वैश्विक रेटिंग एजेंसी फिच रेटिंग्स ने अपनी ताजा वैश्विक आर्थिक परिदृश्य रिपोर्ट में भारत की आर्थिक वृद्धि दर के अनुमान को 6.7 प्रतिशत से घटाकर 6.4 प्रतिशत कर दिया है। एजेंसी का मानना है कि पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव, कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें और वैश्विक व्यापारिक अनिश्चितताएं भारतीय अर्थव्यवस्था की रफ्तार को प्रभावित कर सकती हैं। हालांकि भारत अभी भी दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल रहेगा, लेकिन विकास की गति पर दबाव बढ़ने की आशंका व्यक्त की गई है। यह संशोधित अनुमान ऐसे समय में आया है जब वैश्विक बाजारों में अस्थिरता और ऊर्जा संकट को लेकर चिंताएं लगातार बढ़ रही हैं।
घरेलू मांग और निवेश बने रहेंगे अर्थव्यवस्था की ताकत
फिच रेटिंग्स का मानना है कि चुनौतियों के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था को मजबूत घरेलू मांग और निवेश गतिविधियों से सहारा मिलता रहेगा। देश में बुनियादी ढांचा विकास, औद्योगिक विस्तार, विनिर्माण क्षेत्र में निवेश और सरकारी पूंजीगत व्यय आर्थिक गतिविधियों को गति प्रदान कर रहे हैं। इसके अलावा आयात में संभावित कमी से शुद्ध बाहरी मांग भी विकास दर को समर्थन दे सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की बड़ी उपभोक्ता आबादी और घरेलू बाजार की मजबूती वैश्विक झटकों के प्रभाव को सीमित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
तेल संकट का सीधा असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर
अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव ने अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार में उथल-पुथल पैदा कर दी है। फिच ने ब्रेंट क्रूड की औसत कीमत का अनुमान 70 डॉलर प्रति बैरल से बढ़ाकर 87 डॉलर प्रति बैरल कर दिया है। भारत अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं का बड़ा हिस्सा आयात करता है, इसलिए तेल की कीमतों में वृद्धि का असर परिवहन, उत्पादन, बिजली, कृषि और उपभोक्ता वस्तुओं की लागत पर पड़ना स्वाभाविक है। यदि यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है तो उद्योगों की लागत बढ़ेगी और आर्थिक गतिविधियों पर अतिरिक्त दबाव उत्पन्न होगा।
महंगाई और उपभोक्ता खर्च पर बढ़ सकता है दबाव
रिपोर्ट के अनुसार ऊर्जा कीमतों में बढ़ोतरी और बढ़ती मुद्रास्फीति का असर सीधे आम नागरिकों की जेब पर पड़ेगा। जब ईंधन, परिवहन और आवश्यक वस्तुओं की कीमतें बढ़ती हैं तो लोगों की वास्तविक आय घटने लगती है। इसका परिणाम यह होता है कि उपभोक्ता गैर-जरूरी खर्चों में कटौती करने लगते हैं। फिच का अनुमान है कि वित्त वर्ष 2026-27 की दूसरी और तीसरी तिमाही में उपभोक्ता मांग पर इसका प्रभाव अधिक दिखाई दे सकता है। खुदरा बाजार, ऑटोमोबाइल, उपभोक्ता वस्तु और सेवा क्षेत्रों पर भी इसका असर देखने को मिल सकता है।
मुद्रास्फीति को लेकर बढ़ी आशंका
फिच रेटिंग्स ने चेतावनी दी है कि आने वाले महीनों में महंगाई दर में उल्लेखनीय वृद्धि हो सकती है। रिपोर्ट के अनुसार अप्रैल में थोक मुद्रास्फीति 8.3 प्रतिशत और खुदरा मुद्रास्फीति 3.5 प्रतिशत दर्ज की गई थी, लेकिन वर्ष के अंत तक खुदरा मुद्रास्फीति 5.3 प्रतिशत तक पहुंच सकती है। ऊर्जा कीमतों में वृद्धि, आधार प्रभाव और कमजोर मानसून की आशंका इसके प्रमुख कारण बताए गए हैं। यदि वर्षा सामान्य से कम रहती है तो खाद्यान्न उत्पादन प्रभावित हो सकता है, जिससे खाद्य पदार्थों की कीमतों पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है।
वैश्विक चुनौतियों के बावजूद भारत की दीर्घकालिक संभावनाएं मजबूत
फिच रेटिंग्स के मुख्य अर्थशास्त्री ब्रायन कोल्टन का मानना है कि वर्तमान संकट का प्रभाव 1970 के दशक के तेल संकट जितना गंभीर नहीं होगा क्योंकि आज वैश्विक अर्थव्यवस्था की ऊर्जा पर निर्भरता अपेक्षाकृत कम है। साथ ही सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र में बढ़ता निवेश और डिजिटल अर्थव्यवस्था का विस्तार वैश्विक विकास को समर्थन प्रदान कर रहा है। भारत के लिए यह सकारात्मक संकेत है क्योंकि देश सूचना प्रौद्योगिकी और डिजिटल सेवाओं के क्षेत्र में विश्व स्तर पर महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि अल्पकालिक चुनौतियों के बावजूद भारत की दीर्घकालिक आर्थिक संभावनाएं मजबूत बनी हुई हैं।
सरकार और रिजर्व बैंक के सामने बढ़ी चुनौती
आने वाले समय में केंद्र सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक की नीतियां आर्थिक दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी। महंगाई को नियंत्रित रखना, निवेश को प्रोत्साहित करना, रोजगार सृजन को गति देना और उपभोक्ता मांग को मजबूत बनाए रखना नीति निर्माताओं की प्राथमिकता होगी। यदि वैश्विक हालात में सुधार होता है और मानसून सामान्य रहता है तो भारतीय अर्थव्यवस्था अनुमान से बेहतर प्रदर्शन कर सकती है। फिलहाल निवेशकों, उद्योग जगत और आम जनता की नजरें तेल कीमतों, मुद्रास्फीति के आंकड़ों और अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों पर टिकी हुई हैं।