भारतीय रिजर्व बैंक देश में पॉलिमर आधारित नोट जारी करने की संभावनाओं का अध्ययन कर रहा है। आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ने स्पष्ट किया है कि यह योजना अभी प्रारंभिक विचार-विमर्श के चरण में है और इस संबंध में कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया गया है। हालांकि बढ़ती छपाई लागत, नोटों के जल्दी खराब होने और नकली नोटों की चुनौती को देखते हुए पॉलिमर करेंसी को भविष्य की एक महत्वपूर्ण संभावना माना जा रहा है। यदि यह योजना लागू होती है तो भारतीय मुद्रा प्रणाली तकनीकी रूप से अधिक आधुनिक और सुरक्षित बन सकती है।
आखिर क्या होते हैं पॉलिमर नोट?
पॉलिमर नोट सामान्य कागजी नोटों की तरह ही दिखते और उपयोग किए जाते हैं, लेकिन इन्हें विशेष प्रकार के सिंथेटिक प्लास्टिक से तैयार किया जाता है। यही विशेषता इन्हें पारंपरिक कागजी नोटों से अलग बनाती है। ये नोट पानी, नमी और सामान्य घिसावट का बेहतर तरीके से सामना कर सकते हैं। कई देशों में वर्षों से इनका सफल उपयोग किया जा रहा है और इन्हें अधिक स्वच्छ, मजबूत तथा टिकाऊ मुद्रा के रूप में देखा जाता है। आधुनिक सुरक्षा तकनीकों को शामिल करने में भी पॉलिमर नोट अधिक प्रभावी माने जाते हैं।
क्यों बढ़ रही है पॉलिमर नोटों की जरूरत?
भारत जैसे विशाल देश में प्रतिदिन करोड़ों नोट लेनदेन में उपयोग होते हैं। विशेष रूप से कम मूल्यवर्ग के नोट तेजी से फट जाते हैं, गंदे हो जाते हैं या उपयोग के योग्य नहीं रहते। ऐसे नोटों को वापस लेकर नए नोट छापने पर हर साल बड़ी राशि खर्च होती है। आरबीआई का मानना है कि यदि नोटों की उम्र कई गुना बढ़ जाती है तो लंबे समय में छपाई और प्रतिस्थापन की लागत कम हो सकती है। इसके अलावा बैंकिंग प्रणाली पर भी पुराने और क्षतिग्रस्त नोटों के प्रबंधन का दबाव घट सकता है।
नोट छापने पर कितना आता है खर्च?
वर्तमान व्यवस्था में विभिन्न मूल्यवर्ग के नोटों की छपाई पर अलग-अलग लागत आती है। अनुमान के अनुसार ₹10 के नोट की छपाई पर लगभग ₹1.01, ₹20 के नोट पर करीब ₹1, ₹50 के नोट पर लगभग ₹1.22, ₹100 के नोट पर ₹1.20 से ₹1.51 और ₹500 के नोट पर लगभग ₹2.29 का खर्च आता है। पॉलिमर नोटों की शुरुआती निर्माण लागत कागजी नोटों से अधिक हो सकती है, लेकिन उनकी लंबी उपयोग अवधि के कारण यह अतिरिक्त लागत समय के साथ संतुलित हो सकती है। यही कारण है कि कई केंद्रीय बैंक इसे दीर्घकालिक निवेश के रूप में देखते हैं।
पॉलिमर नोटों के बड़े फायदे क्या हैं?
पॉलिमर नोटों की सबसे बड़ी विशेषता उनकी मजबूती है। ये आसानी से नहीं फटते और पानी या नमी से प्रभावित नहीं होते। इन पर गंदगी भी अपेक्षाकृत कम जमा होती है, जिससे स्वच्छता बनी रहती है। इनमें पारदर्शी विंडो, उन्नत सुरक्षा स्ट्रिप और अन्य आधुनिक सुरक्षा फीचर्स जोड़े जा सकते हैं, जिससे नकली नोट बनाना बेहद कठिन हो जाता है। इसके अलावा इनकी उम्र कागजी नोटों की तुलना में कई गुना अधिक होती है, जिससे बार-बार छपाई की आवश्यकता कम हो जाती है।
दुनिया के कई देशों में सफल है यह मॉडल
पॉलिमर करेंसी कोई नई अवधारणा नहीं है। ऑस्ट्रेलिया इस तकनीक को अपनाने वाले शुरुआती देशों में शामिल रहा है। इसके अलावा कनाडा, न्यूजीलैंड, रोमानिया, फिजी, वियतनाम और मॉरीशस जैसे देशों में भी पॉलिमर नोट लंबे समय से प्रचलन में हैं। यूनाइटेड किंगडम, सिंगापुर, मलेशिया, थाईलैंड और फिलीपींस ने भी अपनी मुद्रा प्रणाली में पॉलिमर नोटों को शामिल किया है। इन देशों के अनुभव बताते हैं कि पॉलिमर करेंसी ने नोटों की गुणवत्ता और सुरक्षा दोनों में सुधार किया है।
क्या भारत में पुराने नोट बंद हो जाएंगे?
फिलहाल ऐसा कोई प्रस्ताव सामने नहीं आया है कि पॉलिमर नोट लागू होने के बाद कागजी नोटों को तुरंत बंद कर दिया जाएगा। यदि भविष्य में इस योजना को मंजूरी मिलती है तो संभावना है कि शुरुआत कुछ चुनिंदा मूल्यवर्ग के नोटों से की जाए। इसके बाद चरणबद्ध तरीके से व्यापक विस्तार किया जा सकता है। इस दौरान कागजी और पॉलिमर दोनों प्रकार के नोट समानांतर रूप से प्रचलन में रह सकते हैं, ताकि आम लोगों को किसी प्रकार की असुविधा न हो।
आम लोगों की जिंदगी में क्या बदलेगा?
पॉलिमर नोट आने पर आम नागरिकों के दैनिक लेनदेन की प्रक्रिया में कोई बड़ा बदलाव नहीं होगा, लेकिन नोटों की गुणवत्ता निश्चित रूप से बेहतर हो सकती है। लोगों को कम फटे-पुराने नोट मिलेंगे, पानी से खराब होने का खतरा घटेगा और नकली नोटों से जुड़ी समस्याओं में कमी आ सकती है। बैंकिंग प्रणाली के लिए भी नोटों के रखरखाव और प्रतिस्थापन की लागत कम होने की संभावना है। कुल मिलाकर यह कदम भारतीय मुद्रा व्यवस्था को अधिक आधुनिक, सुरक्षित और टिकाऊ बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।