रायपुर - छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक अहम मामले में स्पष्ट किया है कि कोई भी स्वयंभू शरिया कोर्ट या निजी धार्मिक निकाय वैवाहिक अधिकारों और कानूनी वैवाहिक स्थिति में बदलाव करने का अधिकार नहीं रखता। अदालत ने कहा कि धार्मिक आस्था और व्यक्तिगत विश्वास अपनी जगह हैं, लेकिन किसी अनौपचारिक धार्मिक मंच को कानूनन स्थापित अदालत की शक्तियां हासिल नहीं हो सकतीं।

धार्मिक संस्थाओं को नहीं मिल सकती न्यायिक शक्ति
अदालत की टिप्पणी का मूल आधार यह है कि किसी व्यक्ति के वैवाहिक अधिकार या कानूनी स्टेटस पर फैसला वही संस्था कर सकती है, जिसे कानून के तहत ऐसी शक्ति प्राप्त हो। निजी धार्मिक निकाय अपने स्तर पर ऐसे आदेश जारी नहीं कर सकते, जिन्हें कानूनी अदालत के फैसले के बराबर माना जाए। इस तरह के मामलों में धार्मिक मान्यताओं और देश के कानूनी ढांचे के बीच अंतर को समझना जरूरी है। धार्मिक आस्था का सम्मान किया जा सकता है, लेकिन उससे किसी निजी संस्था को न्यायिक अधिकार हासिल नहीं हो जाता।
महिलाओं के अधिकारों के लिहाज से भी अहम
इस फैसले को खास तौर पर उन मामलों के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जहां पारिवारिक या वैवाहिक विवादों में अनौपचारिक पंचायतों अथवा धार्मिक निकायों की भूमिका सामने आती है। ऐसे मामलों में किसी व्यक्ति पर एकतरफा निर्णय थोपे जाने की स्थिति में कानूनी अधिकारों का सवाल उठता है। अदालत के रुख से यह संदेश मिलता है कि वैवाहिक अधिकारों और कानूनी स्थिति से जुड़े मामलों में अंतिम निर्णय कानून के तहत अधिकृत न्यायिक व्यवस्था के माध्यम से ही होना चाहिए।
समानांतर न्यायिक व्यवस्था पर अदालत का रुख
भारत में धार्मिक और सामुदायिक संस्थाएं सामाजिक या धार्मिक मामलों में अपनी भूमिका निभा सकती हैं, लेकिन उनके निर्णय अपने आप में अदालत के कानूनी आदेश नहीं बन जाते। किसी व्यक्ति के अधिकारों को प्रभावित करने वाला फैसला लागू करने के लिए संबंधित कानूनी प्रक्रिया का पालन जरूरी है। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की यह टिप्पणी इसी अंतर को रेखांकित करती है कि धार्मिक मंच और संवैधानिक न्यायिक संस्थाएं एक समान नहीं हैं।

क्या है फैसले का व्यापक संदेश?
फैसले का महत्व सिर्फ एक वैवाहिक विवाद तक सीमित नहीं माना जा रहा। यह मामला इस बात पर जोर देता है कि नागरिकों के वैवाहिक अधिकार और कानूनी स्टेटस कानून के मुताबिक तय होंगे, न कि किसी स्वयंभू न्यायिक मंच के आदेश से। हालांकि, इस फैसले की वास्तविक कानूनी सीमा और दूसरे समान मामलों पर इसका प्रभाव संबंधित आदेश की पूरी भाषा और मामले के तथ्यों के आधार पर ही समझा जा सकता है। इसलिए इसे सभी धार्मिक निकायों के फैसलों पर लागू होने वाला एक समान नियम मानने से पहले अदालत के मूल आदेश को देखना जरूरी है।