण और वास्तविक परिस्थितियों में अपेक्षित परिणाम देने में सफल रहती है तो उत्तराखंड जैसे आपदा संवेदनशील राज्य में आपातकालीन संचार व्यवस्था को मजबूत करने में इसकी अहम भूमिका हो सकती है। इससे न केवल राहत एवं बचाव टीमों के बीच संपर्क बेहतर बनाने में मदद मिल सकती है बल्कि आपदा प्रभावित क्षेत्रों से जरूरी सूचनाएं समय पर पहुंचाने की दिशा में भी यह एक उपयोगी तकनीकी पहल साबित हो सकती है।