कोलकाता: जाधवपुर यूनिवर्सिटी में दीवार लेखन और राजनीतिक ग्राफिटी को लेकर विवाद एक बार फिर तेज हो गया है। विश्वविद्यालय की कुछ दीवारों पर लिखे विवादित नारों और ग्राफिटी को प्रशासन की ओर से सफेद किए जाने के कुछ ही समय बाद छात्रों ने दोबारा राजनीतिक और वैचारिक लेखन शुरू कर दिया। इनमें ओपन एयर थिएटर के पास कार्ल मार्क्स का एक उद्धरण भी लिखा गया। यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है जब विश्वविद्यालय परिसर में कुछ नारों को लेकर पश्चिम बंगाल की राजनीति में तीखी बहस चल रही है। मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने पहले कुछ नारों को लेकर आपत्ति जताई थी और विश्वविद्यालय प्रशासन से कार्रवाई की मांग की थी। इसके बाद विश्वविद्यालय में सफेदी अभियान चलाया गया था। हालांकि, प्रशासन का कहना था कि सफाई और सौंदर्यीकरण की कार्रवाई नियमित प्रक्रिया का हिस्सा थी।
सफेदी के बाद फिर लिखे गए नारे
रिपोर्टों के मुताबिक, ओपन एयर थिएटर के पास जिस दीवार पर पहले विवादित ग्राफिटी हटाई गई थी, उसी स्थान पर छात्रों ने बाद में कार्ल मार्क्स से जुड़ा एक उद्धरण लिख दिया। इसके अलावा परिसर के अन्य हिस्सों में भी राजनीतिक विचारों और प्रतिरोध से जुड़े लेखन दोबारा नजर आए।लेफ्ट समर्थित छात्र संगठनों ने इसे दीवारों को ‘रीक्लेम’ करने की मुहिम के रूप में पेश किया। उनके अनुसार, जाधवपुर यूनिवर्सिटी में दीवार लेखन लंबे समय से राजनीतिक और सामाजिक अभिव्यक्ति का माध्यम रहा है।
‘रीक्लेम द वॉल’ के जरिए छात्रों का विरोध
सफेदी अभियान के बाद वामपंथी छात्र संगठनों ने ‘Reclaim the Wall’ अभियान शुरू किया। छात्रों ने उन्हीं दीवारों पर दोबारा लेखन करते हुए इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जोड़ा। रिपोर्टों के अनुसार, दोबारा लिखे गए संदेशों में ‘Free Palestine’ के साथ कार्ल मार्क्स और हो ची मिन्ह से जुड़े उद्धरण भी शामिल थे। इससे विश्वविद्यालय परिसर में वैचारिक टकराव और राजनीतिक बहस और तेज हो गई।
बीजेपी और ABVP ने जताई आपत्ति
दूसरी ओर, ABVP ने कुछ ग्राफिटी को आपत्तिजनक बताते हुए विश्वविद्यालय प्रशासन से कार्रवाई की मांग की है। संगठन का आरोप है कि कुछ लेखन राष्ट्रीय एकता और संवैधानिक व्यवस्था के खिलाफ संदेश देने वाला है। वहीं, कार्ल मार्क्स के उद्धरण को लेकर बीजेपी के वरिष्ठ नेता दिलीप घोष ने अलग रुख अपनाया। उन्होंने कहा कि भारत में कार्ल मार्क्स के विचार प्रतिबंधित नहीं हैं और किसी व्यक्ति को उनके विचार या उद्धरण लिखने की स्वतंत्रता है।
‘कश्मीर आजादी’ और ‘किशनजी’ के नारों से शुरू हुआ विवाद
मौजूदा विवाद की पृष्ठभूमि में विश्वविद्यालय परिसर में पहले लिखे गए कुछ नारों को लेकर उठे राजनीतिक सवाल हैं। इनमें ‘कश्मीर मांगे आजादी’, ‘किशनजी जिंदाबाद’ और ‘Free Palestine’ जैसे संदेश शामिल थे। मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने इन नारों पर कड़ी आपत्ति जताई थी और कहा था कि विश्वविद्यालय परिसर से ऐसे लेखन को हटाने की जरूरत है। इसके बाद विश्वविद्यालय प्रशासन ने कई दीवारों पर सफेदी कराई।
कुलपति ने सुझाया ‘डिजाइनेटेड स्पेस’
विवाद के बीच जाधवपुर यूनिवर्सिटी के कुलपति प्रोफेसर चिरंजीब भट्टाचार्य ने छात्रों और शिक्षकों से संयम बरतने की अपील की। विश्वविद्यालय की आधिकारिक वेबसाइट पर भी उन्हें कुलपति के रूप में दर्ज किया गया है। कुलपति ने सुझाव दिया कि छात्रों को अपनी बात रखने और दीवार लेखन करने के लिए परिसर में निर्धारित स्थान (designated spaces) उपलब्ध कराया जा सकता है। साथ ही उन्होंने अन्य दीवारों, इमारतों, गेट और सार्वजनिक संरचनाओं पर मनमाने ढंग से लेखन से बचने की अपील की।
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और कैंपस की गरिमा के बीच संतुलन
कुलपति के मुताबिक, जाधवपुर यूनिवर्सिटी की पहचान मुक्त विचार, बौद्धिक बहस और लोकतांत्रिक भागीदारी की परंपरा से जुड़ी है। साथ ही विश्वविद्यालय की स्वच्छता, गरिमा और वातावरण को बनाए रखना भी सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है। उन्होंने स्पष्ट किया कि उनका सुझाव अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को खत्म करने के उद्देश्य से नहीं है, बल्कि अभिव्यक्ति के लिए ऐसा तरीका खोजने की कोशिश है जिससे विश्वविद्यालय की दीवारों और परिसर की स्थिति भी बनी रहे।
विवाद अभी थमा नहीं
सफेदी के बाद दोबारा ग्राफिटी सामने आने से साफ है कि जाधवपुर यूनिवर्सिटी में दीवार लेखन को लेकर प्रशासन और छात्र संगठनों के बीच मतभेद अभी खत्म नहीं हुए हैं। एक ओर प्रशासन परिसर की स्वच्छता और मर्यादा पर जोर दे रहा है, वहीं वामपंथी छात्र संगठन दीवार लेखन को अपनी राजनीतिक अभिव्यक्ति और कैंपस की पुरानी परंपरा का हिस्सा बता रहे हैं। ऐसे में आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि विश्वविद्यालय प्रशासन निर्धारित स्थानों पर दीवार लेखन की व्यवस्था लागू कर पाता है या राजनीतिक ग्राफिटी को लेकर टकराव आगे भी जारी रहता है।