रायपुर। देशभर में जनगणना 2027 की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। छत्तीसगढ़ में 16 अप्रैल से स्वगणना की प्रक्रिया प्रारंभ होने जा रही है। इसके साथ ही प्रदेश में राजनीतिक और सामाजिक हलचल तेज हो गई है, खासकर आदिवासी क्षेत्रों को लेकर।
आदिवासी समाज की बढ़ी चिंता: परिसीमन और आरक्षण पर असर
सर्व आदिवासी समाज पहले ही अपनी बैठक में चिंता जता चुका है कि जनगणना के आंकड़ों के आधार पर भविष्य में परिसीमन किया जाएगा। छत्तीसगढ़ में वर्तमान में विधानसभा की 29 सीटें आदिवासियों के लिए आरक्षित हैं, लेकिन समाज को डर है कि अगर जनसंख्या अनुपात बदला तो इन सीटों में कमी आ सकती है।
बाहरी लोगों की गणना पर उठे सवाल
आदिवासी समाज का कहना है कि आदिवासी बहुल क्षेत्रों में बड़ी संख्या में बाहरी लोग आकर बस गए हैं। अगर इनकी गणना यहीं की गई, तो आदिवासी अपने ही क्षेत्रों में अल्पसंख्यक हो सकते हैं। इसका सीधा असर परिसीमन और आरक्षण व्यवस्था पर पड़ सकता है।
दो प्रमुख मांगें: धर्म कोड और मूल स्थान पर गणना
आदिवासी समाज ने दो प्रमुख मांगें रखी हैं:
- आदिवासियों के लिए अलग धर्म कोड लागू किया जाए
- बाहर से आए लोगों की गणना उनके मूल स्थान पर की जाए
वरिष्ठ आदिवासी नेता नंदकुमार साय ने इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाया है।
कांग्रेस का समर्थन, भाजपा ने दी सफाई
अब इस मुद्दे पर सियासत भी तेज हो गई है। कांग्रेस ने आदिवासी समाज की मांगों का समर्थन किया है और सरकार से समाधान निकालने की बात कही है। वहीं भाजपा नेताओं का कहना है कि जनगणना से आदिवासियों के लिए आरक्षित सीटों पर कोई असर नहीं पड़ेगा।
सरकार का रुख: फैसला गृह मंत्रालय करेगा
जनगणना निदेशक कार्तिकेय गोयल के मुताबिक, इस मामले में अंतिम निर्णय केंद्र सरकार और गृह मंत्रालय के स्तर पर लिया जाएगा। उन्होंने समाज से अपील की है कि वे अपनी मांग सीधे गृह मंत्रालय के सामने रखें।
राजनीतिक मुद्दा बनता जा रहा जनगणना विवाद
छत्तीसगढ़ में आदिवासियों की संख्या अधिक होने के कारण यह मुद्दा अब राजनीतिक रंग लेता नजर आ रहा है। जनगणना शुरू होते ही इस पर बयानबाजी और आरोप-प्रत्यारोप भी तेज हो गए हैं।