मिडिल ईस्ट के युद्ध ने वैश्विक बाजारों में अनिश्चितता को गहरा कर दिया है। इसी तनाव के बीच अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड वायदा कीमत बुधवार सुबह 82.73 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई। यह उछाल पिछले लगभग डेढ़ सालों के उच्च स्तर को पार करता हुआ दिखाई दिया। विशेषज्ञों के अनुसार, तेल बाजार में डर और अस्थिरता अभी और बढ़ सकती है यदि क्षेत्र में संघर्ष और लंबा खिंचता है।
लगातर तीसरे दिन 80 डॉलर के पार बना दबाव
तेल की कीमतें लगातार तीसरे दिन 80 डॉलर से ऊपर बनी हुई हैं। इससे पहले 18 जुलाई 2024 को ऐसी ही तेजी देखी गई थी। भू-राजनीतिक तनाव के कारण वैश्विक निवेशकों में भय का माहौल गहरा रहा है और सप्लाई चेन के बाधित होने की आशंका बाजार में और उथल-पुथल बढ़ा रही है। युद्ध के हर दिन कीमतों में नए उतार-चढ़ाव का जोखिम और बढ़ जाता है।
भारत के लिए बढ़ती चिंता
भारत के लिए यह उछाल खतरे की घंटी है क्योंकि देश अपनी ऊर्जा जरूरतों का लगभग 85 प्रतिशत हिस्सा विदेशों से आयात करता है। इसके अलावा कुल तेल आयात का 40 से 45 प्रतिशत हिस्सा अकेले मिडिल ईस्ट से आता है। ऐसे में किसी भी तरह की सप्लाई बाधा भारत की ऊर्जा सुरक्षा को सीधे प्रभावित कर सकती है। बढ़ती वैश्विक कीमतें भारत के फॉरेन एक्सचेंज पर भी दबाव बढ़ा सकती हैं।
इम्पोर्ट बिल पर दबाव, महंगाई की आहट
पेट्रोलियम प्लानिंग एंड एनालिसिस सेल की ताज़ा रिपोर्ट के मुताबिक, फरवरी 2026 में भारतीय बास्केट की औसत कीमत 69.01 डॉलर प्रति बैरल थी, लेकिन मार्च की शुरुआत में ही ब्रेंट क्रूड का 82 डॉलर से ऊपर पहुंचना भारत के तेल आयात बिल को भारी कर सकता है। यदि वैश्विक कीमतें इसी उच्च स्तर पर बनी रहती हैं, तो घरेलू बाज़ार में पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ने की आशंका बढ़ जाएगी। माल ढुलाई महंगी होगी और इसका सीधा असर रोजमर्रा की चीज़ों की कीमतों पर पड़ेगा। आखिरकार, महंगाई की चुभन आम लोगों की जेब पर महसूस की जाएगी।
आगे का रास्ता—क्या कीमतें और उछलेंगी?
आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि आगे का परिदृश्य पूरी तरह इस बात पर निर्भर करेगा कि मिडिल ईस्ट में संघर्ष किस दिशा में जाता है। यदि हालात सुधरते हैं तो बाजार में स्थिरता लौट सकती है, लेकिन यदि युद्ध तेज होता है तो कच्चा तेल 85–90 डॉलर प्रति बैरल के स्तर को भी छू सकता है, जिसका वैश्विक अर्थव्यवस्था पर गहरा असर पड़ेगा। भारत के लिए यह समय ऊर्जा रणनीति को और विविधतापूर्ण बनाने और वैकल्पिक स्रोतों के उपयोग को बढ़ावा देने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
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